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पारिवारिक कहानी 🤱
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Sachin Sharma
638 views 1 months ago
“माँ ने चूल्हा ठंडा क्यों रखा?” — माँ–बेटी की भावुक कहानी शाम के लगभग साढ़े छह बज रहे थे। गली में लाइटें एक-एक कर जलने लगी थीं। राधिका स्कूटी से उतरकर थके कदमों से घर की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। पूरे दिन ऑफिस की भागदौड़, ट्रैफिक की धक्कामुक्की, और बॉस की डांट… वह बस एक ही चीज़ चाहती थी — घर पहुँचकर आराम, और माँ के हाथ का गरमा-गरम खाना। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, अजीब-सी खामोशी ने उसका स्वागत किया। न गैस की सीटी, न मसालों की खुशबू, न माँ की पुकार — “आ गई बेटा?” राधिका चौक गई। माँ सोफे पर चुपचाप बैठी थीं। चेहरा शांत, पर आँखों के नीचे हल्की थकान की रेखाएँ साफ़ दिख रही थीं। “माँ, खाना नहीं बनाया क्या?” राधिका ने हल्का-सा हंसते हुए पूछा, “आज छुट्टी ले ली आपने किचन से?” माँ ने मुस्कुरा कर कहा, “सोचा… बेटियाँ भी कभी थकती होंगी। आज तू भी आराम कर ले।” राधिका को माँ की बात प्यारी लगी। “ठीक है माँ, ऑर्डर कर लेते हैं बाहर से। आज दोनों आराम करेंगे।” दोनों ने हंसकर खाना मंगाया, साथ टीवी देखा, और थोड़ी देर बातें भी कीं। राधिका को सब बिल्कुल सामान्य लगा। पर रात लगभग 11 बजे… जब वह पानी लेने किचन में गई, तभी उसका पैर कुछ काँच जैसी चीज़ पर पड़ा — वह चौंक गई। ज़मीन पर कांच के छोटे-छोटे टुकड़े फैले थे। राधिका झटपट झाड़ू लगाने लगी और तभी उसकी नज़र गई कि — रैक में रखा गैस सिलेंडर का कार्ड गायब था। उसके दिल में शक-सा हुआ। वह कमरे में लौटकर धीरे से बोली, “माँ… सिलेंडर खत्म हो गया क्या?” माँ ने हिचकते हुए सिर झुका लिया, “हाँ… दो दिन पहले खत्म हो गया था।” “तो आपने बताया क्यों नहीं? आज खाना क्यों नहीं बनाया?” राधिका की आवाज़ भर्रा गई। माँ ने गहरी साँस ली, “बेटा… नए सिलेंडर के पैसे नहीं थे इस बार। सोचा, तू ऑफिस से आती है… थकी रहती है… तुझे पता चलता तो परेशान हो जाती। इसलिए…” माँ ने अपनी पंजाबी चूड़ियों की ओर इशारा किया जो हमेशा उनकी कलाई में खनकती थीं — आज गायब थीं। राधिका के दिल पर जैसे किसी ने जोर से चोट मारी। “माँ… आपने चूड़ियाँ बेच दीं?” उसकी आँखें भर आईं। माँ ने हल्की-सी मुस्कान दी, “बिजली का बिल भी भरना था राधिका। मैंने सोचा— लाइट बंद हो गई तो तू अंधेरे में कैसे पढ़ेगी, कैसे काम करेगी?” राधिका वहीं बैठ गई… दिल रो पड़ा। उसने माँ को कसकर गले से लगा लिया, “माँ… ये सब मुझसे छुपाया क्यों? मैं छोटी बच्ची नहीं हूँ… मैं भी आपकी जिम्मेदारी हूँ।” माँ की आँखें आखिर भर ही आईं, “तू मेरी थकान है क्या? नहीं… तू मेरी ताकत है। बस… कभी-कभी माँ को खुद को तोड़ना पड़ता है । रात गहरी हो चुकी थी। पर उस घर में रोशनी किसी बल्ब से नहीं — माँ की निस्वार्थ मोहब्बत से फैली हुई थी। राधिका ने माँ का हाथ थामकर कहा, “अब से घर की हर परेशानी — मेरी भी है। अब आप अकेली नहीं हैं, माँ।” माँ मुस्कुरा दीं। और उस मुस्कान में सुकून था। --- सीख — “माँ कभी कमी नहीं दिखाती… बस खुद को कम कर लेती है, ताकि बच्चों की जिंदगी पूरी रह सके।” --- पाठकों से निवेदन 🙏 मेरे प्रिय पाठकों, मै एक लेखक हूं, मै हिन्दी कहानियां एवं साहित्य लिखता हूं। मेरा काम सिर्फ कहानियां लिखना नहीं, बल्कि ऐसी कहानियां लिखना है जिससे कि लोगों को अच्छी सीख मिले। आप सब पाठकों से निवेदन है 🙏, कि मुझ जैसे लेखक को सपोर्ट कीजिए। बस मेरी रचनाओं को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। और मुझे Follow कर लीजिए, ऐसी ही अदभुत और शिक्षाप्रद कहानियां पढ़ने के लिए। धन्यवाद ❤️ #📚कविता-कहानी संग्रह #📓 हिंदी साहित्य #👀रोमांचक कहानियाँ 🕵️‍♂️ #पारिवारिक कहानी 🤱 #🙏 प्रेरणादायक विचार
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