#आंवला नवमी पर्व #🌺🙏🏻अक्षय आंवला नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं🌺🙏🏻
🌷🌷🌷 आंवला अक्षय नवमी 🌷🌷🌷
( व्रत कथा एवं माहात्म्य)
आंवला अक्षय नवमी
कार्तिक शुक्ल नवमी
30/31 अक्टूबर 2025 गुरुवार/ शुक्रवार
🍁🍁आंवला अक्षय नवमी शुभ मुहूर्त 🍁🍁
पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि इस साल 30 अक्टूबर 2025 को प्रात:काल 10:06 बजे प्रारंभ होकर अगले दिन 31 अक्टूबर 2025 को प्रात:काल 10:03 बजे तक रहेगी. ऐसे में अक्षय नवमी का पावन पर्व 31 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा. इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त प्रात:काल 06:06 बजे से लेकर 10:03 बजे तक रहेगा. ऐसे में अक्षय नवमी की पूजा करने के लिए इस दिन तकरीबन तीन घंटे का समय मिलेगा.
आंवला अक्षय नवमी तिथि प्रारम्भ -30 अक्टूबर 2025 गुरुवार को प्रातः (10..06 am) से प्रारंभ
नवमी तिथि समाप्त -31 अक्टूबर 2025 शुक्रवार को
प्रातः (10.03 am ) तक है
भारतीय सनातन धर्म के जानकारों के अनुसार इस दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। आंवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं का निवास होता है। इसलिए इस की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। पुत्र की प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा आंवला नवमी की पूजा को महत्वपूर्ण माना गया है।
धार्मिक मान्यता है कि आंवला नवमी स्वयं सिद्ध मुहूर्त भी है। इस दिन दान, जप व तप सभी अक्षय होकर मिलते हैं अर्थात इनका कभी क्षय नहीं होता हैं। भविष्य, स्कंद, पद्म और विष्णु पुराण के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। पूजा के बाद इस पेड़ की छाया में बैठकर खाना खाया जाता है। ऐसा करने से हर तरह के पाप और बीमारियां दूर होती हैं। इस दिन किया गया तप, जप , दान इत्यादि व्यक्ति को सभी पापों से मुक्त करता है तथा सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है।
ॐ नमो नारायणाय वासुदेवाय।
ॐ धात्र्यै नम:'।
ॐ ऐं ह्रींं श्रीं आमलकी देव्यै विष्णु प्रियायै नमः।
ॐ श्रीरुपायै च विदमहे आमलकी देव्यै धीमहि तन्नो:
धात्री: प्रचोदयात्।
ॐ अशुभ क्षयकारिण्यै च विदमहे सर्वमंगलकारिण्यै
धीमहि तन्नो: धात्री: प्रचोदयात् ।
🌷🌷🌷आंवला वृक्ष माहात्म्य 🌷🌷🌷🌷
🍁पुराणों में एक कथा के अनुसार आंवला की अधिष्ठात्री देवी को धात्री देवी या आमलकी देवी कहा जाता है।
यह भी भगवान विष्णु की पत्नी एवं देवी तुलसी की बहिन है।
एक कल्प में सती वृंदा की चिंता की भस्म से तीन देवियां उत्पन्न हुई। तुलसी, मालती और धात्री।इन तीनों में से
तुलसी और धात्री ने भगवान विष्णु का पति रूप में स्वीकार किया। तभी से तुलसी के समान ही आंवला वृक्ष में लक्ष्मी नारायण का निवास माना जाता है। आंवला वृक्ष में वैष्णवी
शक्ति एकादशी देवी का भी निवास माना जाता है।
जो मूर नामक दैत्य का वध करने आंवला वृक्ष से उत्पन्न हुई थी
जैसे भगवान शिव को बिल्वपत्र और धतूरा प्रिय है।
उसी प्रकार भगवान विष्णु को तुलसी और आंवला प्रिय है।
तुलसी और आंवला से स्पर्शित जल गंगाजल बन जाता है ।
आंवला वृक्ष को आदि वृक्ष या अक्षय वृक्ष भी कहते हैं।
आंवला में तुलसी और बिल्वपत्र के गुण भी पाए जाते हैं
