पितृपक्ष श्राद्ध
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sn vyas
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#🪔सर्व पितृ अमावस्या📿 #पितृपक्ष श्राद्ध पूर्वजों का श्राद्ध कर्म करना आवश्यक क्यों? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ब्रह्मपुराण के मतानुसार अपने मृत पितृगण के उद्देश्य से पितरों के लिए श्रद्धा पूर्वक किए जाने वाले कर्म विशेष को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध से ही श्रद्धा कायम रहती है। कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। ये लहरें, तरंगें न केवल जीवित को बल्कि मृतक को भी तृप्त करती हैं। श्राद्ध द्वारा मृतात्मा को शांति-सद्गति, मोक्ष मिलने की मान्यता के पीछे यही तथ्य है। इसके अलावा श्राद्धकर्ता को भी विशिष्ट फल की प्राप्ति होती है। मनुस्मृति में लिखा है। यद्ददाति विधिवत् सम्यक् श्रद्धासमन्वितैः। तत्तत् पितृणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ।॥ -मनुस्मृति 3:275 अर्थात् मनुष्य श्रद्धावान होकर जो-जो पदार्थ अच्छी तरह विधि पूर्वक पितरों को देता है, वह-वह परलोक में पितरों को अनंत और अक्षय रूप में प्राप्त होता है। ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज सभी पितरों को अपने यहां से छोड़ देते हैं, ताकि वे अपनी संतान से श्राद्ध के निमित्त भोजन ग्रहण कर लें । इस माह में श्राद्ध न करने वालों के पितर अतृप्त उन्हें शाप देकर पितृ लोक को चले जाते हैं। इससे आने वाली पीढ़ियों को भारी कष्ट उठाना पड़ता है। इसे ही पितृदोष कहते हैं। पितृ जन्य समस्त दोषों की शाति के लिए पूर्वजों की मृत्यु तिथि के दिन श्राद्ध कर्म किया जाता है। इसमें ब्राह्मणों को भोजन कराकर तृप्त करने का विधान है। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को क्या फल मिलता है, इस बारे में गरुड़पुराण में कहा गया है आयुः पुत्रान् यशः स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं श्रियम् । पशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् । अर्थात् श्राद्ध कर्म करने से संतुष्ट होकर पितृ मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, मोक्ष, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशुधन, सुख, धन और धान्य वृद्धि का आशीष प्रदान करते हैं। यमस्मृति 36.37 में लिखा है कि पिता, दादा और परदादा ये तीनों ही श्राद्ध की ऐसे आशा करते हैं, जैसे वृक्ष पर रहते हुए पक्षी वृक्षों में फल लगने की आशा करते हैं। उन्हें आशा रहती है कि शहद, दूध व खीर से हमारी संतान हमारे लिए श्राद्ध करेगी। देवताओं के लिए जो हव्य और पितरों के लिए जो कव्य दिया जाता है, ये दोनों देवताओं और पितरों को कैसे मिलता है, इसके संबंध में यमराज ने अपनी स्मृति में कहा है - यावतो ग्रसते ग्रासान् हव्यकव्येषु मन्त्रवित्। तावतो ग्रसते पिण्डानू शरीरे ब्रह्मणः पिता ॥ यमस्मृति 40 अर्थात् मंत्रवेत्ता ब्राह्मण श्राद्ध के अन्न के जितने कौर अपने पेट में डालता है, उन कौरों को श्राद्धकर्ता का पिता ब्राह्मण के शरीर में स्थित होकर पा लेता है। अथर्ववेद में पितरों तक सामग्री पहुंचाने का अलग ही रास्ता बताया गया है-पितरों के लिए श्राद्ध करने वाला व्यक्ति अलग से आहुति देते समय अग्नि से प्रार्थना करता है। त्वमग्न इंडितो जातवेदो वाटव्यानि सुरभीणि कृत्वा। प्रादाः पितृभ्यः । अथर्ववेद 18.3.42 अर्थात है स्तुत्य अग्निदेव! हमारे पितर जिस योनि में जहां रहते हैं, तू उनको जानने वाला है। हमारा प्रदान किया हुआ स्वधाकृत हव्य सुगंधित बनाकर पितरों को प्रदान करें। महर्षि जाबालि के मतानुसार पितृपक्ष (आश्विन कृष्णपक्ष) में श्राद्ध करने से पुत्र, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और अभिलषित वस्तुओं की प्राप्ति होती है। विष्णुपुराण में लिखा है कि श्रद्धायुक्त होकर श्राद्धकर्म करने से केवल पितृगण ही तृप्त नहीं होते, बल्कि ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी तृप्त होते हैं। ब्रह्मपुराण में कहा गया है जो मनुष्य शाक के द्वारा भी श्रद्धा-भक्ति से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुखी नहीं होता। महर्षि सुमन्तु का कहना है कि संसार में श्राद्ध से बढ़कर और कोई दूसरा कल्याणप्रद मार्ग नहीं है। अतः बुद्धिमान् मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध कर लेना चाहिए। मार्कण्डेयपुराण के मतानुसार जिस देश अथवा कुल में श्राद्ध कर्म नहीं होता, वहां वीर, निरोग तथा शतायु पुरुष उत्पन्न नहीं होते। महाभारत की विदुरनीति में घृतराष्ट्र से विदुरजी ने कहा है कि जो मनुष्य अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध नहीं करता, उसको बुद्धिमान् मनुष्य मूर्ख कहते। