कर्म 🌹

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sn vyas
8 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३१/१ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 ज्ञानाग्नि कैसे प्रकट होती है ? 🦚* जीव अपने असली स्वरूप को भूल गया है , जीव ब्रह्म का ही अंश है । ब्रह्म- सत , चित्त, आनंद स्वरूप है , इसलिए जीव भी सत , चित्त , आनंद स्वरूप ही है । किंतु जीव को इसका ज्ञान नहीं है , इसलिए जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। *भगवान गीता में कहते हैं कि--* *ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।* *जीव ब्रह्म का अंश होने के बावजूद, मुक्त होने के बावजूद, माया के वशीभूत होकर बद्ध हो गया है , अर्थात बंधनों में पड़ गया है।* *जीव को अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाए, इसी का नाम "ज्ञान" है । ज्ञान होते ही उसके सभी संचित कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं। जीव को स्वरूप का ज्ञान होना बहुत कठिन है । कोई बहुत ही समर्थ गुरु मिले , तो ही यह ज्ञान प्राप्त होता है।* *एक शेर का बच्चा जन्म लेते ही उसकी मां से अलग हो गया, और भेड़ों के मालिक ने इस नवजात शिशु को भेड़ों के साथ पाल - पोस कर बड़ा किया । यह शेर का बच्चा हमेशा भेड़ों के झुंड में ही रहता था , घूमता फिरता था, और अज्ञानता बस स्वयं को भी भेड़ ही समझता था।* *"मैं भी भेड़ ही हूं " ऐसी उसकी दृढ मान्यता हो गई थी। एक बार एक शेर घूमता -फिरता भेड़ों के झुंड के पास आया , जिसमें यह शेर का बच्चा भी था । शेर को देखकर भेड़ों का झुंड भाग खड़ा हुआ। साथ में वह शेर का बच्चा भी भाग खड़ा हुआ । यह देखकर उस शेर को आश्चर्य हुआ कि भेडो के साथ यह शेर का बच्चा क्यों भयभीत होकर भाग रहा है । शेर ने उन भेड़ों को जाने दिया और शेर के बच्चे को ही पकड़ा , तो वह बच्चा ,,, शेर के हाथ जोड़ने लगा कि " मुझे छोड़ दीजिए, मुझे मारना नहीं "।* *तब शेर ने उससे कहा : अरे भाई ,, तू भेड़ नहीं है । तू तो मेरी ही जाति का शेर है । तुझे मुझसे नहीं डरना चाहिए, मैं तुझे मार कर नहीं खाऊंगा।* *लेकिन ,,, शेर के बच्चे को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ ,, वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं और मुझे मारना नहीं"।* 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 *(वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं मुझे मारना नहीं"।)* *फिर वह शेर उसे एक तालाब के किनारे ले गया और कहा कि इस तालाब के पानी में अपना मुख देखो , तेरा और मेरा मुख समान ही है या नहीं ? मैं गर्जना करूंगा, वैसे ही तू भी गर्जना करना ।* *उस शेर के बच्चे ने उस शेर की तरह ही गर्जना की । तो उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हुआ और उसी समय वह भयमुक्त होकर शेर के साथ चला गया। मानव जीवन की भी ठीक ऐसी ही स्थिति है।* *जैसे सूर्य से किरण अलग होकर पूरे जगत में फैल जाती है, वैसे ही जीव भी अनादि काल से ब्रह्म से अलग हो गया है । बादल का पानी बिल्कुल साफ होता है ,, बादलों में क्षोभ होने से बूंद अलग होकर पृथ्वी पर गिरती है । आकाश से पृथ्वी पर आने तक उसमें (बीच में) ऑक्सीजन - नाइट्रोजन आदि तत्त्व मिल जाते हैं । पृथ्वी को छूते ही यह बूदे मिट्टी में मिलकर मलीन हो जाती है।