🌟 पाप मधु समान मीठा हो ही नहीं सकता
उत्पल थेरी की कथा
स्थान : जेतवन, श्रावस्ती
उत्पल थेरी का जन्म श्रावस्ती के एक श्रेष्ठिकुल में हुआ था। वह बहुत ही सुन्दर थी और उसके विवाह हेतु अनेकों प्रस्ताव आए। कोई भी परिवार ऐसा न बचा जिसने विवाह का प्रस्ताव नहीं भेजा हो। तब उसके पिता ने सोचा कि मैं सबों का मन तो रख नहीं सकता। अतः पूर्व जन्मों के कर्मफल से उसने पुत्री से प्रव्रजित होने का प्रस्ताव रखा और उसकी पुत्री खुशी-खुशी प्रव्रजित हो गई। वह साधना में रत हो गई और अपनी कठिन तपस्या से उसने अर्हत्व प्राप्त कर लिया।
उन दिनों भिक्षुणियों के लिए वन में रहना वर्जित नहीं था। अतः अन्धवन में लोगों ने उसके लिए एक कुटिया बनवा दी, उसमें उसके रात्रि शयन के लिए चौकी की व्यवस्था कर दी तथा दरवाजे पर पर्दा भी लगवा दिया। वह अपनी कुटिया में रहकर साधना करने लगी।
एक दिन की बात है। वह शिक्षाटन हेतु श्रावस्ती गई हुई थी। उसके ममेरे भाई नन्द को पता चल गया था कि वह अन्धवन में रहती है। उत्पल के भिक्षुणी बनने के पूर्व से ही वह उस पर अनुरक्त था। थेरी के श्रावस्ती से लौटने के पूर्व ही वह कुटिया में प्रवेश कर चौकी के नीचे छिप गया। उत्पल ने अभी कमरे में प्रवेश किया ही था और चौकी पर बैठी ही थी कि वह चौकी के नीचे से निकल आया। उत्पल चूँकि बाहर प्रकाश से आई थी अतः उसे स्पष्ट देख नहीं पाई और उसके बार-बार निषेध करने पर भी नन्द नहीं माना और उसने जबरदस्ती थेरी के साथ बलात्कार कर ही दिया। नन्द का पाप इतना भयानक था कि इस कृत्य के तुरन्त बाद धरती फट गई, नन्द उसमें गिर गया, मर कर नरक चला गया।
थेरी ने इस बात का ज़िक्र अन्य भिक्षुणियों से किया और उनके द्वारा यह बात शास्ता की जानकारी में आई। शास्ता ने सभी भिक्षु एवं भिक्षुणियों को एकत्र कर सन्देश दिया,
“भिक्षु-भिक्षुणियों, उपासक-उपासिकाओं में जो कोई ऐसा दुष्कर्म करता है वह वैसे ही आनन्द की अनुभूति करता है जैसे मधु की मात्र एक-दो बूँद चखने से मिलता है।”
टिप्पणी :
इस घटना के बाद शास्ता ने राजा प्रसेनजित को बुलाकर इस घटना के विषय में बताया तथा यह भी बताया कि किस प्रकार भिक्षुणियों को वन में भय बना रहेगा। अतः भिक्षुणी संघ की स्थायी आवासीय व्यवस्था नगर में ही होनी चाहिए। राजा ने शास्ता की आज्ञा मानकर नगर के अन्दर ही भिक्षुणीसंघ के लिए एक निवास स्थल बनवा दिया। साथ ही आदेश दिया गया कि अब भिक्षुणियाँ जंगल में नहीं रहेंगी।
गाथा :
मधु वा मज्जति बालो, याव पापं न पच्चति।
यदा च पच्चति पापं, अथ बालो दुःखं निगच्छति ॥169॥
अर्थ :
जब तक पाप का फल नहीं मिलता है तब तक
मूर्ख उसे मधु के समान मीठा मानता है।
किन्तु जब उसे पाप का फल मिलता है तब
उसे कठोर दुःख का वहन करना पड़ता है।
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