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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sn vyas
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मोक्षदायिनी सप्तपुरियां कौन कौन सी हैं? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सप्तपुरी पुराणों में वर्णित सात मोक्षदायिका पुरियों को कहा गया है। इन पुरियों में 'काशी', 'कांची' (कांचीपुरम), 'माया' (हरिद्वार), 'अयोध्या', 'द्वारका', 'मथुरा' और 'अवंतिका' (उज्जयिनी) की गणना की गई है। 'काशी कांची चमायाख्यातवयोध्याद्वारवतयपि, मथुराऽवन्तिका चैताः सप्तपुर्योऽत्र मोक्षदाः'; 'अयोध्या-मथुरामायाकाशीकांचीत्वन्तिका, पुरी द्वारावतीचैव सप्तैते मोक्षदायिकाः।' पुराणों के अनुसार इन सात पुरियों या तीर्थों को मोक्षदायक कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है- 1. अयोध्या 〰️〰️〰️〰️ अयोध्या उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर है। दशरथ अयोध्या के राजा थे। श्रीराम का जन्म यहीं हुआ था। राम की जन्म-भूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएँ तट पर स्थित है। अयोध्या हिन्दुओं के प्राचीन और सात पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। अयोध्या को अथर्ववेद में ईश्वर का नगर बताया गया है और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। कई शताब्दियों तक यह नगर सूर्य वंश की राजधानी रहा। अयोध्या एक तीर्थ स्थान है और मूल रूप से मंदिरों का शहर है। यहाँ आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम और जैन धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहाँ आदिनाथ सहित पाँच तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। 2. मथुरा 〰️〰️〰️ पुराणों में मथुरा के गौरवमय इतिहास का विषद विवरण मिलता है। अनेक धर्मों से संबंधित होने के कारण मथुरा में बसने और रहने का महत्त्व क्रमश: बढ़ता रहा। ऐसी मान्यता थी कि यहाँ रहने से पाप रहित हो जाते हैं तथा इसमें रहने करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वराह पुराण में कहा गया है कि इस नगरी में जो लोग शुध्द विचार से निवास करते हैं, वे मानव के रूप में साक्षात देवता हैं।[3] श्राद्ध कर्म का विशेष फल मथुरा में प्राप्त होता है। मथुरा में श्राद्ध करने वालों के पूर्वजों को आध्यात्मिक मुक्ति मिलती है।उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने मथुरा में तपस्या कर के नक्षत्रों में स्थान प्राप्त किया था। पुराणों में मथुरा की महिमा का वर्णन है। पृथ्वी के यह पूछने पर कि मथुरा जैसे तीर्थ की महिमा क्या है? महावराह ने कहा था- "मुझे इस वसुंधरा में पाताल अथवा अंतरिक्ष से भी मथुरा अधिक प्रिय है। वराह पुराण में भी मथुरा के संदर्भ में उल्लेख मिलता है, यहाँ की भौगोलिक स्थिति का वर्णन मिलता है।यहाँ मथुरा की माप बीस योजन बतायी गयी है। इस मंडल में मथुरा, गोकुल, वृन्दावन, गोवर्धन आदि नगर, ग्राम एवं मंदिर, तड़ाग, कुण्ड, वन एवं अनगणित तीर्थों के होने का विवरण मिलता है। इनका विस्तृत वर्णन पुराणों में मिलता है। गंगा के समान ही यमुना के गौरवमय महत्त्व का भी विशद विवरण किया गया है। पुराणों में वर्णित राजाओं के शासन एवं उनके वंशों का भी वर्णन प्राप्त होता है। 