sn vyas
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#योग
बाल्यावस्था में अष्टाङ्ग योग की आवश्यकता
बाल्यावस्था को "मूलाधार अवस्था" कहा जाता है — यह वह कालखंड है जब मनुष्य की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक नींव बनती है। इस अवस्था में डाली गई कोई भी आदत या संस्कार, आजीवन साथ रहता है। ऐसे में अष्टाङ्ग योग, जो पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित आठ अंगों वाला सम्यक् जीवन पथ है, बालकों के सर्वांगीण विकास का अत्यंत प्रभावी साधन है।
अष्टाङ्ग योग के आठ अंगों की बाल्यावस्था में भूमिका:
१. यम (सामाजिक अनुशासन):
सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह ब्रह्मचर्य
बाल्यकाल में लाभ:
* दूसरों के प्रति करुणा, सहयोग, सत्यता की भावना उत्पन्न करता है।
* चोरी, झूठ बोलना, क्रोध, लालच आदि स्वभावों का शमन करता है।
* बच्चों में आत्म-अनुशासन और सामाजिक चेतना की स्थापना करता है।
उदाहरण: जब बच्चा सत्य बोलने का अभ्यास करता है, तो वह डर से नहीं, नैतिक विवेक से सच बोलता है।
२. नियम (व्यक्तिगत अनुशासन):
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान
बाल्यकाल में लाभ:
* स्वच्छता और आहार-विहार की शुद्धता में सजगता।
* असंतोष और चंचलता पर नियंत्रण।
* प्रतिदिन अभ्यास (तप) की भावना।
* ईश्वर के प्रति श्रद्धा और आत्मनिरीक्षण की आदत।
उदाहरण: बच्चे स्वाध्याय द्वारा आत्मविश्लेषण करना सीखते हैं, जैसे — "क्या मैंने आज अपने माता-पिता का आदर किया?"
३. आसन (शारीरिक स्थिरता):
स्थिरं सुखं आसनम्
बाल्यकाल में लाभ:
* शरीर को लचीला, सुदृढ़ और संतुलित बनाता है।
* रीढ़ की हड्डी और स्नायविक तंत्र की सुदृढ़ता।
* लंबी उम्र के लिए आधार तैयार करता है।
उदाहरण: सूर्य नमस्कार, वज्रासन, ताड़ासन जैसे सरल आसन बच्चों में उत्साह और शरीर सौष्ठव का संचार करते हैं।
४. प्राणायाम (प्राणशक्ति का नियंत्रण):
बाल्यकाल में लाभ:
* मस्तिष्क को शुद्ध, केंद्रित और स्थिर करता है।
* श्वसन क्रिया के माध्यम से आत्म-नियंत्रण का विकास होता है।
* क्रोध, चंचलता और मानसिक असंतुलन को शांत करता है।
उदाहरण: अनुलोम-विलोम और भ्रामरी से बच्चे परीक्षा के समय तनाव से मुक्त हो सकते हैं।
५. प्रत्याहार (इंद्रियों का निग्रह):
बाल्यकाल में लाभ:
* बाहरी आकर्षणों से ध्यान हटाकर भीतर की ओर ले जाता है।
* मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम जैसी लतों से मुक्ति।
* आत्मावलोकन और आत्मसंयम की आदत बनती है।
उदाहरण: यदि कोई बच्चा अपने मन को स्वादिष्ट भोजन या स्क्रीन से हटाकर अध्ययन में लगा पाता है, तो वह प्रत्याहार का अभ्यास कर रहा है।
६. धारणा (एकाग्रता):
बाल्यकाल में लाभ:
* पढ़ाई, कला, खेल या किसी भी कौशल में पूर्ण एकाग्रता।
* बच्चों का मन चंचल होता है; यह अभ्यास उन्हें लक्ष्य के प्रति निष्ठावान बनाता है।
उदाहरण: जब बच्चा मौन बैठकर अपने लक्ष्य का ध्यान करता है — जैसे ‘मैं एक अच्छा डॉक्टर बनना चाहता हूँ’, तो यह धारणा है।
७. ध्यान (ध्यानावस्था):
बाल्यकाल में लाभ:
* मस्तिष्क की तरंगों को स्थिर करता है।
* आत्मविश्वास, रचनात्मकता और आत्म-संवाद में वृद्धि।
* बच्चा बाह्य तनावों से मुक्त रहकर अपने भीतर आनंद खोजता है।
उदाहरण: प्रतिदिन 5-10 मिनट मौन ध्यान से बच्चा भीतर से शांत, आत्मबलशाली बनता है।
८. समाधि (पूर्ण आत्म-अनुभूति):
बाल्यकाल में बीज रूप:
* बालक में ‘मैं कौन हूँ?’ का बीज पड़ता है।
* ईश्वर के साथ जुड़ाव, अहंकार का लोप, और सहज आनंद की अनुभूति प्रारंभ होती है।
उदाहरण: जब बच्चा बिना डर, लालच या क्रोध के मात्र करुणा और प्रेम से किसी की सहायता करता है — यह समाधि की ओर पहला कदम है।
बाल्यावस्था में अष्टाङ्ग योग की साधना केवल व्यायाम नहीं, एक समग्र जीवनशैली की नींव है। यह भविष्य के नागरिक को मानसिक रूप से सशक्त, शारीरिक रूप से सक्षम, भावनात्मक रूप से संतुलित और आध्यात्मिक रूप से जागरूक बनाती है। यदि स्कूलों, घरों और समाज में बच्चों को प्रारंभ से अष्टाङ्ग योग का संस्कार मिले — तो हम एक जागरूक, करुणामयी, और संतुलित पीढ़ी तैयार कर सकते हैं।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।
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