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गोवर्धन पर्वत परिक्रमा

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sn vyas
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#गोवर्धन पर्वत 🌺🙏🏻 #🌷 ॐ गोवर्धन पर्वत नमः #🌷 #गोवर्धन पर्वत परिक्रमा #जय श्री कृष्ण #जय श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत धारण करते श्री कृष्ण - *।। श्री गणेशाय नमः, श्री राधाकृष्णाभ्यां नमः, श्री गोवर्धनाय नमः ।।* * यह कथा उस दिन की है जब सात वर्ष के एक नन्हे से बालक ने अपनी बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली पर, करोड़ों टन वजनी, 8 योजन लंबे पर्वत को उठा लिया था। यह कथा केवल चमत्कार की नहीं है, यह कथा अहंकार और विनम्रता की है, स्वर्ग और धरती की है, इंद्र और गोविंद की है। यह कथा भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 24वें, 25वें, 26वें और 27वें अध्याय में वर्णित है। --- अध्याय 1: ब्रज - जहाँ हर घर में कृष्ण था आज से लगभग 5200 साल पहले, यमुना किनारे एक ऐसा वन था जिसे वृंदावन कहते थे। आज वृंदावन एक शहर है, पर उस समय वहां न कोई महल था, न कोई बाजार। केवल हरे-भरे वन, कदम्ब के पेड़, करील की झाड़ियां, और बीच-बीच में ग्वालों की बस्ती। नंद बाबा ब्रज के मुखिया थे। उनके पास नौ लाख गायें थीं। ब्रज के हर घर में दूध की नदियां बहती थीं। सुबह होते ही गोपियां दही बिलोतीं, तो उसकी आवाज पूरे ब्रज में गूंजती थी। मक्खन इतना होता था कि उसे रखने की जगह नहीं थी। नंद बाबा के घर में एक विशेष बालक था - कृष्ण। यशोदा मैया का लाला, नंद बाबा का प्राण। उम्र मात्र 7 वर्ष, पर लीलाएं ऐसी कि बड़े-बड़े ऋषि भी समझ नहीं पाते थे। कभी पूतना को मारता, कभी शकटासुर को, कभी तृणावर्त को, कभी बकासुर को। ब्रज के लोग कहते थे - यह बालक नहीं, कोई देवता है। कृष्ण के सखा थे - श्रीदामा, सुदामा, मधुमंगल, वृषभानु के बेटे, और सबसे प्यारे - बलराम दाऊ। और गोपियां? गोपियां तो कृष्ण के बिना एक पल भी नहीं रह सकती थीं। राधा रानी, ललिता, विशाखा, चंद्रावली - सबकी आंखों में केवल कृष्ण। अध्याय 2: इंद्र पूजा की तैयारी और कृष्ण का पहला प्रश्न कार्तिक मास आया। कार्तिक में ब्रज में हर साल इंद्र पूजा होती थी। यह परंपरा नंद बाबा के बाबा, उनके बाबा के समय से चली आ रही थी। इंद्र कौन हैं? देवराज इंद्र, स्वर्ग के राजा। वेदों में कहा गया है - इंद्र वर्षा करते हैं। "इंद्राय स्वाहा" कहकर आहुति दी जाती है, तब वर्षा होती है, तब अन्न होता है। इसलिए ब्रजवासी इंद्र को अपना सबसे बड़ा देवता मानते थे। नंद बाबा ने आदेश दिया - "सुनो सभी ब्रजवासियों, कल इंद्र यज्ञ है। सब लोग अपने-अपने घर से घी, दूध, दही, अन्न, पकवान लाओ। इंद्र देव को भोग लगाएंगे।" पूरे ब्रज में उत्सव जैसा माहौल। यशोदा मैया ने 100 मन खीर बनाई, रोहिणी मैया ने मालपुए, गोपियों ने लड्डू, ग्वालों ने लकड़ियां इकट्ठी कीं, हवन कुंड बनाए गए। हजारों मन अन्न, सैकड़ों घड़े घी, हजारों घड़े दूध। तभी, 7 वर्षीय कृष्ण, नंगे पांव, हाथ में छोटी सी लठिया लिए, मोर मुकुट पहने, वहां आए और अपने बाबा नंद से पूछा - "बाबा, ये सब क्या हो रहा है? इतना सारा अन्न, इतना सारा घी, किसके लिए?" नंद बाबा ने हंसकर कहा - "लाला, तू अभी छोटा है, तू नहीं समझेगा। कल इंद्र देव की पूजा है। इंद्र देव वर्षा करते हैं, उन्हीं की कृपा से हमारी फसल होती है, हमारी गायों को घास मिलती है, यमुना में जल होता है। इसलिए हम हर साल इंद्र देव की पूजा करते हैं, ताकि वे हम पर कृपा बनाए रखें।" कृष्ण ने जो उत्तर दिया, वह आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं। कृष्ण ने कहा - "बाबा, आप कहते हैं इंद्र वर्षा करते हैं, पर मैंने तो देखा है कि वर्षा समुद्र से होती है। सूर्यदेव समुद्र के जल को भाप बनाते हैं, वायु देवता उस भाप को उड़ाकर बादल बनाते हैं, और बादल वर्षा करते हैं। यह तो प्रकृति का नियम