sn vyas
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#पौराणिक कथा
हयग्रीव नाम के दानव ने माता आदिशक्ति की तपस्या करके वरदान पा लिया था कि उसे केवल वही मार सकता है जो आधा मनुष्य और आधा घोड़ा (हयग्रीव) हो। इस वरदान के मिलते ही वह अमरता के घमंड में चूर हो गया और उसने स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया।
जब देवताओं की रक्षा के लिए साक्षात भगवान विष्णु (नारायण) युद्ध के मैदान में उतरे, तो दानव और भगवान के बीच एक प्रलयंकारी युद्ध शुरू हुआ।
वह युद्ध १ या २ दिन नहीं, बल्कि पूरे एक हज़ार (१०००) वर्षों तक निरंतर चलता रहा।
भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र, कौमोदकी गदा और शांग्र धनुष से उस राक्षस पर हज़ारों प्रहार किए। लेकिन देवी के वरदान के 'कवच' के कारण दुष्ट दानव पर किसी भी अस्त्र का कोई असर नहीं हो रहा था।
एक हज़ार वर्ष तक बिना रुके, बिना थमे युद्ध करने के कारण साक्षात भगवान विष्णु का दिव्य शरीर भी अत्यंत थक गया। वे पूरी तरह व्याकुल हो गए कि इस दानव का अंत क्यों नहीं हो रहा।
युद्ध भूमि में थोड़ी देर का विराम देखकर, भगवान विष्णु कुरुक्षेत्र के पास (या एक एकांत स्थान पर) गए। वे इतने थक चुके थे कि उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) को ज़मीन पर टिकाया और उस धनुष के ऊपरी नुकीले सिरे पर अपनी ठोड़ी को रखकर, उसी के सहारे खड़े-खड़े ही गहरी निद्रा (योगनिद्रा) में चले गए।
इधर दानव फिर से युद्ध के लिए ललकार रहा था और उधर भगवान विष्णु गायब थे। ब्रह्मा, इंद्र और शिव जी उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंचे जहाँ नारायण सो रहे थे।
देवताओं को लगा कि यदि नारायण तुरंत नहीं जागे, तो दानव सब कुछ नष्ट कर देगा। उन्हें जगाने के लिए इंद्र ने 'वम्री' (दीमकों) से कहा कि तुम धनुष की डोरी को काट दो, जिससे धनुष हिलेगा और प्रभु जाग जाएंगे। (बदले में दीमकों को यज्ञ में भाग मिलने का वरदान मिला)।
जैसे ही दीमकों ने उस कसी हुई डोरी को काटा, धनुष एक भयानक ब्रह्मांडीय गर्जना के साथ सीधा हुआ। वह झटका इतना तीव्र था कि धनुष के वेग से भगवान विष्णु का मस्तक (सिर) कटकर आकाश में ओझल हो गया।
जब चारों ओर अंधकार छा गया और देवता रोने लगे कि यह क्या अनर्थ हो गया, तब महामाया (आदिशक्ति) आकाशवाणी के रूप में प्रकट हुईं। उन्होंने मुस्कुराकर रोते हुए देवताओं से कहा:
"हे देवताओं! दुखी मत हो। यह नारायण की कोई पराजय नहीं है, बल्कि यह तो उस दानव के अंत का समय है। वह दानव १००० वर्ष के युद्ध में इसलिए नहीं हारा क्योंकि उसे केवल 'हयग्रीव' (अश्वमुख) ही मार सकता है। यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है। अब देर मत करो, एक श्वेत घोड़े का सिर लाओ और नारायण के धड़ से जोड़ दो।
इसके बाद देवताओं ने विश्वकर्मा की मदद से घोड़े का सिर प्रभु के धड़ से जोड़ा, और भगवान विष्णु ने 'हयग्रीव अवतार' लेकर पल भर में उस दानव का वध कर दिया, जिससे १००० वर्ष से चला आ रहा वह संकट हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
!!जय श्री कृष्णा!!
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