महाभारत दोहे

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sn vyas
591 views 17 days ago
#महाभारत की कथा *शास्त्र कहते हैं कि अठारह दिनों के महाभारत युद्ध में उस समय की पुरुष जनसंख्या का 80% सफाया हो गया था। युद्ध के अंत में, संजय कुरुक्षेत्र के उस स्थान पर गए जहां संसार का सबसे महानतम युद्ध हुआ था।* उसने इधर उधर देखा और सोचने लगा कि क्या वास्तव में यहीं युद्ध हुआ था? यदि यहां युद्ध हुआ था तो जहां वो खड़ा है, वहां की जमीन रक्त से सराबोर होनी चाहिए। क्या वो आज उसी जगह पर खड़ा है जहां महान पांडव और कृष्ण खड़े थे? तभी एक वृद्ध व्यक्ति ने वहां आकर धीमे और शांत स्वर में कहा, "आप उस बारे में सच्चाई कभी नहीं जान पाएंगे!" संजय ने धूल के बड़े से गुबार के बीच दिखाई देने वाले भगवा वस्त्रधारी एक वृद्ध व्यक्ति को देखने के लिए उस ओर सिर को घुमाया। "मुझे पता है कि आप कुरुक्षेत्र युद्ध के बारे में पता लगाने के लिए यहां हैं, लेकिन आप उस युद्ध के बारे में तब तक नहीं जान सकते, जब तक आप ये नहीं जान लेते हैं कि असली युद्ध है क्या?" बूढ़े आदमी ने रहस्यमय ढंग से कहा। "तुम महाभारत का क्या अर्थ जानते हो?" तब संजय ने उस रहस्यमय व्यक्ति से पूछा। वह कहने लगा, "महाभारत एक गाथा मात्र नहीं है, एक वास्तविकता भी है, निश्चित रूप से एक दर्शन भी है।" "क्या आप मुझे बता सकते हैं कि दर्शन क्या है?" संजय ने निवेदन किया। अवश्य जानता हूं, बूढ़े आदमी ने कहना शुरू किया। पांडव कुछ और नहीं, बल्कि आपकी पाँच इंद्रियाँ हैं; दृष्टि, गंध, स्वाद, स्पर्श और श्रवण। और क्या आप जानते हैं कि कौरव क्या हैं? उसने अपनी आँखें संकीर्ण करते हुए पूछा। कौरव ऐसे सौ तरह के विकार हैं, जो आपकी इंद्रियों पर प्रतिदिन हमला करते हैं लेकिन आप उनसे लड़ सकते हैं और जीत भी सकते है। पर क्या आप जानते हैं कैसे? *संजय ने फिर से न में सर हिला दिया।* "जब कृष्ण आपके रथ की सवारी करते हैं!" यह कह वह वृद्ध व्यक्ति बड़े प्यार से मुस्कुराया और संजय अंतर्दृष्टि खुलने पर जो नवीन रत्न प्राप्त हुआ उस पर विचार करने लगा... "कृष्ण आपकी आंतरिक आवाज, आपकी आत्मा, आपका मार्गदर्शक प्रकाश हैं और यदि आप अपने जीवन को उनके हाथों में सौप देते हैं तो आपको फिर चिंता करने की कोई आवश्कता नहीं है।" वृद्ध आदमी ने कहा। संजय अब तक लगभग चेतन अवस्था में पहुंच गया था, लेकिन जल्दी से एक और सवाल लेकर आया। फिर कौरवों के लिए द्रोणाचार्य और भीष्म क्यों लड़ रहे हैं? भीष्म हमारे अहंकार का प्रतीक हैं, अश्वत्थामा हमारी वासनाएं, इच्छाएं हैं, जो कि जल्दी नहीं मरतीं। दुर्योधन हमारी सांसारिक वासनाओं, इच्छाओं का प्रतीक है। द्रोणाचार्य हमारे संस्कार हैं। जयद्रथ हमारे शरीर के प्रति राग का प्रतीक है कि 'मैं ये देह हूं' का भाव। द्रुपद वैराग्य का प्रतीक हैं। अर्जुन मेरी आत्मा हैं, मैं ही अर्जुन हूं और स्वनियंत्रित भी हूं। कृष्ण हमारे परमात्मा हैं। पांच पांडव पांच नीचे वाले चक्र भी हैं, मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक। द्रोपदी कुंडलिनी शक्ति है, वह जागृत शक्ति है, जिसके ५ पति ५ चक्र हैं। ओम शब्द ही कृष्ण का पांचजन्य शंखनाद है, जो मुझ और आप आत्मा को ढ़ाढ़स बंधाता है कि चिंता मत कर मैं तेरे साथ हूं, अपनी बुराइयों पर विजय पा, अपने निम्न विचारों, निम्न इच्छाओं, सांसारिक इच्छाओं, अपने आंतरिक शत्रुओं यानि कौरवों से लड़ाई कर अर्थात अपनी मेटेरियलिस्टिक वासनाओं को त्याग कर और चैतन्य