✍🏽 माझ्या लेखणीतून
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221 2121 1221 212 तेरी ही धुन में आज कलंदर उदास है बिन तेरे ज़िन्दगी का मुकद्दर उदास है फिर से बिखर न जायें ये मोती निगाह से ये सोच सोच कर ही समंदर उदास है मैलों के शोर में भी खामोशी छाई है देखूँ जिधर उधर के ही मंजर उदास है हर कौने में बसी है तेरे प्यार की महक इक तेरे ही कमी से मेरा दर उदास है जो सेज थी सजाई यहाँ मिलके हमने वो तन्हाई देख कर मेरी बिस्तर उदास है पूछो न हाले दिल गमे तन्हाई का मेरी खुश था दुआ से जो ये सिकंदर उदास है ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 19/11/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
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