भक्ति पौराणिक कथा

14 Posts • 15K views
sn vyas
676 views 1 months ago
#पौराणिक कथा हयग्रीव नाम के दानव ने माता आदिशक्ति की तपस्या करके वरदान पा लिया था कि उसे केवल वही मार सकता है जो आधा मनुष्य और आधा घोड़ा (हयग्रीव) हो। इस वरदान के मिलते ही वह अमरता के घमंड में चूर हो गया और उसने स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया। जब देवताओं की रक्षा के लिए साक्षात भगवान विष्णु (नारायण) युद्ध के मैदान में उतरे, तो दानव और भगवान के बीच एक प्रलयंकारी युद्ध शुरू हुआ। वह युद्ध १ या २ दिन नहीं, बल्कि पूरे एक हज़ार (१०००) वर्षों तक निरंतर चलता रहा। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र, कौमोदकी गदा और शांग्र धनुष से उस राक्षस पर हज़ारों प्रहार किए। लेकिन देवी के वरदान के 'कवच' के कारण दुष्ट दानव पर किसी भी अस्त्र का कोई असर नहीं हो रहा था। एक हज़ार वर्ष तक बिना रुके, बिना थमे युद्ध करने के कारण साक्षात भगवान विष्णु का दिव्य शरीर भी अत्यंत थक गया। वे पूरी तरह व्याकुल हो गए कि इस दानव का अंत क्यों नहीं हो रहा। युद्ध भूमि में थोड़ी देर का विराम देखकर, भगवान विष्णु कुरुक्षेत्र के पास (या एक एकांत स्थान पर) गए। वे इतने थक चुके थे कि उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) को ज़मीन पर टिकाया और उस धनुष के ऊपरी नुकीले सिरे पर अपनी ठोड़ी को रखकर, उसी के सहारे खड़े-खड़े ही गहरी निद्रा (योगनिद्रा) में चले गए। इधर दानव फिर से युद्ध के लिए ललकार रहा था और उधर भगवान विष्णु गायब थे। ब्रह्मा, इंद्र और शिव जी उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंचे जहाँ नारायण सो रहे थे। देवताओं को लगा कि यदि नारायण तुरंत नहीं जागे, तो दानव सब कुछ नष्ट कर देगा। उन्हें जगाने के लिए इंद्र ने 'वम्री' (दीमकों) से कहा कि तुम धनुष की डोरी को काट दो, जिससे धनुष हिलेगा और प्रभु जाग जाएंगे। (बदले में दीमकों को यज्ञ में भाग मिलने का वरदान मिला)। जैसे ही दीमकों ने उस कसी हुई डोरी को काटा, धनुष एक भयानक ब्रह्मांडीय गर्जना के साथ सीधा हुआ। वह झटका इतना तीव्र था कि धनुष के वेग से भगवान विष्णु का मस्तक (सिर) कटकर आकाश में ओझल हो गया। जब चारों ओर अंधकार छा गया और देवता रोने लगे कि यह क्या अनर्थ हो गया, तब महामाया (आदिशक्ति) आकाशवाणी के रूप में प्रकट हुईं। उन्होंने मुस्कुराकर रोते हुए देवताओं से कहा: "हे देवताओं! दुखी मत हो। यह नारायण की कोई पराजय नहीं है, बल्कि यह तो उस दानव के अंत का समय है। वह दानव १००० वर्ष के युद्ध में इसलिए नहीं हारा क्योंकि उसे केवल 'हयग्रीव' (अश्वमुख) ही मार सकता है। यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है। अब देर मत करो, एक श्वेत घोड़े का सिर लाओ और नारायण के धड़ से जोड़ दो। इसके बाद देवताओं ने विश्वकर्मा की मदद से घोड़े का सिर प्रभु के धड़ से जोड़ा, और भगवान विष्णु ने 'हयग्रीव अवतार' लेकर पल भर में उस दानव का वध कर दिया, जिससे १००० वर्ष से चला आ रहा वह संकट हमेशा के लिए समाप्त हो गया। !!जय श्री कृष्णा!!