पाठ पर आरूढ़ हो जा, विकार रूपी कौरव अधर्मी एवं दुष्ट प्रकृति के हैं। श्री कृष्ण का साथ होते ही ७२००० नाड़ियों में भगवान की चैतन्य शक्ति भर जाती है, और हमें पता चल जाता है कि मैं चैतन्यता, आत्मा, जागृति हूं, मैं अन्न से बना शरीर नहीं हूं, इसलिए उठो जागो और अपने आपको, अपनी आत्मा को, अपने स्वयं सच को जानो, भगवान को पाओ, यही भगवद प्राप्ति या आत्म साक्षात्कार है, यही इस मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। ये शरीर ही धर्म क्षेत्र, कुरुक्षेत्र है। धृतराष्ट्र अज्ञान से अंधा हुआ मन है। अर्जुन आप हो, संजय आपके आध्यात्मिक गुरु हैं। वृद्ध आदमी ने दुःखी भाव के साथ सिर हिलाया और कहा, "जैसे जैसे आप बड़े होते हैं, अपने बड़ों के प्रति आपकी धारणा बदल जाती है। जिन बुजुर्गों के बारे में आपने सोचा था कि आपके बढ़ते वर्षों में वे संपूर्ण थे, अब आपको लगता है वे सभी परिपूर्ण नहीं हैं। उनमें दोष हैं। और एक दिन आपको यह तय करना होगा कि उनका व्यवहार आपके लिए अच्छा या बुरा है। तब आपको यह भी अहसास हो सकता है कि आपको अपनी भलाई के लिए उनका विरोध करना या लड़ना भी पड़ सकता है। यह बड़ा होने का सबसे कठिन हिस्सा है और यही वजह है कि गीता महत्वपूर्ण है।" संजय धरती पर बैठ गया, इसलिए नहीं कि वह थका हुआ था, तक गया था, बल्कि इसलिए कि वह जो समझ लेकर यहां आया था, वो एक एक कर धराशाई हो रही थी। लेकिन फिर भी उसने लगभग फुसफुसाते हुए एक और प्रश्न पूछा, तब कर्ण के बारे में आपका क्या कहना है? "आह!" वृद्ध ने कहा। आपने अंत के लिए सबसे अच्छा प्रश्न बचाकर रखा हुआ है। "कर्ण आपकी इंद्रियों का भाई है। वह इच्छा है। वह सांसारिक सुख के प्रति आपके राग का प्रतीक है। वह आप का ही एक हिस्सा है, लेकिन वह अपने प्रति अन्याय महसूस करता है और आपके विरोधी विकारों के साथ खड़ा दिखता है। और हर समय विकारों के विचारों के साथ खड़े रहने के कोई न कोई कारण और बहाना बनाता रहता है।" "क्या आपकी इच्छा; आपको विकारों के वशीभूत होकर उनमें बह जाने या अपनाने के लिए प्रेरित नहीं करती रहती है?" वृद्ध ने संजय से पूछा। संजय ने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया और भूमि की तरफ सिर करके सारी विचार श्रंखलाओं को क्रमबद्ध कर मस्तिष्क में बैठाने का प्रयास करने लगा। और जब उसने अपने सिर को ऊपर उठाया, वह वृद्ध व्यक्ति धूल के गुबारों के मध्य कहीं विलीन हो चुका था। लेकिन जाने से पहले वह जीवन की वो दिशा एवं दर्शन दे गया था, जिसे आत्मसात करने के अतिरिक्त संजय के सामने अब कोई अन्य मार्ग नहीं बचा था।
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sn vyas
570 views 9 days ago
क्या सचमुच अर्जुन ने भगवान श्रीराम की शक्ति को चुनौती दे दी थी? क्या महाबली हनुमान ने केवल एक कदम रखकर अर्जुन के अभिमान को चूर-चूर कर दिया था? और आखिर क्यों महाभारत के सबसे महान धनुर्धर को स्वयं श्रीराम के परम भक्त के सामने सिर झुकाना पड़ा? यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि अहंकार, भक्ति और विनम्रता का ऐसा दिव्य रहस्य है, जो हर युग में मनुष्य को जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाता है। अर्जुन का अभिमान और हनुमान जी का दिव्य उपदेश महाभारत का युद्ध अभी प्रारंभ नहीं हुआ था। समय था तीर्थयात्राओं का। एक दिन योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, "पार्थ, केवल शस्त्रों का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। तीर्थों