इसलिए इसे हरिहरात्मक अथवा त्रिदेव स्वरूप भी माना जाता है। इसमें महालक्ष्मी रूप नवम दुर्गा सिद्धिदात्री देवी की प्रतीक जगद्बात्री दुर्गा का भी निवास माना जाता है।
कहा जाता है कि आंवला वृक्ष की पूजा व्यक्ति के समस्त पापों को दूर कर पुण्य फलदायी होती है। जिसके चलते कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को महिलाएं आंवले के पेड़ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती हैं। कार्तिक मास में आंवले से भगवान विष्णु की पूजा होती है लेकिन कार्तिक मास में आंवले के पत्ते नहीं तोड़े
जाते। अन्य मास में आंवले के पत्ते भी भगवान विष्णु को चढ़ा
सकते हैं कार्तिक में केवल आंवले का फल भगवान विष्णु को
चढ़ाया जाता है।
आंवला वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में भी दूसरी कथा का भी वर्णन मिलता है।पौराणिक कथा के मुताबिक, जब पूरी पृथ्वी जलमग्न हो गई थी तब ब्रम्हा जी के मन में सृष्टि दोबारा शुरू करने का विचार आया और कमल पुष्प पर बैठकर ब्रम्हा जी परब्रम्ह परमेश्वर की तपस्या करने लगे।ब्रम्हा जी की तपस्या से खुश होकर परब्रम्हा भगवान आदिनारायण प्रकट हुए जिन्हें देखकर ब्रम्हा जी खुशी से रोने लगे और उनके आंसू भगवान विष्णु के चरणों
मे गिरने पर उन आंसुओं से आंवला फल के रूप में परिवर्तित हो गये।तब भगवान ने कहा कि यह फल मेरा प्रिय होगा
इसमें मेरा साक्षात निवास होगा।
इसके अतिरिक्त आंवला फल से शिवलिंग बनाकर पूजा करने
से ऐश्वर्य और मोक्ष प्राप्त होता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार जिस प्रकार घर में तुलसी वृक्ष आवश्यक है उसी प्रकार आंवला वृक्ष में आवश्यक है।
क्योंकि आंवला वृक्ष होने से घर में यदि ज्योतिष और वास्तु के नियम के विपरित कोई पौधा या वृक्ष है जो घर में नहीं लगाया जाता तब आंवले का वृक्ष उस वृक्ष का दोष नष्ट कर देता है।
आंवला अक्षय नवमी के दिन आंवला वृक्ष में सूर्योदय के पूर्व
अथवा सूर्यास्त के बाद दीपदान करना चाहिए।
संभव हो तो विष्णु सहस्रनाम, श्री सूक्त, कनकधारा स्तोत्र का
पाठ करें। इस आंवला वृक्ष के समीप कनकधारा स्तोत्र का
यथासंभव पाठ करें। आंवला नवमी पर ही आदिशंकराचार्य
ने कनकधारा स्तोत्र की रचना कर निर्धन ब्राहमणी के घर
मैं स्वर्ण बर्षा करवाई थी। इसलिए संभव हो तो इस दिन
कनकधारा स्तोत्र के 51 अथवा 108 पाठ आंवला वृक्ष,
या कनकधारा यंत्र, श्रीयंत्र शालिग्राम तुलसी या लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा/चित्र के सामने करें।
🌷🌷आंवला नवमीं की कथा🌷🌷🌷
काशी नगर में एक निःसंतान धर्मात्मा और दानी वैश्य रहता था। एक दिन वैश्य की पत्नी से एक पड़ोसन बोली यदि तुम किसी पराए बच्चे की बलि भैरव के नाम से चढ़ा दो तो तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। यह बात जब वैश्य को पता चली तो उसने मना कर दिया लेकिन उसकी पत्नी मौके की तलाश में लगी रही। एक दिन एक कन्या को उसने कुएं में गिराकर भैरो देवता के नाम पर बलि दे दी। इस हत्या का परिणाम विपरीत हुआ। लाभ की जगह उसके पूरे बदन में कोढ़ हो गया और लड़की की प्रेतात्मा उसे सताने लगी। वैश्य के पूछने पर उसकी पत्नी ने सारी बात बता दी। इस पर वैश्य कहने लगा गौवध, ब्राह्मण वध तथा बाल वध करने वाले के लिए इस संसार में कहीं जगह नहीं है, इसलिए तू गंगातट पर जाकर भगवान का भजन कर गंगा स्नान कर तभी तू इस कष्ट से छुटकारा पा सकती है।
