योग

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sn vyas
602 views 23 days ago
#योग बाल्यावस्था से एक आसन सिद्ध करने के लाभ योगशास्त्र में कहा गया है — "स्थिरं सुखं आसनम्" अर्थात् — जो आसन स्थिर और सुखद हो, वही सिद्ध है। बाल्यावस्था में यदि कोई बालक एक आसन को पूर्णतः सिद्ध कर लेता है, अर्थात उस आसन में लंबे समय तक सहज, स्थिर और सुखपूर्वक बैठ सकता है, तो वह उसके सम्पूर्ण जीवन में चमत्कारी लाभ देता है — शारीरिक, मानसिक, तंत्रिकीय, और आध्यात्मिक रूप से। बाल्यावस्था से एक आसन सिद्ध करने के प्रमुख लाभ: १. शारीरिक स्थिरता और लचीलापन: * जब कोई आसन दीर्घकाल तक किया जाता है, तो शरीर उसमें सहज हो जाता है। * हड्डियाँ, स्नायु, और जोड़ों में संतुलन और लचीलापन बढ़ता है। उदाहरण: पद्मासन सिद्ध करने से रीढ़ सीधी, पाचन मजबूत और रक्त प्रवाह संतुलित होता है। २. मानसिक एकाग्रता का तीव्र विकास: * आसन की स्थिरता से मन स्वतः ही भीतर की ओर मुड़ने लगता है। * एक आसन में बैठने से ध्यान, धारणा और मौन अभ्यास स्वाभाविक हो जाता है। लाभ: बालक चंचलता से मुक्त होकर गहरे ध्यान और अध्ययन में रुचि लेने लगता है। ३. तंत्रिका तंत्र की मजबूती: * सिद्ध आसन से मस्तिष्क और मेरुदण्ड के मध्य सधा हुआ संतुलन बनता है। * इससे सुषुम्ना नाड़ी (मुख्य ऊर्जा मार्ग) सक्रिय होने लगती है। लाभ: मानसिक स्थिरता, न्यूरॉन नेटवर्क की मजबूती और स्मृति शक्ति में वृद्धि होती है। ४. आसन सिद्धि से प्राणायाम और ध्यान में प्रगति: * योगशास्त्र कहता है कि "ध्यान से पूर्व आसन सिद्ध होना चाहिए।" * एक आसन जब सिद्ध हो जाता है तो प्राणायाम व ध्यान में विचलन नहीं आता। लाभ: बालक को कम आयु में ही उच्च साधनाओं का आधार मिल जाता है। ५. साधना में अनुशासन और धैर्य का विकास: * किसी भी एक आसन को सिद्ध करना धैर्य, अभ्यास और समर्पण की मांग करता है। * यह गुण बालक को जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी संयमी और अनुशासित बनाता है। लाभ: लक्ष्य के प्रति दृढ़ता और आत्मविश्वास का निर्माण। ६. ऊर्जा (प्राण) का संचार और संरक्षण: * सिद्ध आसन में ऊर्जा का अपव्यय नहीं होता। * शरीर ऊर्जा को भीतर स्थिर रखता है जिससे मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। लाभ: थकान कम, कार्यक्षमता अधिक, और आत्मचेतना में वृद्धि। ७. आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खुलना: * अनेक योगग्रंथों (जैसे हठयोग प्रदीपिका) में वर्णित है कि आसन सिद्ध हो जाए तो साधक धीरे-धीरे कुंडलिनी जागरण, ध्यान सिद्धि और समाधि अवस्था की ओर बढ़ सकता है। लाभ: बचपन से ही चेतना के उच्च स्तर को स्पर्श करने की क्षमता। बालकों के लिए उपयुक्त आसनों के उदाहरण: १. पद्मासन – ध्यान और प्राणायाम के लिए सबसे स्थिर और लाभकारी आसन; मन को शांत और शरीर को स्थिर बनाता है। २. सिद्धासन – ध्यान, नाड़ी शुद्धि और मानसिक संतुलन के लिए उपयुक्त; साधना में अत्यंत उपयोगी। ३. वज्रासन – भोजन के बाद भी किया जा सकता है; पाचन तंत्र को मजबूत करता है और ध्यान में सहायता करता है। ४. स्वस्तिकासन – सरल बैठने योग्य आसन; मन की स्थिरता और आत्म-विश्वास के विकास में सहायक। ५. सुखासन – प्रारंभिक अवस्था के लिए सरलतम ध्यान आसन; छोटे बच्चों के लिए सहज और आरामदायक। ६. शशकासन (बालासन) – थकान मिटाने वाला और मानसिक तनाव दूर करने वाला आसान योग आसन। ७. भद्रासन – पेल्विक क्षेत्र को मजबूत करता है, ध्यान और दीर्घ श्वास में उपयोगी है। ८. ताड़ासन – रीढ़ को लंबा करने और संतुलन विकसित करने में सहायक; बढ़ती उम्र के बच्चों के लिए उपयोगी। एक आसन को सिद्ध करना बालक के लिए जीवन का स्थायी वरदान है। यह न केवल शारीरिक या मानसिक लाभ देता है, बल्कि बचपन से ही आत्मनियंत्रण, आध्यात्मिकता और साधना में दृढ़ता की नींव रखता है। आज जब बालक बाहरी दुनिया के दबावों से घिरे हैं, तब एक सिद्ध आसन उन्हें भीतर से अडिग, शान्त और समर्थ बना सकता है। डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।
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sn vyas
617 views 23 days ago