की यात्रा मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार को भी पवित्र करती है।" अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ भारत के अनेक पवित्र तीर्थों का दर्शन करते हुए अंततः उस भूमि पर पहुँचे, जहाँ समुद्र की गर्जना आज भी श्रीराम के चरणों का गुणगान करती है—पावन रामेश्वरम। समुद्र की अथाह लहरों के बीच खड़े होकर अर्जुन उस दिशा को निहारने लगे, जहाँ कभी भगवान श्रीराम ने वानर सेना के सहयोग से लंका तक पहुँचने के लिए रामसेतु का निर्माण कराया था। समुद्र की लहरें मानो उस दिव्य इतिहास को आज भी दोहरा रही थीं। श्रीकृष्ण शांत भाव से समुद्र को निहार रहे थे, लेकिन अर्जुन के भीतर कुछ और ही चल रहा था। अपने अद्भुत धनुर्विद्या कौशल पर उन्हें गर्व था। उनके हाथों में था दिव्य गांडीव, जिसने असंख्य युद्धों में विजय दिलाई थी। उसी गर्व ने धीरे-धीरे उनके मन में एक प्रश्न को जन्म दिया। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा— "माधव! यदि प्रभु श्रीराम इतने महान धनुर्धर थे, तो उन्होंने पत्थरों का पुल क्यों बनवाया? वे चाहते तो केवल अपने बाणों से ऐसा अटूट पुल बना सकते थे। यदि मैं उस समय होता, तो अपने बाणों से ऐसा पुल बनाता जिस पर पूरी वानर सेना ही नहीं, समस्त संसार भी चल सकता था।" श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा। उनके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। क्योंकि वे जानते थे... कुछ प्रश्नों का उत्तर शब्द नहीं, अनुभव देता है। उसी समय पास के एक पर्वत पर भगवान श्रीराम के परम भक्त, पवनपुत्र महाबली हनुमान गहन ध्यान में लीन थे। उनके रोम-रोम में "राम" का नाम स्पंदित हो रहा था। जब अर्जुन के अभिमान से भरे शब्द उनके कानों तक पहुँचे, तो उन्होंने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। हनुमान जी क्रोधित नहीं हुए। वे मुस्कुराए... क्योंकि वे जानते थे कि अभिमान को तर्क से नहीं, सत्य के अनुभव से समाप्त किया जाता है। उन्होंने एक वृद्ध और दुर्बल वानर का रूप धारण किया और अर्जुन के सामने आकर बोले— "वत्स, मैंने सुना है कि तुम अपने बाणों से ऐसा पुल बना सकते हो, जो किसी भी भार को सहन कर सके। क्या यह सत्य है?" अर्जुन ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया— "हाँ, यह मेरे लिए अत्यंत सरल कार्य है।" वृद्ध वानर ने मुस्कुराकर कहा— "तो बनाओ... यदि मेरा भार भी तुम्हारा पुल सहन कर ले, तो मैं तुम्हारी श्रेष्ठता स्वीकार कर लूँगा।" अर्जुन ने चुनौती स्वीकार कर ली। उन्होंने गंगा की धारा की भाँति मंत्रों का उच्चारण किया। गांडीव से अग्नि की गति से बाण निकले और देखते ही देखते समुद्र के ऊपर सुनहरे प्रकाश से चमकता हुआ बाणों का विशाल पुल तैयार हो गया। वह दृश्य अद्भुत था। आकाश से देवता पुष्पवर्षा करने लगे। समुद्र की लहरें भी मानो उस कला की प्रशंसा कर रही थीं। अर्जुन गर्व से बोले— "लीजिए, अब इस पर चलकर देखिए।" वृद्ध वानर धीरे-धीरे पुल पर चढ़े। पहला कदम... पुल हल्का-सा काँपा। दूसरा कदम... बाणों की रचना डगमगाने लगी। तीसरा कदम... धड़ाम...! पूरा पुल समुद्र की अथाह लहरों में बिखर गया। कुछ ही क्षणों में अर्जुन का अद्भुत निर्माण लहरों के नीचे विलीन हो चुका था। समुद्र पहले की तरह शांत था... लेकिन अर्जुन का मन तूफान बन चुका था। उनकी आँखों का गर्व टूट चुका था। उन्होंने पहली बार अनुभव किया कि संसार में उनसे भी कहीं बड़ी शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनका सिर लज्जा से झुक गया। वे धीमे स्वर में बोले— "मैं पराजित हो गया..." तभी वह वृद्ध वानर मंद-मंद मुस्कुराने लगे। अचानक चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। वृद्ध शरीर विराट होने लगा। पूँछ आकाश को छूने लगी। उनका तेज हजारों सूर्यों के समान प्रकाशित हो उठा। अर्जुन विस्मित होकर देखने लगे। उनके सामने कोई साधारण वानर नहीं... स्वयं पवनपुत्र, संकटमोचन, श्रीरामभक्त महाबली हनुमान खड़े थे। अर्जुन तुरंत उनके चरणों में गिर पड़े। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। "प्रभु! मुझे क्षमा करें। मैंने अपने अभिमान में भगवान श्रीराम की महिमा को समझे बिना ही उन पर प्रश्न उठा दिया।" हनुमान जी ने प्रेमपूर्वक अर्जुन को उठाया और बोले— "पार्थ, भगवान श्रीराम के लिए बाणों का पुल बनाना असंभव नहीं था। वे तो संपूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। यदि वे चाहते, तो समुद्र स्वयं मार्ग दे देता। लेकिन उन्होंने पत्थरों का सेतु इसलिए बनाया, क्योंकि वे अपनी वानर सेना को भी इस दिव्य कार्य का सहभागी बनाना चाहते थे। प्रभु अपने भक्तों को केवल आदेश नहीं देते, उन्हें अपने कार्यों का सम्मानित भागीदार भी बनाते हैं। यही भगवान की सबसे बड़ी करुणा है।" हनुमान जी आगे बोले— "याद रखो, शक्ति का सबसे बड़ा आभूषण विनम्रता है। जिस दिन शक्ति के साथ अहंकार जुड़ जाता है, उसी दिन उसका तेज क्षीण होने लगता है।" ये शब्द सीधे अर्जुन के हृदय में उतर गए। उस दिन अर्जुन ने केवल हनुमान जी के दर्शन ही नहीं किए... उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीखा। हनुमान जी अर्जुन की सच्ची विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना वरदहस्त अर्जुन के मस्तक पर रखा और कहा— "आने वाले महाभारत युद्ध में मैं स्वयं तुम्हारे रथ की ध्वजा पर कपिध्वज बनकर विराजमान रहूँगा। जब तक श्रीकृष्ण तुम्हारे सारथी हैं और मैं तुम्हारी ध्वजा पर हूँ, तब तक संसार का कोई भी अस्त्र तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।" समय बीता। महाभारत का महायुद्ध प्रारंभ हुआ। कुरुक्षेत्र की धरती पर अर्जुन का रथ केवल एक रथ नहीं था... उसके अग्रभाग में स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण सारथी थे। ध्वजा पर महाबली हनुमान गर्जना कर रहे थे। जब भी भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा और अन्य महारथी अपने प्रचंड अस्त्र चलाते, तब श्रीकृष्ण का दिव्य मार्गदर्शन और हनुमान जी की अदृश्य शक्ति अर्जुन की रक्षा करती। यही कारण था कि अर्जुन का रथ बार-बार प्रहार सहकर भी अडिग बना रहा। कथा का संदेश यह दिव्य प्रसंग हमें सिखाता है कि प्रतिभा, ज्ञान, शक्ति और सफलता तभी सार्थक हैं जब उनके साथ विनम्रता भी हो। अहंकार मनुष्य को ईश्वर से दूर ले जाता है, जबकि नम्रता उसे प्रभु की कृपा का पात्र बना देती है। अर्जुन जैसे महान योद्धा ने भी जब अपनी भूल स्वीकार कर ली, तभी उन्हें महाबली हनुमान का आशीर्वाद मिला। इसलिए जीवन में चाहे कितनी भी उपलब्धियाँ क्यों न मिल जाएँ, कभी अभिमान मत कीजिए। क्योंकि सच्चा विजेता वही है, जो अपनी शक्ति का श्रेय स्वयं को नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा को देता है। जय श्रीराम। 🚩 जय बजरंगबली। 🚩 🚩 क्या आपको लगता है कि अहंकार सबसे बड़े योद्धा को भी पराजित कर सकता है? यदि जय श्रीराम और जय बजरंगबली पर आपका अटूट विश्वास है, तो कमेंट में लिखें "🚩 जय श्रीराम 🚩 जय हनुमान 🚩"। इस दिव्य कथा को अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें, ताकि हर कोई विनम्रता और भक्ति का यह अमूल्य संदेश जान सके। #महाभारत की कथा #रामायण महाभारत