वैश्य की पत्नी गंगा किनारे रहने लगी। कुछ दिन बाद गंगा माता वृद्ध महिला का वेष धारण कर उसके पास आयीं और बोलीं यदि ‘तुम मथुरा जाकर कार्तिक नवमी का व्रत तथा आंवला वृक्ष की परिक्रमा और पूजा करोगी तो ऐसा करने से तेरा यह कोढ़ दूर हो जाएगा।’ वृद्ध महिला की बात मानकर वैश्य की पत्नी अपने पति से आज्ञा लेकर मथुरा जाकर विधिपूर्वक आंवला का व्रत करने लगी। ऐसा करने से वह भगवान की कृपा से दिव्य शरीर वाली हो गई तथा उसे पुत्र की प्राप्ति भी हुई।
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कार्तिक शुक्ल नवमी - अक्षय नवमी तथा ‘आँवला नवमी’ है। कहा जाता है कि यह पूजा व्यक्ति के समस्त पापों को दूर कर पुण्य फलदायी होती है। जिसके चलते कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को महिलाएं आँवले के पेड़ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती हैं। अक्षय नवमी को जप, दान, तर्पण, स्नानादि का अक्षय फल होता है । आँवला नवमी को अक्षय नवमी के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। कहा जाता है कि आंवला भगवान विष्णु का पसंदीदा फल है। आंवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं का निवास होता है। इसलिए इस दिन आँवले के वृक्ष के पूजन का विशेष महत्व है।
अक्षय नवमी के दिन आंवला वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर खाने का भी विशेष महत्व है। यदि आंवला वृक्ष के नीचे भोजन बनाने में असुविधा हो तो घर में भोजन बनाकर आंवला के वृक्ष के नीचे जाकर पूजन करने के पश्चात् भोजन करना चाहिए। भोजन में सुविधानुसार खीर , पूड़ी या मिष्ठान्न हो सकता है।
इस दिन पानी में आंवले का रस मिलाकर स्नान करने की परंपरा भी है। ऐसा करने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है, सकारात्मक ऊर्जा और पवित्रता बढ़ती है, साथ ही ये त्वचा के लिए भी बहुत फायदेमंद है। आंवले के रस के सेवन से त्वचा की चमक भी बढ़ती है।
🌷🌷आंवला वृक्ष पूजा विधान🌷🌷
प्रातः काल स्नानादि के अनन्तर दाहिने हाथ में जल, अक्षत्, पुष्प आदि लेकर निम्न प्रकार से व्रत का संकल्प करें -
'अद्येत्यादि अमुकगोत्रोsमुक शर्माहं(वर्मा, गुप्तो, वा) ममाखिलपापक्षयपूर्वकधर्मार्थकाममोक्षसिद्धिद्वारा श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं धात्रीमूले विष्णुपूजनं धात्रीपूजनं च करिष्ये'
ऐसा संकल्प कर धात्री वृक्ष (आंवला) के नीचे पूरब की ओर मुखकर बैठें और
'ॐ धात्र्यै नम:'।
ॐ ऐं ह्रींं श्रीं आमलकी देव्यै विष्णु प्रियायै नमः।
ॐ श्रीरुपायै च विदमहे आमलकी देव्यै धीमहि तन्नो:
धात्री: प्रचोदयात्।
मंत्र से आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करके निम्नलिखित मन्त्रों से आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धारा गिराते हुए पितरों का तर्पण करें।
मंत्र
पिता पितामहाश्चान्ये अपुत्रा ये च गोत्रिण:।
ते पिबन्तु मया द्त्तं धात्रीमूलेSक्षयं पय:।।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवा:।
ते पिबन्तु मया द्त्तं धात्रीमूलेSक्षयं पय:।।
