हमारे यहां तो अंगूर कहते हैं।
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हमारे यहाँ तो अंगूर कहते हैं… 🍇 — "जो मिलता नहीं, वही खट्टी कहनी आसान होती है"। यह कहावत ईसोप की दंतकथा लोमड़ी और अंगूर से जुड़ी है; मनोविज्ञान में इसे युक्तिकरण (rationalization) या 'sour grapes' प्रतिक्रिया कहा जाता है, जहाँ व्यक्ति अपनी असमर्थता पर आत्मरक्षा के लिए वस्तु/उपलब्धि को तुच्छ बताकर cognitive dissonance कम करता है; तर्क से देखें तो यह एक बचाव-तंत्र है जो आत्म-सम्मान को अस्थायी राहत देता है पर सीख और प्रगति को रोक सकता है — इसलिए सही रास्ता यह है कि अपनी सीमाएँ पहचानें, उन्हें सुधारें और असफलता को सीख में बदल दें। एक दिलचस्प तथ्य: यह मुहावरा विभिन्न भाषाओं में फैलकर साहित्य और बोली में स्थायी जगह बना चुका है, इसलिए अगली बार जब कोई कहे "हमारे यहाँ तो अंगूर…", तो समझिएचर्चा में इतिहास और मनोविज्ञान दोनों छिपे हैं। 🍇🧠✨ #अंगूरखट्टीहैं #युक्‍तिवाद #सोचोसमझो #सीखोप्रगति. @यहां सब मतलबी हैं सब मतलब पड़ने पर ही याद करते हैं @💕💕💕 हम तो ठहरे एबिले इंदौरी😎😎 #हमारे यहां तो अंगूर कहते हैं। #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें #🚗🧗🏻भारत भ्रमण व सफर प्रेमी🚂⛰ #viral #✈Last travel memories😎
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