#योग बाल्यकाल में प्राणायाम द्वारा मेधाशक्ति (बुद्धि-बल) कैसे प्राप्त करें ? प्रस्तावना: प्राणायाम केवल श्वास का व्यायाम नहीं है — यह प्राण (जीवनशक्ति) का नियंत्रित, सचेतन संचालन है। बाल्यकाल में, जब मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र तीव्र विकास के चरण में होता है, प्राणायाम के अभ्यास से मेधाशक्ति का तीव्र और स्थायी विकास संभव है। यह अभ्यास बच्चों को मानसिक रूप से तेज, भावनात्मक रूप से स्थिर और बौद्धिक रूप से उत्कृष्ट बनाता है। कैसे प्राणायाम मेधाशक्ति को विकसित करता है? १. प्राणशक्ति का जागरण: * प्राणायाम श्वास के माध्यम से शरीर में सजीव ऊर्जा का संचार करता है। * जब प्राण नियंत्रित होता है, तो मस्तिष्क की कोशिकाएँ अधिक सक्रिय और पोषित होती हैं। फलस्वरूप: मस्तिष्क की कार्यक्षमता, जागरूकता और सतर्कता में वृद्धि होती है। २. मस्तिष्क को प्रचुर ऑक्सीजन की आपूर्ति: * प्रत्येक प्राणायाम अभ्यास में श्वसन गहरा और धीमा होता है, जिससे मस्तिष्क को अधिकतम ऑक्सीजन मिलती है। * ऑक्सीजन की समुचित आपूर्ति से न्यूरॉन क्रियाशीलता (neuronal activity) बेहतर होती है। फलस्वरूप: स्मरण शक्ति और विचार प्रक्रिया तीव्र होती है। ३. मानसिक तनाव एवं चंचलता का नियंत्रण: * बच्चों में चिंता, परीक्षा का भय, अस्थिरता आदि मस्तिष्क की ऊर्जा को नष्ट करते हैं। * प्राणायाम, विशेषकर अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन, मस्तिष्क के तनाव केंद्रों को शांत करता है। फलस्वरूप: मानसिक संतुलन, एकाग्रता और भावनात्मक संयम आता है। ४. तंत्रिका तंत्र की सुदृढ़ता: * नियमित प्राणायाम से स्नायु तंत्र (Nervous System) शुद्ध, सक्रिय और सामर्थ्यशाली बनता है। * यह मानसिक सहनशक्ति और स्पष्ट सोच को बढ़ाता है। फलस्वरूप: बच्चा तीव्र बुद्धि के साथ स्थिर और संतुलित निर्णय लेना सीखता है। ५. मस्तिष्क के विशेष केंद्रों का सक्रिय होना: * कुछ प्राणायाम जैसे भ्रामरी और कपालभाति से मस्तिष्क के पीनियल ग्रंथि, हिप्पोकैम्पस और थैलेमस सक्रिय होते हैं। * ये केंद्र स्मृति, कल्पनाशक्ति और तर्कशक्ति से जुड़े हैं। फलस्वरूप: मेधाशक्ति, अंतर्ज्ञान और रचनात्मकता में तीव्र विकास होता है। बालकों के लिए उपयुक्त प्राणायाम और उनके लाभ: १. अनुलोम-विलोम प्राणायाम – यह श्वास को नियंत्रित करके मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों को संतुलित करता है, जिससे एकाग्रता और मानसिक स्थिरता बढ़ती है। २. भ्रामरी प्राणायाम – ‘म्’ की ध्वनि से मस्तिष्क को गूंजित करता है, जिससे बच्चों में तनाव कम होता है और ध्यान की क्षमता विकसित होती है। ३. नाड़ी शोधन प्राणायाम – शरीर की ऊर्जा नाड़ियों को शुद्ध करता है, जिससे स्मरण शक्ति और सोचने की स्पष्टता में वृद्धि होती है। ४. कपालभाति प्राणायाम – बलपूर्वक श्वास निष्कासन के माध्यम से आलस्य को दूर करता है और मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाता है। ५. शीतली एवं शीतकारी प्राणायाम – ठंडी श्वास के माध्यम से मानसिक शांति लाता है और बच्चों के मन में शीतलता और संतुलन की भावना विकसित करता है। इन सरल प्राणायामों से बालकों में न केवल मेधाशक्ति का विकास होता है, बल्कि आत्म-विश्वास, अनुशासन और मानसिक शुद्धता भी प्राप्त होती है। अभ्यास विधि: * समय: प्रातःकाल खाली पेट अथवा सायंकाल को शांत समय में। * स्थान: शान्त, खुली जगह, पीठ सीधी, ध्यान मुद्रा में बैठना। * आरम्भ: 5 मिनट से आरम्भ करके धीरे-धीरे 15–20 मिनट प्रतिदिन तक बढ़ाना। * मार्गदर्शन: योग्य गुरु या शिक्षक के निर्देशन में सिखाना उत्तम। प्राणायाम बालक के लिए केवल स्वास्थ्य का साधन नहीं, बल्कि उसकी बुद्धि, चेतना और आत्मबल का दीपक है। इसकी सरल तकनीकें बालकों के भीतर छिपी महान मेधा और मानसिक शक्ति को प्रकट करती हैं। यदि बाल्यकाल में ही प्राणायाम को जीवन का अभिन्न अङ्ग बना लिया जाए, तो वह बच्चा जीवन के हर क्षेत्र में उत्तम सफलता, संतुलन और नेतृत्व क्षमता का स्वामी बन सकता है। डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।
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