इसके बाद आंवले के वृक्ष के तने में निम्न मंत्र से सूत्र लपेटें-
दामोदरनिवासायै धात्र्यै देव्यै नमो नम:।
सूत्रेणानेन बध्नामि धात्रि देवि नमोSस्तु ते।।
इसके बाद वृक्ष की जड़ों को दूध से सींच कर उसके तने पर कच्चे सूत का धागा लपेटना चाहिए। तत्पश्चात रोली, चावल, धूप दीप से वृक्ष की पूजा करें। और आँवले के वृक्ष की 108 परिक्रमाएं करने के बाद कपूर या घी के दीपक से आंवले के वृक्ष की आरती करें तथा निम्न मंत्र से उसकी प्रदक्षिणा करें-
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।।
इसके बाद आंवले के वृक्ष के नीचे ब्राह्मण भोजन भी कराना चाहिए और अन्त मे स्वयं भी आंवले के वृक्ष के सन्निकट बैठकर भोजन करें। एक पका हुआ कोंहड़ा (कूष्माण्ड) लेकर उसके अंदर रत्न, सुवर्ण, रजत या रुपया आदि रखकर निम्न संकल्प करें-
'ममाखिलपापक्षयपूर्वकसुखसौभाग्यादीनामुत्तरोत्तराभिवद्धये कूष्माण्डदानमहं करिष्ये'
आज ही विष्णु भगवान ने कुष्माण्डक दैत्य को मारा था और उसके रोम से कुष्माण्ड की बेल उत्पन्न हुई। इसी कारण आज के दिन कुष्माण्ड का दान करने से उत्तम फल मिलता है। इसलिये इसके बाद विद्वान तथा सदाचारी ब्राह्मण को तिलक करके दक्षिणा सहित कूष्माण्ड दे दें और निम्न प्रार्थना करें-
कूष्माण्डं बहुबीजाढ्यं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।
दास्यामि विष्णवे तुभ्यं पितृणां तारणाय च।।
पितरों के शीतनिवारण के लिए यथा शक्ति कम्बल आदि ऊर्णवस्त्र भी सत्पात्र ब्राह्मण को देना चाहिये।
यह अक्षय नवमी 'धात्रीनवमी' तथा 'कूष्माण्ड नवमी' भी कहलाती है। घर में आंवले का वृक्ष न हो तो किसी बगीचे आदि में आंवले के वृक्ष के समीप जाकर पूजा दान आदि करने की परम्परा है अथवा गमले में आंवले का पौधा रोपित कर घर मे यह कार्य सम्पन्न कर लेना चाहिए।
अथवा तुलसी वृक्ष में आंवला फल रखकर पूजा कर लेनी चाहिए।
ब्रह्मावैवर्तपुराण के वचन के अनुसार, अष्टमी विद्धा नवमी ग्रहण करना चाहिये। दशमी विद्धा नवमी त्याज्य है।
🌷🌷अक्षय नवमी पर जीवन की कठिनाइयों में कमी लाने
के उपाय🌷🌷🌷
1 अक्षय नवमी के दिन दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। इस उपाय को करने से देवी लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो घर में सदा के लिए वास करती है।
2 अक्षय नवमी के दिन अपने स्नान करने के लिए गए जल में आवंला के रस की कुछ बूंदे डालें। ऐसा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा तो जाएगी ही साथ ही माता लक्ष्मी भी घर में विराजमान होंगी।
3 अक्षय नवमी के दिन शाम के समय घर के ईशान कोण में घी का दीपक प्रज्जवलित करें। बत्ती में रुई के स्थान पर लाल रंग के धागे का उपयोग करें। संभव हो तो दीपक में केसर भी डाल दें। इससे देवी जल्द प्रसन्न हो कृपा करेंगी।
4- 5 कुंवारी कन्याओं को घर बुलाकर खीर खिलाएं। सभी कन्याओं को पीला वस्त्र व दक्षिणा देकर विदा करें। इससे माता लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न होती हैं। अपने भक्तों पर कृपा बरसाती है।
5 किसी लंगड़े व्यक्ति को काले वस्त्र और मिठाई दान करें। इस दिन दान देने से देवी दानी के घर में वास करती है। साथ ही उसे अचल सम्पत्ति का वरदान भी देती है।
