अधिकार
अधिकार उपचार के साथ हो
अधिकार तभी वास्तविक होते हैं, जब उनके साथ उपचार भी हो। यदि पीड़ित व्यक्ति को अपने अधिकारों का अतिक्रमण किए जाने पर कोई कानूनी उपचार प्राप्त नहीं है अधिकार प्रदान करना बेकार है। परिणामस्वरूप जब संविधान अधिकारों की गारंटी देता है, तो यह आवश्यक हो जाता है कि विधायिका और कार्यपालिका को उन पर हावी होने से रोकने के लिए उपबंद किया जाए। यह काम प्रायः न्यायपालिका को सौंपा जाता है और न्यायालयों को संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का विशेष संरक्षक बनाया गया है।
मुक्तीदाता विशेषांक
संदर्भ डॉ बाबासाहेब आंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड-2, पृ. 191
अनुभव तो यह सिद्ध करता है कि अधिकारों की रक्षा कानून के द्वारा नहीं, बल्कि समाज की सामाजिक तथा नैतिक चेतना द्वारा की जाती है। यदि सामाजिक चेतना ऐसी है कि वह उन अधिकारों को मान्यता देने के लिए तैयार है जिनका अधिनियमन कानून करता है, तो अधिकार सुरक्षित रहेंगे। परंतु यदि मूल अधिकारों का समुदाय द्वारा विरोध किया जाता है तो कोई कानून, कोई संसद, कोई न्यायपालिका, वास्तविक अर्थ में उनकी गारंटी नहीं दे सकती।
मुक्तीदाता विशेषांक
संदर्भ डॉ बाबासाहेब आंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड-1, पृ. 267
'दे ग बाई जोगवा' कहने से अधिकार नहीं प्राप्त होते। भिक्खा मांगकर अथवा अन्यों की धर्मबुद्धि पर निर्भर रहने से अपहृत किया गया स्वत्व वापस नहीं आता। उस काम के लिए अपना तेज प्रकट करना चाहिए।
मुक्तीदाता विशेषांक
संदर्भ डॉ बाबासाहेब आंबेडकर संपूर्ण जीवन चरित्र., पृ. ४०
....अधिकार सहृदयता के रूप में नहीं दिया जा सकता।
मुक्तीदाता विशेषांक
संदर्भ डॉ बाबासाहेब आंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड-3, पृ. 217
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