212 212 212 212
जीस्त जिनके लिये आज कुर्बान है
है मिली उनसे ही मुझे पहचान है
सिलसिले प्यार के ख़त्म ना हो कभी
दिल में बस इक यही मेरे अरमान है
घर बनाने में गुजर गयी उम्र जब
किस लिये ज़िन्दगी आज हैरान है
दर्द कागज पे बिकता रहा उम्र भर
बस वही दर्द से मेरे अनजान है
गम करे क्यों अगर वो हमें ना मिले
दिल में तो मेरे अब भी मेहमान है
वक्त - ऐ - मौत तक साथ हो ये इमां
ज़िन्दगी की मेरी जो सदा शान है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
9/1/2017
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