🕉️ सनातन संस्कृति की झलक: धर्मशास्त्रों में वर्णित विवाह के 8 प्रकार 🕉️
हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति और धर्मशास्त्रों में विवाह को केवल एक सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार माना गया है। प्राचीन काल में समाज की विभिन्न स्थितियों को देखते हुए ऋषियों ने विवाह के 8 प्रकारों का वर्णन किया था।
क्या आप जानते हैं कि ये 8 प्रकार कौन से थे? आइए एक नजर डालते हैं:
✨ प्रशस्त (मान्य और उत्तम) विवाह:
1️⃣ ब्रह्म विवाह: इसे सर्वोत्तम विवाह माना जाता था। इसमें माता-पिता अपनी कन्या को अलंकृत कर, एक योग्य वर को पूरे सम्मान के साथ सौंपते थे। यह आपसी सामंजस्य और सहयोग की आदर्श व्यवस्था थी।
2️⃣ दैव विवाह: एक अत्यंत पवित्र रूप, जिसमें पिता अपनी कन्या को देवकार्य में लगे किसी योग्य पुरोहित को सौंप देता था।
3️⃣ आर्ष विवाह: यह एक प्रतिष्ठित रूप था, जिसमें वर पक्ष द्वारा कन्या के पिता को सम्मान स्वरूप गाय-बैल का जोड़ा दिया जाता था।
4️⃣ प्रजापात्य विवाह: इसमें वर-वधू के समान अधिकार होते थे। संपूर्ण विधि-विधान के साथ यह विवाह संतान प्राप्ति और जीवन भर सहयोग के उद्देश्य से किया जाता था।
✨ अन्य और निंदनीय विवाह:
5️⃣ गांधर्व विवाह (प्रेम विवाह): यह आज का 'लव मैरिज' है। इसमें वर-कन्या माता-पिता की अनुमति के बिना, आपसी सहमति और प्रेम के आधार पर विवाह करते थे। (कामसूत्र में इसे आदर्श माना गया है)।
6️⃣ असुर विवाह: यह एक प्रकार का व्यावसायिक विवाह था, जहाँ कन्या के परिवार द्वारा वर पक्ष से धन की मांग की जाती थी।
7️⃣ राक्षस विवाह: यह क्रूर रूप था, जिसमें कन्या के परिवार से युद्ध कर, उसे बलपूर्वक छीनकर विवाह किया जाता था।
8️⃣ पैशाच विवाह: यह विवाह का सबसे निम्न और अनैतिक रूप था। इसमें सोती हुई या मदहोश कन्या के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन विवाह किया जाता था। समाज इसे बहिष्कृत करता था।
यह वर्गीकरण दर्शाता है कि हमारा प्राचीन समाज कितना विविध था और समय के साथ आदर्शों में कैसे बदलाव आया।
जहाँ एक ओर 'ब्रह्म विवाह' को सर्वोत्तम माना जाता था, जिसमें माता-पिता पूरे सम्मान के साथ कन्यादान करते थे।
वहीं दूसरी ओर, 'गांधर्व विवाह' भी प्रचलित था, जिसे आज हम 'प्रेम विवाह' (Love Marriage) कहते हैं, जहाँ आपसी सहमति ही मुख्य होती थी।
इनके अलावा, कुछ ऐसे रूप भी थे जिन्हें समाज में निंदनीय माना जाता था, जैसे बलपूर्वक किया गया 'राक्षस विवाह' या छल से किया गया 'पैशाच विवाह'।
इन आठ प्रकारों (ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्रजापात्य, असुर, गांधर्व, राक्षस, पैशाच) का अध्ययन हमें बताता है कि भारतीय संस्कृति में विवाह संस्था का विकास कैसे हुआ।
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