* *फिर दोबारा सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से बाष्पी भवन होता है । तो उसकी उर्ध्व गति होती है और बादल के रूप में वह जल पुनः अपने असली स्थान पर पहुंचकर शुद्ध और पवित्र हो जाता है । इसी तरह जीव ब्रह्म से अलग हो गया है, वह जगत की माया के संपर्क में आकर अविद्या वस मलीन हो गया है ।* *गोस्वामी तुलसीदास जी रामायण में यह बात एक ही पंक्ति में समझाते हैं* *भूमि परत भा डाबर पानी।* *जिमि जीवहि माया लपटानी ॥* *पृथ्वी पर पडते ही पानी गदला हो गया , जैसे शुद्ध जीव को माया लिपट गई हो।* *शेर की तरह ही शेर के बच्चे रूपी जीव को यह समर्थ गुरु मिलता है, तब ही उसे सच्चे स्वरूप का ज्ञान होता है और वह कर्मों के भय से मुक्त हो जाता है।* *गोस्वामी जी इस बात को रामायण में लिखते हैं कि--* क्रमश: इसके बाद अब कल आगे पढेगे ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
901 views 6 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३१/३ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 ज्ञानाग्नि कैसे प्रकट होती है ? गतांक से आगे(विश्राम) (वैसे ही जागृत अवस्था में सुख-दुख आदि जागृत अवस्था में सत्य है किंतु ज्ञान अवस्था में मिथ्या हो जाते हैं) *कोई व्यक्ति रात को खीर पूरी मिष्ठान आदि खाकर सोए , और फिर सपना अवस्था में " मैं भूखा हूं, मैं भूखा हूं " कहते हुए पूरी रात भिक्षा पात्र लेकर भीख मांगे । उस समय खुद शंकराचार्य जी भी उसे समझाये कि " अरे अज्ञानी जीव, तू भूखा नहीं है , तू भोजन करके सोया था । फिर भी वह व्यक्ति उसकी बात नहीं मानेगा ।* *किंतु जब वह जागृत अवस्था में आएगा तब उसे सच्चे स्वरूप का ज्ञान होगा। वैसे ही जागृत अवस्था में हम लोग अज्ञानता से घिरे हुए हैं। ऐसे जीवो को शास्त्र और संत पुकार पुकार कर कहते हैं कि "यह जगत मिथ्या है और ब्रह्म ही सत्य है " तू ब्रह्म का अंश सत चित और आनंद स्वरूप है"। फिर भी दुर्भागी जीव शास्त्रों और संतो की बात नहीं मानता है । क्योंकि वह जागृत अवस्था से ज्ञान अवस्था में नहीं आया है ।* *शंकराचार्य जी ने अनेक ग्रंथों का सार केवल इस आधे श्लोक मे कह दिया है कि---* *श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथकोटिभि:।* *ब्रह्मसत्यं जगत् मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:॥* *उपरोक्त दृष्टांत की तरह दस साल की सजा में से तीन साल की सजा भोगने के बाद सच्चा ज्ञान होने पर शेष सात वर्ष की सजा खत्म हो जाती है , वैसे ही जीव को अपने सत् - चित्त- आनंद स्वरूप का सच्चा ज्ञान होते ही उसके अनादिकाल के एकत्रित हुए अरबों खरबों जन्मों के संचित कर्म तत्काल खत्म हो जाते हैं।* *इसलिए जैसे क्रियमाण कर्मों को नियंत्रण करने के लिए कर्म- मार्ग है , प्रारब्ध को आसानी से भोगने के लिए भक्ति - मार्ग है , उसी तरह संचित कर्मों को समाप्त करने के लिए ज्ञान -मार्ग है । इन्ही तीनों मार्गो से जीव अपने जन्म की जीवन यात्रा पूर्ण कर के अंत में मोक्ष प्राप्त कर सकता है और जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।* क्रमश कल से अब एक नए भाग के साथ ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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