#विष्णु पुराण गाथा@ #भगवान विष्णु गरुड़ पुराण पर आधारित है
यह पावन कथा महाभारत के आदिपर्व और विष्णु पुराण में विस्तार से वर्णित है।
महर्षि कश्यप जब पुत्र प्राप्ति के लिए विशाल यज्ञ कर रहे थे, तब सभी देवता और ऋषि अपनी शक्ति अनुसार समिधा (यज्ञ की लकड़ी) एकत्र कर रहे थे। बालखिल्य ऋषि, जिनका शरीर अंगूठे के पोर के बराबर (अंगुष्ठमात्र) था, वे साठ हजार मिलकर पलाश की एक छोटी टहनी को बड़ी श्रद्धा और परिश्रम से खींचकर ला रहे थे।
मार्ग में एक गाय के खुर के निशान (गोष्पद) में भरे वर्षा के जल में वे गिर पड़े और बाहर निकलने का प्रयास करने लगे। तभी देवराज इंद्र अपने विशाल ऐरावत हाथी के समान पर्वताकार लकड़ियों के ढेर को उठाकर आकाश मार्ग से तीव्र वेग से गुजरे।
इंद्र ने जब उन सूक्ष्म ऋषियों को जल में संघर्ष करते देखा, तो अहंकारवश उनका उपहास उड़ाया और उनका अनादर करते हुए उन्हें लांघकर चले गए।
ऋषियों का घोर तप और संकल्प
इस अपमान से क्षुब्ध होकर बालखिल्य ऋषियों ने उसी क्षण हवन कुंड प्रज्वलित कर आहुति देनी शुरू की। उन्होंने संकल्प लिया:
"इन्द्रस्यान्यो भवेदिन्द्रः सर्वकामगमो बली।"
(अर्थात: वर्तमान इंद्र को पदच्युत करने वाला, इच्छानुसार गमन करने वाला और अत्यंत बलवान एक 'नया इंद्र' उत्पन्न हो।)
ऋषियों के तपोबल से इंद्र का सिंहासन डोल उठा। भयभीत इंद्र प्रजापति कश्यप की शरण में पहुंचे।
कश्यप मुनि का समाधान और गरुड़ का प्राकट्य
महर्षि कश्यप ने बालखिल्य ऋषियों को शांत किया और विनती की कि ब्रह्मा जी के विधान अनुसार देवराज का पद नष्ट न हो। ऋषियों ने कश्यप जी के सम्मान में अपने संकल्प का फल उन्हें सौंप दिया और कहा कि यह तेजस्वी उत्पन्न होने वाला जीव 'पक्षियों का इंद्र' (पक्षीराज) बनेगा।
कश्यप मुनि ने वह तपोमय तेज अपनी पत्नी विनता को प्रदान किया, जिसके फलस्वरूप महाबली गरुड़ का जन्म हुआ। आगे चलकर गरुड़ ने अकेले ही अमरावती पर आक्रमण कर इंद्र सहित समस्त देवताओं को परास्त किया और अमृत कलश प्राप्त कर बालखिल्य ऋषियों के उस तेज और वचन को सत्य सिद्ध किया।