3. हरिद्वार 〰️〰️〰️〰️ हरिद्वार उत्तराखंड में स्थित भारत के सात सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में एक है। भारत के पौराणिक ग्रंथों और उपनिषदों में हरिद्वार को मायापुरी कहा गया है। गंगा नदी के किनारे बसा हरिद्वार अर्थात हरि तक पहुंचने का द्वार है। हरिद्वार को धर्म की नगरी माना जाता है। सैकडों सालों से लोग मोक्ष की तलाश में इस पवित्र भूमि में आते रहे हैं। इस शहर की पवित्र नदी गंगा में डुबकी लगाने और अपने पापों का नाश करने के लिए साल भर श्रद्धालुओं का आना जाना यहाँ लगा रहता है। गंगा नदी पहाड़ी इलाकों को पीछे छोड़ती हुई हरिद्वार से ही मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। उत्तराखंड क्षेत्र के चार प्रमुख तीर्थस्थलों का प्रवेश द्वार हरिद्वार ही है। संपूर्ण हरिद्वार में सिद्धपीठ, शक्तिपीठ और अनेक नए पुराने मंदिर बने हुए हैं। 4. काशी 〰️〰️〰️ वाराणसी, काशी अथवा बनारस भारत देश के उत्तर प्रदेश का एक प्राचीन और धार्मिक महत्ता रखने वाला शहर है। वाराणसी का पुराना नाम काशी है। वाराणसी विश्व का प्राचीनतम बसा हुआ शहर है। यह गंगा नदी किनारे बसा है और हज़ारों साल से उत्तर भारत का धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। दो नदियों वरुणा और असि के मध्य बसा होने के कारण इसका नाम वाराणसी पडा। बनारस या वाराणसी का नाम पुराणों, रामायण, महाभारत जैसे अनेकानेक ग्रन्थों में मिलता है। संस्कृत पढने प्राचीन काल से ही लोग वाराणसी आया करते थे। वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी संगीत में अपनी ही शैली है। 5. कांचीपुरम 〰️〰️〰️〰️ कांचीपुरम तीर्थपुरी दक्षिण की काशी मानी जाती है, जो मद्रास से 45 मील की दूरी पर दक्षिण–पश्चिम में स्थित है। कांचीपुरम को कांची भी कहा जाता है। यह आधुनिक काल में कांचीवरम के नाम से भी प्रसिद्ध है। ऐसी अनुश्रुति है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल में ब्रह्मा जी ने देवी के दर्शन के लिये तप किया था। मोक्षदायिनी सप्त पुरियों अयोध्या, मथुरा, द्वारका, माया(हरिद्वार), काशी और अवन्तिका (उज्जैन) में इसकी गणना की जाती है। कांची हरिहरात्मक पुरी है। इसके दो भाग शिवकांची और विष्णुकांची हैं। सम्भवत: कामाक्षी अम्मान मंदिर ही यहाँ का शक्तिपीठ है। 6. अवंतिका 〰️〰️〰️〰️ उज्जयिनी का प्राचीनतम नाम अवन्तिका, अवन्ति नामक राजा के नाम पर था। [9] इस जगह को पृथ्वी का नाभिदेश कहा गया है। महर्षि सान्दीपनि का आश्रम भी यहीं था। उज्जयिनी महाराज विक्रमादित्य की राजधानी थी। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में देशान्तर की शून्य रेखा उज्जयिनी से प्रारम्भ हुई मानी जाती है। इसे कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हर 12 वर्ष पर सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल इस नगरी में स्थित है। 7. द्वारका 〰️〰️〰️ द्वारका का प्राचीन नाम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ था। बाद में त्रिविकम भगवान ने कुश नामक दानव का वध भी यहीं किया था। त्रिविक्रम का मंदिर द्वारका में रणछोड़जी के मंदिर के निकट है। ऐसा जान पड़ता है कि महाराज रैवतक (बलराम की पत्नी रेवती के पिता) ने प्रथम बार, समुद्र में से कुछ भूमि बाहर निकाल कर यह नगरी बसाई होगी। हरिवंश पुराण के अनुसार कुशस्थली उस प्रदेश का नाम था जहां यादवों ने द्वारका बसाई थी। विष्णु पुराण के अनुसार,अर्थात् आनर्त के रेवत नामक पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामक पुरी में रह कर आनर्त पर राज्य किया। विष्णु पुराण से सूचित होता है कि प्राचीन कुशावती के स्थान पर ही श्रीकृष्ण ने द्वारका बसाई थी-'कुशस्थली या तव भूप रम्या पुरी पुराभूदमरावतीव, सा द्वारका संप्रति तत्र चास्ते स केशवांशो बलदेवनामा'। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #🪔सर्व पितृ अमावस्या📿 #पितृपक्ष श्राद्ध
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sn vyas
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🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🚩 *"पितृपक्ष" पर विशेष* 🚩 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *हमारे सनातन धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है | ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है | पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं | इन्हीं को पितर कहते हैं | तर्पण करते समय सर्वप्रथम दिव्य पितृ तर्पण , देव तर्पण , ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है | भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं | जिस तिथि को माता-पिता की मृत्यु होती है, उसी तिथि को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है | शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है | ऐसा न करने पर परिवार में पितृदोष उत्पन्न हो जाता है | पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं | परिवार में किसी का दुर्मरण होने से , अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से , मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से , उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है | इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति , वंश-वृद्धि में रूकावट , आकस्मिक बीमारी , संकट , धन में वृद्धि न होना , सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं | यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ | अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें | प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें | यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवायें | वैसे श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आम शांति के लिए करवा सकता है | इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है |* *आज का समय इतना ज्यादा आधुनिक हो गया है कि कुछ लोग तो इन क्रिया कलापों को मानना ही नहीं चाहते | श्राद्ध की तो बात छोड़ दीजिए आज लोग अपने पितरों को तिलांजलि भी नहीं देना चाहते | जबकि हमारे धर्मशास्त्र बताते हैं कि यदि पितरों के कुछ भी न करे तो भी कम से कम तर्पण (तिल मिश्रित जल से तिलांजलि) अवश्य प्रदान करे | क्योंकि :- "एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन् ! यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति !! अर्थात :- जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन - तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं , उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है | परंतु मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज दूसरों को यह सब करने की शिक्षा देने वाले भी इन दिव्य कृत्यों से किनारा किये हुए हैं | कुछ लोग (पण्डित) तो ऐसे भी हैं जो दूसरों के यहाँ तो तर्पण / पिण्डदानादि कराते रहते परंतु स्वयं ही नहीं कर पा रहे हैं , क्योंकि उनको समय ही नहीं है | जबकि पूर्वकाल में पितृपक्ष में लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते थे , पितरों को स्मरण करके जल चढाते थे , निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते थे पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता था | परंतु आज यह कुछ परिवारों तक ही सिमट कर रह गया है | विचार कीजिए कि जो पूर्वज इस संसार हमको सुखी रखने एवं ऐश्वर्यशाली बनाने के लिए दिन रात मेहनत करते हुए सारी सुख - सुविधाओं की व्यवस्था करके इस संसार से विदा हो जाते हैं उनके निमित्त उनकी संताने क्या कर रही हैं ?? कुछ लोग तो ऐसे दुर्भाग्यशाली होते हैं कि उनका अन्तिम संस्कार , दशाह , त्रयोदशाह भी ढंग से नहीं हो पाता है | क्योंकि आज की संतानों को यह सारे कृत्य व्यर्थ लगते हैं | ऐसे ही लोग आज अनेक प्रकार की आधि - व्याधियों से ग्रसित होकर अनेक उपाय करते देखे जा सकते हैं | नि:संतानता का दंश झेल रहे लोग अनेक प्रकार की चिकित्सा में अकूत धन खर्च करते रहते हैं परंतु किसी विद्वान के द्वारा पितृदोष बताने पर उस दोष को मिटाने का स्वांग भर करते हैं | इन सभी प्रकार के दोषों से बचने के लिए मनुष्य को समय समय पर तर्पण / श्राद्ध आदि करते रहना चाहिए | परंतु वाह रे मनुष्य ! अनेकों प्रकार के उपाय कर लेने वाले अपने पितरों को भूल जा रहे हैं और नाना प्रकार के दु:ख उठा रहे हैं |* *पितर हमारी श्रद्धा के भूखे होते हैं | अपना सबकुछ आपके लिए छोड़कर चले जाने वाले पितर हमसे धन आदि की मांग न करके मात्र तिल मिश्रित जल ही मांगते हैं उनके निमित्त यह कृत्य सबको ही करते रहना चाहिए |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना*🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀 #पितृपक्ष श्राद्ध
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