वंदे मातरम् 🇮🇳
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Praveen Kumar Yadav
565 views 2 months ago
अमृतकाल में ये मीडिया इतना निम्न स्तर पर चला जायेगा ये किसी ने नहीं सोचा था।ख़बरें जल्दी दिखाने के चक्कर में आज का मिडिया जीवित लोगों को भी मार देता है।यह एक दिन में नहीं हुआ है।यह आयें दिन रोज होता है।जिस मिडिया को सरकार से सवाल पूछना चाहिए वो मिडिया आज जनता की समस्याओं से कोसों दूर है।हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि भारत देश तो स्वतंत्र है लेकिन भारत का मीडिया आज भी गुलाम है।भारत में मिडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बोला जाता है लेकिन यह स्तम्भ लगातार धराशाही हो रहा है।हाल ही आयी विश्व प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट 2025 से पता चला है कि स्वतंत्र पत्रकारिता का मामले में हमारे देश का स्थान 180 देशों की सूची में नीचे से 151 वा है।रिपोर्ट में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर कई चिंताएं जताई गई हैं,जिनमें मीडिया पर आर्थिक दबाव,पत्रकारों के खिलाफ हिंसा और राजद्रोह कानूनों का दुरुपयोग शामिल है।यह सूचकांक हर साल Reporters Without Borders (RSF) द्वारा संकलित और प्रकाशित किया जाता है।इसमें कहा गया है कि वर्तमान सरकार ने कई नए कानून पेश किए हैं जो सरकार को मीडिया को नियंत्रित करने, समाचारों को सेंसर करने और आलोचकों को चुप कराने की असाधारण शक्ति देंगे, जिनमें डेटा संरक्षण अधिनियम 2023, दूरसंचार अधिनियम 2023, मसौदा प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक और डिजिटल पर्सनल बिल 2023 शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान सरकार एवं मीडिया पर हावी होने वाले बड़े परिवारों के बीच एक शानदार तालमेल बनाने के बाद से भारत का मीडिया "अनौपचारिक आपातकाल की स्थिति" में आ गया है। उदहारण के लिए, रिलायंस इंडस्ट्रीज समूह के दिग्गज मुकेश अंबानी 70 से अधिक मीडिया आउटलेट के मालिक हैं, जिन्हें कम से कम 800 मिलियन भारतीय फॉलो करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है,"जो पत्रकार सरकार के आलोचक हैं, उन्हें नियमित रूप से ऑनलाइन उत्पीड़न,धमकी,धमकियों और शारीरिक हमलों के साथ-साथ आपराधिक मुकदमों और मनमानी गिरफ्तारियों का शिकार होना पड़ता है।" कश्मीर में भी स्थिति बहुत चिंताजनक बनी हुई है,जहां पत्रकारों को अक्सर पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा परेशान किया जाता है, कुछ को कई वर्षों तक तथाकथित "अनंतिम" हिरासत में रखा जाता है। स्वतंत्र भारत में मीडिया का स्वतंत्र न होना यह भारत के स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।😭😭दुखद😭😭 #वंदे मातरम् 🇮🇳 #🌞 Good Morning🌞 #🙌 Never Give Up #🥰मोटिवेशन वीडियो #👍 डर के आगे जीत👌
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Praveen Kumar Yadav
541 views 2 months ago
उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी हाल में हर शिक्षण संस्थाओं में बन्दे मातरम गीत गाए जाने की जो अनिवार्यता घोषित की है उससे मुझे व्यक्तिगत कोई आपत्ति नही है मुझे राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों के गाते समय राष्ट्रप्रेम की गौरवमयी अनुभूति होती है। लेकिन भारत के संविधान के निर्माताओं , (जिनमें अनेक स्वतंत्रता सेनानी देश भक्त और क़ानून के जानकार थे)ने ऐसी किसी अनिवार्यता की बाध्यता का प्रावधान नहीं रखा है।राष्ट्रगान के गायन के समय सावधान मुद्रा में खड़े होने की परंपरा की बाध्यता है,लेकिन गाने की बाध्यता नहीं रखी है।उत्तर प्रदेश की सरकार संविधान की मूल भावना के विपरीत बहुसंख्यक वाद की कट्टर राजनीति का समर्थन करती है । प्रकारान्तर से बहुसंख्यक वाद की कट्टरता आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम करती है,इसलिए देश हित में नहीं है।संविधान की भावना के अनुसार नहीं है सर्वोच्च न्यायालय ने कई फैसलों में कहा है कि संविधान की अनुच्छेद 19/1 (a) में सबको स्वतंत्रता है कि वह राष्ट्र गान या गीत गाए या नहीं गाये। 1986 ई के सर्वोच्च न्यायालय के बिजोए इमैनुएल/बनाम केरल सरकार वाद में स्पष्ट किया गया है कि किसी को राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।मुझे राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान गाने में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मुझे इस बात की आपत्ति जरुर है कि स्वतंत्र देश में कोई चीज किसी पर धोपी नहीं जानी चाहिए क्योंकि भारतीय संविधान ने हम भारतीयों को स्वतंत्रता का अधिकार दिया है जिससे के हिसाब से हम सभी कोई भी चीज करने या न करने के लिए स्वतंत्र हैं।भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों का एक समूह है जो अनुच्छेद (19-22) में निहित है।यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता,जैसे कि भाषण और अभिव्यक्ति,शांतिपूर्ण सभा,संघ बनाने,आवागमन करने,निवास करने और कोई भी व्यवसाय अपनाने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।🇮🇳भारत माता की जय 🇮🇳।🇮🇳वंदे मातरम्🇮🇳🙏 #👍 डर के आगे जीत👌 #🥰मोटिवेशन वीडियो #🙌 Never Give Up #🌞 Good Morning🌞 #वंदे मातरम् 🇮🇳
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