6 श्रीयंत्र का गाय के दूध के अभिषेक करें। अभिषेक का जल की छींटे पूरे घर में करें। श्रीयंत्र पर कमलगट्टे के साथ तिजोरी में पर रख दें। इससे अवश्य धन लाभ होता है।
7 श्यामा गाय की सेवा कर उन्हें हरा चारा खिलाएं। मान्यता है कि गौ माता में सभी देवी- देवताओं का वास होता है इसलिए उनकी सेवा करने से देवी जल्द ही प्रसन्न होती है। और घर में धन वर्षा करती है।
8 अगर आपकी कुंडली में शनि दोष है तो अक्षय नवमी के दिन से आरंभ कर 41 दिन लगातार लाल मसूर की दाल की कच्ची रोटी बनाकर मछलियों को खिलाएं इससे मंगल ग्रह मजबूत होता है कर्ज अथवा भूमि जायदाद संबंधित समस्या में कमी आती है साथ ही माता महालक्ष्मी की कृपा भी बरसती है।
9 मंगल ग्रह शांति के लिए ब्राह्मणों एवं गरीबों को गुड़ मिश्रित दूध या चावल खिलाएं।
10 नवमी तिथि की स्वामी देवी दुर्गा हैं ऎसे में जातक को दुर्गा की उपासना अवश्य करनी चाहिए. जीवन में यदि कोई संकट है अथवा किसी प्रकार की अड़चनें आने से काम नही हो पा रहा है तो जातक को चाहिए की दुर्गा सप्तशती के पाठ को करे और मां दुर्गा से अपने जीवन में आने वाले संकटों को हरने की प्रार्थना करे।
🍁आंवले का औषधीय महत्व🍁🍁
हमारे धर्म में हर उस वृक्ष को जिसमें बहुत अधिक औषधीय गुण हों, उनकी किसी विशेष तिथि पर पूजे जाने की परंपरा बनाई गई है। आंवला नवमी की परंपरा भी इसी का हिस्सा है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, आंवला प्रकृति का दिया हुआ ऐसा तोहफा है, जिससे कई सारी बीमारियों का नाश हो सकता है। आंवला में आयरन और विटामिन सी भरपूर होता है। आंवले का जूस रोजाना पीने से पाचन शक्ति दुरुस्त रहती है। त्वचा में चमक आती है, त्वचा के रोगों में लाभ मिलता है। आंवला खाने से बालों की चमक बढ़ती है। हम आंवले के महत्व को समझें व उसका संरक्षण करें।
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🌷🌷🌷 श्री लक्ष्मीनारायण स्तोत्र 🌷🌷🌷
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श्रीनिवासन जगन्नाथ श्रीहरे भक्तवत्सल।
लक्ष्मीपते नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात्॥१
अर्थ:
हे श्रीनिवास, हे जगन्नाथ, हे श्रीहरि — जो भक्तों से सदा स्नेह करने वाले हैं!
हे लक्ष्मीपति नारायण, आपको नमस्कार है।
मुझे इस जन्म-मरण रूपी भयावह संसार-सागर से पार लगाइए।
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राधारमण गोविन्द भक्तकामप्रपूरक।
नारायण नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात्॥२
अर्थ:
हे राधारमण गोविंद, हे भक्तों की सभी कामनाएँ पूर्ण करने वाले नारायण!
आपको नमस्कार है — कृपया मुझे इस संसार-सागर से मुक्त कर दीजिए।
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दामोदर महोदर सर्वपत्तिनिवारण।
ऋषे नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात्॥३
अर्थ:
हे दामोदर, महोदर — जो सब प्रकार की विपत्तियों का निवारण करते हैं,
हे ऋषियों के भी आराध्य भगवान!
आपको नमस्कार है, मुझे जन्म-मरण के सागर से तार दीजिए।
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गरुड़ध्वज वैकुण्ठनिवासिन केशव अच्युत।
जनार्दन नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात्॥४
अर्थ:
हे गरुड़ध्वज, वैकुण्ठनिवासी, केशव, अच्युत, जनार्दन!