12 likes
16 shares
sn vyas
590 views 5 days ago
#पौराणिक कथा #पौराणिक अनसुनी कहानियाँ ब्रह्मा जी और रावण की कथा प्राचीन काल में राक्षसराज रावण लंका का अत्यंत शक्तिशाली और विद्वान राजा था। वह महर्षि विश्रवा और राक्षसी कैकसी का पुत्र था। रावण ने वेद, शास्त्र, ज्योतिष और संगीत का गहन अध्ययन किया था। वह भगवान शिव का परम भक्त भी था। लेकिन उसके भीतर अपार शक्ति और अमरता पाने की तीव्र इच्छा थी। इसी उद्देश्य से रावण ने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। वह एक निर्जन वन में जाकर हजारों वर्षों तक तप करने लगा। उसकी तपस्या इतनी कठिन थी कि देवता भी चिंतित हो उठे। जब भी ब्रह्मा जी प्रकट नहीं हुए, रावण ने अपना एक-एक सिर काटकर अग्नि में अर्पित करना शुरू कर दिया। उसने नौ सिरों की आहुति दे दी। जब वह दसवाँ सिर काटने वाला था, तभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा उसके सामने प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर कहा, "वत्स रावण! मैं तुम्हारी कठोर तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। वर मांगो।" रावण ने कहा, "प्रभु! मुझे अमरता का वरदान दीजिए।" ब्रह्मा जी बोले, "अमरता किसी भी प्राणी को नहीं दी जा सकती। कोई दूसरा वर मांगो।" तब रावण ने सोचा कि देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व और नाग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उसने मनुष्यों और वानरों को तुच्छ समझकर उनसे सुरक्षा नहीं मांगी। उसने कहा, "मुझे देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व और नाग किसी के द्वारा भी न मारा जा सके।" ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया। साथ ही उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसके सभी कटे हुए सिर पुनः जोड़ दिए। इस वरदान के कारण रावण अत्यंत शक्तिशाली हो गया। शक्ति प्राप्त करने के बाद रावण का अहंकार बढ़ने लगा। उसने देवताओं को पराजित किया, अनेक लोकों पर अधिकार कर लिया और ऋषि-मुनियों को भी परेशान करने लगा। उसका अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में गए। तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर भगवान राम के रूप में अवतार लिया। रावण ने माता सीता का हरण कर लिया, जिसके कारण भगवान राम और रावण के बीच महान युद्ध हुआ। अंततः युद्ध में भगवान राम ने रावण का वध किया। इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान ने रावण को महान शक्ति तो दी, लेकिन उसका अहंकार ही उसके विनाश का कारण बना। यह कथा हमें सिखाती है कि ज्ञान, शक्ति और वरदान तभी कल्याणकारी होते हैं जब उनका उपयोग धर्म और विनम्रता के साथ किया जाए। अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित होता है। जय श्री राम🌹🌹🌹❤❤ साभार~ पं देव शर्मा🔥
18 likes
6 shares
sn vyas
687 views 18 days ago
#पौराणिक कथा प्रलम्बासुर वध – जब बलराम जी ने छल पर धर्म की विजय का संदेश दिया वृंदावन की पावन धरा उस दिन भी आनंद और उल्लास से महक रही थी। यमुना की शीतल लहरें मंद-मंद बह रही थीं, कदंब के वृक्षों पर बैठे पक्षी मधुर स्वर में गान कर रहे थे और चारों ओर हरियाली बिखरी हुई थी। गौएँ निश्चिंत होकर चर रही थीं, जबकि ग्वालबाल अपने प्रिय कान्हा और दाऊ जी के साथ हँसी-खुशी वन की ओर बढ़ रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंख शोभायमान था, हाथों में मुरली थी और उनके अधरों पर मन मोह लेने वाली मुस्कान खिली हुई थी। उनके साथ चल रहे बलराम जी अपने दिव्य तेज और बल से सभी का मन मोह रहे थे। वन में पहुँचते ही सभी सखा खेल-कूद में मग्न हो गए। कोई पेड़ों पर चढ़ रहा था, कोई बाँसुरी की धुन पर झूम रहा था, तो कोई बछड़ों के पीछे दौड़ रहा था। पूरा ब्रज वन उनकी हँसी से गूँज उठा। उधर मथुरा में अत्याचारी कंस भय और क्रोध से व्याकुल था। उसके भेजे गए अनेक असुर—पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, वत्सासुर, बकासुर, अघासुर और धेनुकासुर—भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारे जा चुके थे। क्रोधित होकर उसने अपने सबसे मायावी और शक्तिशाली दैत्य प्रलम्बासुर को बुलाया और