निंदा
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🚨 निंदा की ताकत — जब बोलना बन जाता है बहस: ईशनिन्दा यानी धार्मिक भावनाओं के अपमान पर दुनिया भर में अलग-अलग क़ानून और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ हैं; कुछ देशों में यह अपराध मानी जाती है और सार्वजनिक निंदा ने कभी-कभार गंभीर कानूनी और सामाजिक परिणामी पैदा किए हैं, जो दिखाता है कि शब्दों का विज्ञान (सामाजिक-मनोवैज्ञानिक आकस्मिकता और ऑनलाइन आउटरेज कैस्केड) कैसे व्यवहार और नीति बदल देता है। "जो पूरे विश्व का सम्मान करें, किसी की निंदा न करें" — परंपरागत गीत की ये पंक्ति याद दिलाती है कि तर्क (reason) और सहानुभूति (empathy) निंदा के शह देने से ज़्यादा असरकारक हैं; निंदा तब ही न्यायपूर्ण है जब उसका आधार तथ्य, तार्किक विश्लेषण और मानवता हो — न कि अफवाह, लहराती भावनाएँ या राजनीतिक जरूरतें। वर्तमान घटनाओं में भी यह दिखाई देता है: ज्ञान और सूचना साझा करने वाले मंचों पर कंटेंट हटाने या बनाए रखने का विवाद़ आज़ादी बनाम ज़िम्मेदारी की बहस बन गया है (उदाहरण: भारत में विकिमीडिया और कोर्ट मामलों ने कंटेंट निंदा/हटाने के सवाल उठाए हैं), इसलिए निंदा करते समय प्रमाण और कानूनी-नैतिक परिप्रेक्ष्य को परखना वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। 🔥 बोलो पर सोच-समझ कर, निंदा करो पर सबूत के साथ — #निंदा नहीं_तर्क 🧠 #SpeakWithFacts 📚 #सोचो_फिर_बोलो 💬 #EmpathyFirst 🙏 #जानकारी_पहले 🔎 @रवि निषाद @जितेंद्र निषाद @दिलीप निषाद @ निभा,singh @सूरज कुमार निषाद #निंदा #बम - बम भोले #--- #viral #radhe radhe radhe radhe radhe radhe radhe radhe radhe radhe radhe radhe radhe
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