आपको नमस्कार है — मुझे संसाररूप सागर से मुक्त कीजिए।
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शंखचक्रगदापद्मधर श्रीवत्सलाञ्चन।
मेघश्याम नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात्॥५
अर्थ:
जो शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करते हैं;
जिनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह शोभित है;
जिनका रूप मेघ के समान श्यामल है —
ऐसे हे दयासागर भगवान! मुझे संसारसागर से पार लगाइए।
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त्वं माता त्वं पिता बन्धुः सद्गुरुस्त्वं दयानिधिः।
त्वत्तोऽन्यो न परो देवस्त्राहि मां भवसागरात्॥६
अर्थ:
आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बन्धु हैं,
आप ही सच्चे गुरु हैं, आप ही दया के सागर हैं।
आपके सिवा कोई दूसरा देवता नहीं है —
हे प्रभु! मुझे इस भवसागर से उबारिए।
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न जाने दानधर्मादि योगं यागं तपो जपम्।
त्वं केवलं कुरु दयान त्राहि मां भवसागरात्॥७
अर्थ:
मैं दान, धर्म, योग, यज्ञ, तप या जप — कुछ भी नहीं जानता।
आप ही अपनी अनंत कृपा से दया करें —
और मुझे इस जन्म-मरण रूपी सागर से पार लगाइए।
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न मत्समोऽस्ति पापकृद् न त्वत्समोऽस्ति हि पापहृत्।
विज्ञापितं त्वेतत् शेषसाक्षिन् मामुधार्तं पतितं तवाग्रे॥८
अर्थ:
हे प्रभु! इस संसार में मुझ जैसा पाप करने वाला दूसरा नहीं है,
परंतु आपसे बड़ा पापहरण करने वाला भी कोई नहीं है।
मैं यह सत्य आपके साक्षात शेषनाग को साक्षी रखकर स्वीकार करता हूँ —
हे दयामय! मैं आपके चरणों में गिरा हुआ, दुख से व्याकुल हूँ —कृपा कर मुझे उठा लीजिए। मेरा उद्धार कीजिए
--सारांश
यह स्तोत्र पूर्णतया समर्पणभाव से रचा गया है —
इसमें भक्त स्वीकार करता है कि वह न तो तप, योग, यज्ञ जानता है,
न धर्मकर्म ही उसका सहारा है।
उसका एकमात्र आश्रय श्री लक्ष्मीनारायण हैं —
जो दीनों के त्राता, दयासागर और संसार-सागर से पार कराने वाले हैं।
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🍁🍁श्री लक्ष्मी नारायण स्तोत्रम् के लाभ🍁🍁
श्री लक्ष्मी नारायण स्तोत्र का जाप करने से कई लाभ मिलते हैं:
समृद्धि और समृद्धि के लिए भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
रिश्ते और पारिवारिक जीवन में भाईचारा और शांति को बढ़ावा मिलता है।
वित्तीय संस्थान से सुरक्षा प्रदान की जाती है और सुरक्षा की भावना पैदा की जाती है।
आध्यात्मिक विकास और दिव्य के प्रति लाभों को बढ़ावा दिया जाता है, समग्र कल्याण को प्राप्त किया जाता है।
दैवीय कृपा मिलती है, जिससे जीवन में समग्र सफलता और खुशियाँ मिलती हैं।
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🌷🌷 श्री धात्री देवी आमलकी चालीसा🌷🌷
(आँवला वृक्ष की अधिष्ठात्री श्रीधात्री माता की चालीसा
