महाभारत स्टेटस#

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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः वारणावत में पाण्डवों का स्वागत, पुरोचन का सत्कार पूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृह में निवास की व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेन की बातचीत...(दिन 430) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच ततः सर्वाः प्रकृतयो नगराद् वारणावतात् । सर्वमङ्गलसंयुक्ता यथाशास्त्रमतन्द्रिताः ।। १ ।। श्रुत्वाऽऽगतान् पाण्डुपुत्रान् नानायानैः सहस्रशः । अभिजग्मुर्नरश्रेष्ठान् क्षुत्वैव परया मुदा ।। २ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके शुभागमनका समाचार सुनकर वारणावत नगरसे वहाँके समस्त प्रजाजन अत्यन्त प्रसन्न हो आलस्य छोड़कर शास्त्रविधिके अनुसार सब तरहकी मांगलिक वस्तुओंकी भेंट लेकर हजारोंकी संख्यामें नाना प्रकारकी सवारियोंके द्वारा उनकी अगवानीके लिये आये ।। १-२ ।। ते समासाद्य कौन्तेयान् वारणावतका जनाः । कृत्वा जयाशिषः सर्वे परिवार्यावतस्थिरे ।। ३ ।। कुन्तीकुमारोंके निकट पहुँचकर वारणावतके सब लोग उनकी जय-जयकार करते और आशीर्वाद देते हुए उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। ३ ।। तैर्वृतः पुरुषव्याघ्रो धर्मराजो युधिष्ठिरः । विबभौ देवसंकाशो वज्रपाणिरिवामरैः ।। ४ ।। उनसे घिरे हुए पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर, जो देवताओंके समान तेजस्वी थे, इस प्रकार शोभा पा रहे थे मानो देवमण्डलीके बीच साक्षात् वज्रपाणि इन्द्र हों ।। ४ ।। सत्कृताश्चैव पौरैस्ते पौरान् सत्कृत्य चानघ । अलंकृतं जनाकीर्णं विविशुर्वारणावतम् ।। ५ ।। निष्पाप जनमेजय ! पुरवासियों ने पाण्डवों का बड़ा स्वागत सत्कार किया। फिर पाण्डवों ने भी नागरिकों को आदरपूर्वक अपनाकर जनसमुदायसे भरे हुए सजे-सजाये वारणावत नगरमें प्रवेश किया ।। ५ ।। ते प्रविश्य पुरीं वीरास्तूर्ण जग्मुरथो गृहान् । ब्राह्मणानां महीपाल रतानां स्वेषु कर्मसु ।। ६ ।। राजन् ! नगरमें प्रवेश करके वीर पाण्डव सबसे पहले शीघ्रतापूर्वक स्वधर्मपरायण ब्राह्मणों के घरों में गये ।। ६ ।। नगराधिकृतानां च गृहाणि रथिनां तदा । उपतस्थुर्नरश्रेष्ठा वैश्यशूद्रगृहाण्यपि ।। ७ ।। तत्पश्चात् वे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार नगर के अधिकारी क्षत्रियोंके यहाँ गये। इसी प्रकार वे क्रमशः वैश्यों और शूद्रों के घरोंपर भी उपस्थित हुए ।। ७ ।। अर्चिताश्च नरैः पौरैः पाण्डवा भरतर्षभ । जग्मुरावसथं पश्चात् पुरोचनपुरस्सराः ।। ८ ।। भरतश्रेष्ठ! नगरनिवासी मनुष्योंद्वारा पूजित एवं सम्मानित हो पाण्डवलोग पुरोचन को आगे करके डेरे पर गये ।। ८ ।। तेभ्यो भक्ष्याणि पानानि शयनानि शुभानि च । आसनानि च मुख्यानि प्रददौ स पुरोचनः ।। ९ ।। वहाँ पुरोचनने उनके लिये खाने-पीनेकी उत्तम वस्तुएँ, सुन्दर शय्याएँ और श्रेष्ठ आसन प्रस्तुत किये ।। ९ ।। तत्र ते सत्कृतास्तेन सुमहार्हपरिच्छदाः । उपास्यमानाः पुरुषैरूषुः पुरनिवासिभिः ।। १० ।। उस भवनमें पुरोचनद्वारा उनका बड़ा सत्कार हुआ। वे अत्यन्त बहुमूल्य सामग्रियोंका उपयोग करते थे और बहुत-से नगरनिवासी श्रेष्ठ पुरुष उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। इस प्रकार वे (बड़े आनन्दसे) वहाँ रहने लगे ।। १० ।। दशरात्रोषितानां तु तत्र तेषां पुरोचनः । निवेदयामास गृहं शिवाख्यमशिवं तदा ।। ११ ।। दस दिनों तक वहाँ रह लेनेके पश्चात् पुरोचनने पाण्डवोंसे उस नूतन गृहके सम्बन्धमें चर्चा की, जो कहनेको तो 'शिवभवन' था, परंतु वास्तवमें अशिव (अमंगलकारी) था ।। ११।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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