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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणी का स्वयं मरने के लिये उद्यत होकर पति से जीवित रहने के लिये अनुरोध करना...(दिन 459) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ब्राह्मण्युवाच न संतापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् । न हि संतापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते ।। १ ।। ब्राह्मणी बोली-प्राणनाथ! आपको साधारण मनुष्योंकी भाँति कभी संताप नहीं करना चाहिये। आप विद्वान् हैं, आपके लिये यह संतापका अवसर नहीं है ।। १ ।। अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः । अवश्यम्भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते ।। २ ।। एक-न-एक दिन संसारमें सभी मनुष्योंको अवश्य मरना पड़ेगा; अतः जो बात अवश्य होनेवाली है, उसके लिये यहाँ शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। २ ।। भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते। व्यथां जहि सुबुद्धया त्वं स्वयं यास्यामि तत्र च ।। ३ ।। एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम्। प्राणानपि परित्यज्य यद् भर्तृहितमाचरेत् ।। ४ ।। पत्नी, पुत्र और पुत्री- ये सब अपने ही लिये अभीष्ट होते हैं। आप उत्तम बुद्धि-विवेकका आश्रय लेकर शोक-संताप छोड़िये। मैं स्वयं वहाँ (राक्षसके समीप) चली जाऊँगी। पत्नीके लिये लोकमें सबसे बढ़कर यही सनातन कर्तव्य है कि वह अपने प्राणोंको भी निछावर करके पतिकी भलाई करे ।। ३-४ ।। तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम् । भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ।। ५ ।। पतिके हितके लिये किया हुआ मेरा वह प्राणोत्सर्गरूप कर्म आपके लिये तो सुखकारक होगा ही, मेरे लिये भी परलोकमें अक्षय सुखका साधक और इस लोकमें यशकी प्राप्ति करानेवाला होगा ।। ५ ।। एष चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव । अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते ।। ६ ।। यह सबसे बड़ा धर्म है, जो मैं आपसे बता रही हूँ। इसमें आपके लिये अधिक-से-अधिक स्वार्थ और धर्मका लाभ दिखायी देता है ।। ६ ।। यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि । कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया ।। ७ ।। जिस उद्देश्यसे पत्नीकी अभिलाषा की जाती है, आपने वह उद्देश्य मुझसे सिद्ध कर लिया है। एक पुत्री और एक पुत्र आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हो चुके हैं। इस प्रकार आपने मुझे भी उऋण कर दिया है ।। ७ ।। समर्थः पोषणे चासि सुतयो रक्षणे तथा । न त्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ।॥ ८ ॥ इन दोनों संतानोंका पालन-पोषण और संरक्षण करनेमें आप समर्थ हैं। आपकी तरह मैं इन दोनोंके पालन-पोषण तथा रक्षाकी व्यवस्था नहीं कर सकूँगी ।। ८ ।। मम हि त्वद्विहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर । कथं स्यातां सुतौ बालौ भरेयं च कथं त्वहम् ।। ९ ।। मेरे सर्वस्वके स्वामी प्राणेश्वर ! आपके न रहनेपर मेरे इन दोनों बच्चोंकी क्या दशा होगी? मैं किस तरह इन बालकोंका भरण-पोषण करूँगी? ।। ९ ।। कथं हि विधवानाथा बालपुत्रा विना त्वया । मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि ।। १० ।। मेरा पुत्र अभी बालक है, आपके बिना मैं अनाथ विधवा सन्मार्गपर स्थित रहकर इन दोनों बच्चोंको कैसे जिलाऊँगी ।। १० ।। अहंकृतावलिप्तैश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम् । अयुक्तैस्तव सम्बन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ।। ११ ।। जो आपके यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा अयोग्य हैं, ऐसे अहंकारी और घमंडीलोग जब मुझसे इस कन्याको माँगेंगे, तब मैं उनसे इसकी रक्षा कैसे कर सकूँगी ।। ११ ।। उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः । प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथा स्त्रियम् ।। १२ ।। साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः । स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम ।। १३ ।। जैसे पक्षी पृथ्वीपर डाले हुए मांसके टुकड़ेको लेनेके लिये झपटते हैं, उसी प्रकार सब लोग विधवा स्त्रीको वशमें करना चाहते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! दुराचारी मनुष्य जब बार-बार मुझसे याचना करते हुए मुझे मर्यादासे विचलित करनेकी चेष्टा करेंगे, उस समय में श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा अभिलषित मार्गपर स्थिर नहीं रह सकूँगी ।। १२-१३ ।। कथं तव कुलस्यैकामिमां बालामनागसम्। पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे ।। १४ ।। आपके कुलकी इस एकमात्र निरपराध बालिकाको मैं बाप-दादोंके द्वारा पालित धर्ममार्गपर लगाये रखनेमें कैसे समर्थ होऊँगी ।। १४ ।। कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन् गुणानाधातुमीप्सितान् । अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान् ।। १५ ।। आप धर्मके ज्ञाता हैं, आप जैसे अपने बालकको सद्‌गुणी बना सकते हैं, उस प्रकार मैं आपके न रहनेपर सब ओरसे आश्रयहीन हुए इस अनाथ बालकमें वांछनीय उत्तम गुणोंका आधान कैसे कर सकूँगी ।। १५ ।। इमामपि च ते बालामनाथां परिभूय माम्। अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा ।। १६ ।। जैसे अनधिकारी शूद्र वेदकी श्रुतिको प्राप्त करना चाहता हो, उसी प्रकार अयोग्य पुरुष मेरी अवहेलना करके आपकी इस अनाथ बालिकाको भी ग्रहण करना चाहेंगे ।। १६ ।। तां चैदहं न दित्सेयं त्वद्‌गुणैरुपबृंहिताम् । प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविर्ध्वाङ्क्षा इवाध्वरात् ।। १७ ।। आपके ही उत्तम गुणोंसे सम्पन्न अपनी इस पुत्रीको यदि मैं उन अयोग्य पुरुषोंके हाथमें न देना चाहूँगी तो वे बलपूर्वक इसे उसी प्रकार हर ले जायेंगे, जैसे कौए यज्ञसे हविष्यका भाग लेकर उड़ जायँ ।। १७ ।। सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मनः । अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ।। १८ ।। अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती । अवलिप्तैर्नरैर्ब्रह्मन् मरिष्यामि न संशयः ।। १९ ।। ब्रह्मन् ! आपके इस पुत्रको आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्रीको भी अयोग्य पुरुषके वशमें पड़ी देखकर तथा लोकमें घमंडी मनुष्योंद्वारा अपमानित हो अपनेको पूर्ववत् सम्मानित अवस्थामें न पाकर मैं प्राण त्याग दूँगी, इसमें संशय नहीं है ।। १८-१९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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