कहा— "ग्वालबाल का रूप धारण कर वृंदावन पहुँचो। उचित अवसर मिलते ही कृष्ण और बलराम का अंत कर दो।" प्रलम्बासुर ने आज्ञा स्वीकार की और देखते ही देखते एक सुंदर ग्वालबाल का रूप धारण कर वृंदावन पहुँच गया। उसका वेश इतना स्वाभाविक था कि कोई भी उसे पहचान न सका। लेकिन जो समस्त संसार के अंतर्यामी हैं, उनसे भला क्या छिप सकता था? भगवान श्रीकृष्ण ने उसे देखते ही पहचान लिया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, केवल मुस्कुराए और मन ही मन विचार किया— "आज संसार मेरे बड़े भाई बलराम के अद्भुत पराक्रम का दर्शन करेगा।" कुछ देर बाद श्रीकृष्ण ने सभी सखाओं से कहा— "चलो, आज एक नया खेल खेलते हैं।" सभी प्रसन्न हो गए। दो दल बनाए गए। एक दल का नेतृत्व श्रीकृष्ण ने किया और दूसरे का बलराम जी ने। खेल का नियम बड़ा सरल था—जो हार जाएगा, वह विजेता को अपनी पीठ पर बैठाकर निश्चित स्थान तक ले जाएगा। प्रलम्बासुर जानबूझकर बलराम जी की टोली में शामिल हो गया। खेल समाप्त हुआ और श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार प्रलम्बासुर हार गया। अब उसे नियम के अनुसार बलराम जी को अपनी पीठ पर बैठाना पड़ा। बलराम जी निश्चिंत होकर उसकी पीठ पर बैठ गए। कुछ दूर तक वह सामान्य गति से चलता रहा, लेकिन अचानक तेज़ी से वन के भीतर भागने लगा। उसके मन में विचार था— "अब मैं इन्हें सबसे दूर ले जाकर मार डालूँगा।" थोड़ी ही देर में उसने अपना वास्तविक राक्षसी रूप धारण कर लिया। उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया, नेत्र अग्नि की भाँति लाल हो उठे और उसका विकराल स्वरूप देखकर कोई भी भयभीत हो सकता था। किन्तु बलराम जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया। उनके तेज और बल से प्रलम्बासुर की गति मंद पड़ने लगी। उसे अनुभव हुआ मानो उसकी पीठ पर कोई बालक नहीं, बल्कि स्वयं पर्वत का भार बैठ गया हो। वह घबराकर रुक गया। उसी क्षण बलराम जी ने अपनी वज्र समान मुट्ठी बाँधी और पूरी शक्ति से उसके मस्तक पर प्रहार कर दिया। वह प्रहार इतना प्रचंड था कि मानो स्वयं इंद्र का वज्र गिर पड़ा हो। प्रलम्बासुर का सिर फट गया, उसके मुख से रक्त बह निकला और वह जोरदार गर्जना करता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। कुछ ही क्षणों में उसके प्राण निकल गए। भगवान की कृपा से उसके शरीर से दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और उसे भी मोक्ष प्राप्त हुआ। इसी बीच श्रीकृष्ण और अन्य ग्वालबाल वहाँ पहुँच गए। बलराम जी का पराक्रम देखकर सभी आनंद से भर उठे और एक स्वर में जयघोष करने लगे— "दाऊ जी की जय!" "हलधर भगवान की जय!" भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर अपने बड़े भाई को गले लगाया और कहा— "दाऊ! आपने आज ब्रजवासियों को एक और बड़े संकट से बचा लिया।" देवलोक से पुष्पों की वर्षा होने लगी। गंधर्वों ने मधुर गीत गाए और दुंदुभियाँ बज उठीं। ऋषि-मुनियों ने कहा— "बलराम जी स्वयं अनंत शेष के अवतार हैं। उनका दिव्य बल सदैव धर्म और भक्तों की रक्षा के लिए समर्पित है।" संध्या होने पर सभी ग्वालबाल गौओँ के साथ नंदगाँव लौट आए। यशोदा मैया ने प्रेमपूर्वक कृष्ण और बलराम की आरती उतारी, रोहिणी माता ने दाऊ जी को हृदय से लगा लिया और नंद बाबा ने ब्राह्मणों को दान देकर पूरे ब्रज में उत्सव मनाया। चारों ओर केवल एक ही स्वर गूँज रहा था— "जय श्रीबलराम!" "जय श्रीकृष्ण!" 🌺 आध्यात्मिक संदेश प्रलम्बासुर केवल एक राक्षस नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपे छल, कपट, अहंकार और स्वार्थ का प्रतीक है। वह मित्र बनकर आया, जिससे यह शिक्षा मिलती है कि हर मुस्कुराता चेहरा सच्चा हितैषी नहीं होता। बलराम जी गुरु-तत्त्व, आत्मबल, विवेक और धर्म के प्रतीक हैं। जब मनुष्य गुरु की शरण, सत्य के मार्ग और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति को अपनाता है, तब उसके भीतर छिपे प्रलम्बासुर रूपी दोष स्वयं नष्ट हो जाते हैं। सच्ची शक्ति शरीर में नहीं, बल्कि सत्य, धर्म, भक्ति और सदाचार में होती है। अंततः विजय उसी की होती है जो धर्म के मार्ग पर चलता है। ॥ राधे-राधे ॥ ॥ जय श्रीकृष्ण ॥ ॥ जय श्रीबलराम ॥
19 likes
8 shares