sn vyas
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#योग
बाल्यावस्था से एक आसन सिद्ध करने के लाभ
योगशास्त्र में कहा गया है —
"स्थिरं सुखं आसनम्"
अर्थात् — जो आसन स्थिर और सुखद हो, वही सिद्ध है।
बाल्यावस्था में यदि कोई बालक एक आसन को पूर्णतः सिद्ध कर लेता है, अर्थात उस आसन में लंबे समय तक सहज, स्थिर और सुखपूर्वक बैठ सकता है, तो वह उसके सम्पूर्ण जीवन में चमत्कारी लाभ देता है — शारीरिक, मानसिक, तंत्रिकीय, और आध्यात्मिक रूप से।
बाल्यावस्था से एक आसन सिद्ध करने के प्रमुख लाभ:
१. शारीरिक स्थिरता और लचीलापन:
* जब कोई आसन दीर्घकाल तक किया जाता है, तो शरीर उसमें सहज हो जाता है।
* हड्डियाँ, स्नायु, और जोड़ों में संतुलन और लचीलापन बढ़ता है।
उदाहरण: पद्मासन सिद्ध करने से रीढ़ सीधी, पाचन मजबूत और रक्त प्रवाह संतुलित होता है।
२. मानसिक एकाग्रता का तीव्र विकास:
* आसन की स्थिरता से मन स्वतः ही भीतर की ओर मुड़ने लगता है।
* एक आसन में बैठने से ध्यान, धारणा और मौन अभ्यास स्वाभाविक हो जाता है।
लाभ: बालक चंचलता से मुक्त होकर गहरे ध्यान और अध्ययन में रुचि लेने लगता है।
३. तंत्रिका तंत्र की मजबूती:
* सिद्ध आसन से मस्तिष्क और मेरुदण्ड के मध्य सधा हुआ संतुलन बनता है।
* इससे सुषुम्ना नाड़ी (मुख्य ऊर्जा मार्ग) सक्रिय होने लगती है।
लाभ: मानसिक स्थिरता, न्यूरॉन नेटवर्क की मजबूती और स्मृति शक्ति में वृद्धि होती है।
४. आसन सिद्धि से प्राणायाम और ध्यान में प्रगति:
* योगशास्त्र कहता है कि "ध्यान से पूर्व आसन सिद्ध होना चाहिए।"
* एक आसन जब सिद्ध हो जाता है तो प्राणायाम व ध्यान में विचलन नहीं आता।
लाभ: बालक को कम आयु में ही उच्च साधनाओं का आधार मिल जाता है।
५. साधना में अनुशासन और धैर्य का विकास:
* किसी भी एक आसन को सिद्ध करना धैर्य, अभ्यास और समर्पण की मांग करता है।
* यह गुण बालक को जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी संयमी और अनुशासित बनाता है।
लाभ: लक्ष्य के प्रति दृढ़ता और आत्मविश्वास का निर्माण।
६. ऊर्जा (प्राण) का संचार और संरक्षण:
* सिद्ध आसन में ऊर्जा का अपव्यय नहीं होता।
* शरीर ऊर्जा को भीतर स्थिर रखता है जिससे मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।
लाभ: थकान कम, कार्यक्षमता अधिक, और आत्मचेतना में वृद्धि।
७. आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खुलना:
* अनेक योगग्रंथों (जैसे हठयोग प्रदीपिका) में वर्णित है कि आसन सिद्ध हो जाए तो साधक धीरे-धीरे कुंडलिनी जागरण, ध्यान सिद्धि और समाधि अवस्था की ओर बढ़ सकता है।
लाभ: बचपन से ही चेतना के उच्च स्तर को स्पर्श करने की क्षमता।
बालकों के लिए उपयुक्त आसनों के उदाहरण:
१. पद्मासन – ध्यान और प्राणायाम के लिए सबसे स्थिर और लाभकारी आसन; मन को शांत और शरीर को स्थिर बनाता है।
२. सिद्धासन – ध्यान, नाड़ी शुद्धि और मानसिक संतुलन के लिए उपयुक्त; साधना में अत्यंत उपयोगी।
३. वज्रासन – भोजन के बाद भी किया जा सकता है; पाचन तंत्र को मजबूत करता है और ध्यान में सहायता करता है।
४. स्वस्तिकासन – सरल बैठने योग्य आसन; मन की स्थिरता और आत्म-विश्वास के विकास में सहायक।
५. सुखासन – प्रारंभिक अवस्था के लिए सरलतम ध्यान आसन; छोटे बच्चों के लिए सहज और आरामदायक।
६. शशकासन (बालासन) – थकान मिटाने वाला और मानसिक तनाव दूर करने वाला आसान योग आसन।
७. भद्रासन – पेल्विक क्षेत्र को मजबूत करता है, ध्यान और दीर्घ श्वास में उपयोगी है।
८. ताड़ासन – रीढ़ को लंबा करने और संतुलन विकसित करने में सहायक; बढ़ती उम्र के बच्चों के लिए उपयोगी।
एक आसन को सिद्ध करना बालक के लिए जीवन का स्थायी वरदान है।
यह न केवल शारीरिक या मानसिक लाभ देता है, बल्कि बचपन से ही आत्मनियंत्रण, आध्यात्मिकता और साधना में दृढ़ता की नींव रखता है। आज जब बालक बाहरी दुनिया के दबावों से घिरे हैं, तब एक सिद्ध आसन उन्हें भीतर से अडिग, शान्त और समर्थ बना सकता है।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।
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