हरिओम शुक्ला रचित)
॥ दोहा ॥
जय जय धात्री अमर वृक्षमाता, नारायण नेत्रज अमृतदाता।
विष्णुप्रिया जगपालनकारी, सकल सृष्टि सुखप्रभाकारी॥
॥ चौपाई ॥
1.जय जय धात्री हरि प्रिय नारी। मेघवर्ण सुंदर तनु धारी॥
2.हरिप्रिया शुभ सहज सुहावन। त्रिभुवन तारिणि मंगल दायन॥
3.नारायण नेत्रज जल सोई। उत्पन्ना शुभ कर्म सुधोई॥
4.धराधाम पर वृक्ष सुहाया। धात्री रूप अमृतफल लाया॥
5.फाल्गुन शुक्ल एकादशी तिथि। हरि नयनज जल से प्राकट्य गति॥
6.वृक्षरूप शुभ कर्म प्रबन्धा। पूजन पाप दोष सब बन्धा॥
7.लक्ष्मी तुलसी स्वरूप समाना। हरि प्रिया तू जग सुखखाना॥
8.वृंदा सती जब देह बिसारी। भस्म हुई तन धरा पुजारी॥
9.भस्मपात ते वृक्ष उगाया। धात्री रूप पुनि जन्म पाया॥
10.नाम तव धात्री जग हितकारी। विष्णु प्रिया वरद सुखधारी॥
11.कार्तिक नवमी दिन सुहाई। धात्री देवी पुनः लज आई॥
12.वृंदा सती की पुनर्जननी। जग जननी शुभ त्रिलोचननी॥
13.एकादशी पुनि आई सुहानी। तुलसी संग धात्री सयानी॥
14.हरि विवाह भयो हरषाना। त्रैलोक्य गुन मंगल गाना॥
15.शंखचक्रगदाधर प्यारे। धात्री तुझ संग भाव अपारे॥
16.हरि तुलसी धात्री सँग पूजा। सर्व सिद्धि दे अमृत सूत्रजा॥
17.जहाँ पूजी धात्री भवानी। वहाँ रहे हरि कृपा सयानी॥
18.शुभ सिद्धि समृद्धि निवास वहाँ। सदा रहै हरिगुण रास वहाँ॥
19.धार्य सुधामय अंजन जोती। मिटै रोग शोक दुख खोटी॥
20.ध्यान तले जो करै सुहाई। पाप ताप सब दूर पढाई॥
21.तन की जरा मिटै बलदानी। आयु आरोग्य लाज निभानी॥
22.जो नवमी को पूजै माता। पावे सुख संपत्ति दाता॥
23.भक्त करे जो श्रद्धा साचा। मिटै कर्म दोष कलि काचा॥
24.हरि तुलसी धात्री का पूजा। दे हरि सन्तोष अति दूजा॥
25.तू ही ब्रह्म चेतना माता। तू विष्णु हृदयकान्ता॥
26.नारायण नेत्रज तू अम्बा। भवसागर पार उतरम्बा॥
27.धर्म अर्थ काम मोक्ष निवासा। त्रिलोकपाल अमृत प्रकाशा॥
28.आँवला वृक्ष शुभ फलदाय। तुलसी सहित हरि रस समाय॥
29.तेरा स्मरण जन दुःख हरिता। तव दर्शन मति शुभन करिता॥
30.जो पूजै फल पावै भारी। हरि तुलसी धात्री सुखकारी॥
31.सदा वसै घर गृह में तेरा। जहाँ हो नाम तुलसी सवेरा॥
32.हरि की अर्चना संग नित होवे। रोग शोक भय सबकै खोवे॥
33.तेरे तले जो दीप जलाए। विघ्न, क्लेश सब दूर भगाए॥
34.वृक्ष रूपे तू हरि प्रिय नंदा। फल पान ते मिटै भ्रम बंधा॥
35.मन में हरि रस तू भर लाए। हरिकृपा से मोक्ष दिलाए॥
36.तेरी पूजा फाल्गुन में होई। पाप हरण निज कृपा बहोई॥
37.जो चालीसा गावे सुहाई। हरि भवतारिणि कृपा कराई॥
38.पुण्य अनन्त लाभ वह पावे। हरि चरणों में आनंद पावे॥
39.सुख संपत्ति सदा घर आवे। रोग न बाधा भय न ठावे॥
40.मन वांछित फल लाभ करी। धात्री प्रिया हरि भक्ति धरी॥
॥ दोहा ॥
धात्री तुलसी लक्ष्मी प्यारी, हरि सहधर्मिणी जग हितकारी।
जो श्रद्धा से पूजे ध्यावे, अक्षय पुण्य वैकुंठ पावे॥
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