#🪔शुक्र प्रदोष व्रत 🌺सोमवारी बाबा: हिमालय के एक सिद्ध योगी की दिव्य कथा
हिमालय की शांत वादियों में कई ऐसे महापुरुष हुए, जिनका जीवन स्वयं एक चमत्कार था। ऐसे ही एक सिद्ध योगी थे — सोमवारी बाबा, जिनका नाम आज भी श्रद्धा और रहस्य के साथ लिया जाता है।
🌸 जन्म और वैराग्य की शुरुआत
सोमवारी बाबा का जन्म लगभग सन् 1815 में आज के पाकिस्तान में स्थित पिण्डदादनखाँ नामक स्थान पर माना जाता है। उनके पिता एक सेशन जज थे। घर में धन-वैभव, सम्मान और सुविधा की कोई कमी नहीं थी, फिर भी बाल्यावस्था से ही उनका मन सांसारिकता से विरक्त रहने लगा।
जो बालक खेल-कूद में रमने की उम्र में होता है, वही बालक जीवन के गूढ़ रहस्यों की खोज में निकल पड़ा।
🔥 बाल्यावस्था में गृहत्याग और कठोर तप
अल्पायु में ही उन्होंने गृहत्याग कर दिया और हिमालय की दुर्गम कन्दराओं में कठोर तपस्या में लीन हो गए। मात्र बारह वर्ष की आयु में उन्होंने देवभूमि की वन गुफाओं में डेरा डाल लिया।
उनकी साधना स्थली रही —
काकड़ीघाट, खैरना, कैंची, पद्मपुरी, पलड़ा और हलद्वानी (बरेली रोड)।
📿 सोमवारी बाबा नाम कैसे पड़ा
वे हर सोमवार को भंडारा कराते थे। जो भी आता, भूखा नहीं लौटता। इसी कारण भक्तों ने उन्हें प्रेमपूर्वक “सोमवारी बाबा” कहना शुरू किया।
उनका संन्यास नाम बताया जाता है —
श्री 108 परमानन्द हरिहर दास।
👁️ दिव्य व्यक्तित्व और जीवन-शैली
सोमवारी बाबा का जीवन अत्यंत सरल था। उनका परिधान मात्र लंगोट और एक साधारण गमछा हुआ करता था।
लंबा कद, जटाजूट, हल्की दाढ़ी-मूँछ और मुखमंडल पर ऐसी अद्भुत शांति — मानो स्वयं करुणा ने मानव रूप धारण कर लिया हो।
उनकी उपस्थिति मात्र से ही लोगों के मन शांत हो जाते थे।
🔮 त्रिकालदर्शी योगी
भक्तों का मानना था कि सोमवारी बाबा भूत, वर्तमान और भविष्य को जानते थे।
जो व्यक्ति अपनी समस्या लेकर उनके पास आता, उसे बोलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी।
अक्सर उत्तर प्रश्न पूछे जाने से पहले मिल जाता था।
फिर भी, इतने सिद्ध होते हुए भी वे अत्यंत विनम्र थे।
वे बिना शर्त सभी से प्रेम करते थे और जो भी उनके पास सच्चे भाव से आता, उसकी सहायता करते थे।
🍚 अन्नपूर्णा का चमत्कार
सोमवारी बाबा के आश्रम में एक और अद्भुत चमत्कार देखने को मिलता था।
चाहे कितने ही लोग आ जाएँ, भोजन हमेशा पर्याप्त रहता था।
यह असंभव-सा प्रतीत होता था, फिर भी हर बार भोजन बच जाता था।
सबसे विशेष बात यह थी कि सोमवारी बाबा हमेशा सबसे अंत में भोजन करते थे।
🛡️ दिव्य सुरक्षा का अनुभव
जो भक्त काकड़ीघाट और अन्य दुर्गम स्थलों की खतरनाक पहाड़ी पगडंडियों से उनके दर्शन हेतु जाते थे, वे बताते थे कि उन्हें मार्ग में अदृश्य दिव्य सुरक्षा का अनुभव होता था।
मानो कोई अनदेखी शक्ति उनकी रक्षा कर रही हो।
🕉️ काकड़ीघाट और गुदड़ी महाराज
काकड़ीघाट एक अत्यंत पवित्र स्थल है। यहीं गुदड़ी महाराज ने जीवित समाधि ली थी, जहाँ आज भी भक्त श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
यही सोमवारी बाबा का प्रथम आश्रम भी रहा।
🌿 पद्मपुरी: अंतिम धाम
सोमवारी बाबा का दूसरा प्रमुख आश्रम पद्मपुरी रहा।
यह स्थान बाँज और चीड़ के घने वृक्षों से आच्छादित, ऊँचे शैलशिखरों से घिरा हुआ है।
उन्होंने जीवन का अधिकांश समय काकड़ीघाट, खैरना और कैंची में साधना करते बिताया,
किन्तु पद्मपुरी में वे ब्रह्मलीन हुए।
यहीं उन्हें चिताग्नि दी गई।
🌺 अमर स्मृति
सोमवारी बाबा भले ही शरीर से विलीन हो गए हों,
पर उनकी साधना, करुणा और दिव्यता आज भी हिमालय की वायु में प्रवाहित होती है।
वे सिद्ध करते हैं कि
👉 सच्चा योग वैभव में नहीं, त्याग में है
👉 सच्ची शक्ति प्रेम और करुणा में है
सोमवारी बाबा — एक नाम नहीं, एक अनुभूति।
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