है, कर्म का सिद्धांत है। इसमें इंद्र कहाँ से आए? और बाबा, एक बात बताओ - इंद्र तो स्वर्ग में रहते हैं, लाखों योजन दूर। आप यहां पकवान बनाते हो, वे वहां कैसे खाएंगे? क्या आपके पकवान स्वर्ग तक जाते हैं? और बाबा, हम कौन हैं? हम ग्वाले हैं। हमारा धन क्या है? हमारी गायें। हमारी गायें कहाँ चरती हैं? गोवर्धन पर्वत पर। हमें फल कौन देता है? गोवर्धन। फूल कौन देता है? गोवर्धन। औषधियां कौन देता है? गोवर्धन। हमें छाया कौन देता है? गोवर्धन। यमुना को जल कौन देता है? गोवर्धन के झरने। तो फिर हमें पूजा गोवर्धन की करनी चाहिए, इंद्र की नहीं। जो हमारे सबसे पास है, जो हमारी रोज मदद करता है, उसकी पूजा करनी चाहिए। दूर के देवता से ज्यादा, पास के देवता की पूजा बड़ी होती है।" नंद बाबा सन्न रह गए। इतना छोटा बालक, इतना बड़ा ज्ञान, इतना बड़ा तर्क। नंद बाबा ने सभी बड़े-बूढ़े ग्वालों को बुलाया - उपनंद, वृषभानु, सानंद। सबने कहा - "नंद जी, लाला कह तो सही रहा है। इस बार इंद्र की नहीं, गोवर्धन की पूजा करते हैं। और वैसे भी, कन्हैया जो कहता है, उसमें कोई न कोई लीला तो होती ही है।" और इस प्रकार, सैकड़ों सालों से चली आ रही इंद्र पूजा बंद हुई, और पहली बार गोवर्धन पूजा का निर्णय हुआ। अध्याय 3: प्रथम गोवर्धन पूजा - अन्नकूट महोत्सव अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में, पूरा ब्रज गोवर्धन की ओर चल पड़ा। आगे-आगे नंद बाबा, यशोदा मैया पालकी में, पीछे-पीछे हजारों ग्वाल-बाल, हजारों गोपियां सिर पर मटके लिए, लाखों गायें, बैलगाड़ियों में लदे हुए अन्न के पहाड़। गोवर्धन पर्वत पहुंचकर, कृष्ण ने विधि बताई - "सबसे पहले गोवर्धन को स्नान कराओ।" ग्वालों ने यमुना का जल, दूध, दही, घी, शहद, शर्करा से गोवर्धन को स्नान कराया। फिर चंदन का लेप किया, फूलों की मालाएं पहनाईं, दीप जलाए। "अब भोग लगाओ।" अब भोग कैसा था? उसे अन्नकूट कहा गया। अन्नकूट यानी अन्न का पहाड़। - भात का पहाड़ - 100 मन चावल का भात - खीर का पहाड़ - 100 मन खीर - लड्डू का पहाड़ - हजारों लड्डू - पूड़ी, कचौड़ी, हलवा, मालपुआ, घेवर, जलेबी - 56 प्रकार के व्यंजन, जिन्हें छप्पन भोग कहते हैं। इतना अन्न कि गोवर्धन पर्वत भी छोटा लगने लगा। अब कृष्ण ने अपनी योगमाया से एक अद्भुत लीला की। वे दो रूपों में विभक्त हो गए। एक रूप में, वे नंद बाबा के पास खड़े होकर पूजा देख रहे थे - छोटे से कन्हैया के रूप में। और दूसरे रूप में, वे स्वयं विशाल गोवर्धन देवता बन गए। गोवर्धन देवता का रूप कैसा था? भागवत में वर्णन है - हजार भुजाएं, हजार नेत्र, मुकुट पहने, विशालकाय, पर्वत जैसा शरीर, पर मुख मनुष्य जैसा, और वह मुख कह रहा था - "लाओ, और भोग लाओ, मैं भूखा हूँ, मुझे और खिलाओ।" सारा अन्न, देखते ही देखते, गोवर्धन देवता ने खा लिया। ग्वाले आश्चर्यचकित - "अरे देखो, देखो, गोवर्धन बाबा स्वयं भोग खा रहे हैं, हमारी पूजा सफल हो गई।" नंद बाबा ने दंडवत प्रणाम किया, यशोदा मैया ने आरती उतारी। फिर कृष्ण ने कहा - "अब गोवर्धन की परिक्रमा करो। गायों को भी कराओ।" सभी ने गोवर्धन की परिक्रमा की। 21 किलोमीटर की परिक्रमा। और फिर, जय-जयकार करते हुए, ब्रज लौट आए। अध्याय 4: स्वर्ग में हलचल - इंद्र का अहंकार जागा उधर स्वर्ग में, इंद्र के दूत ने आकर कहा - "देवराज, अनर्थ हो गया। ब्रज में आपकी पूजा बंद हो गई। नंद के बेटे कृष्ण के कहने पर, ब्रजवासियों ने गोवर्धन की पूजा की है।" इंद्र सुनते ही क्रोध से लाल हो गया। इंद्र ने सोचा - "मैं देवराज हूँ। मैंने वृत्रासुर जैसे राक्षस को मारा है, मैंने पर्वतों के पंख काटे हैं, सारे देवता मेरी वंदना करते हैं, ऋषि-मुनि मेरी पूजा करते हैं, और ये तुच्छ ग्वाले, मेरी पूजा बंद कर दें? एक छोटे से ग्वाल बाल के कहने पर? इस कृष्ण की इतनी हिम्मत? वह खुद को समझता क्या है?" अहंकार - अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है। इंद्र, जो देवराज है, वह भी अहंकार से नहीं बच पाया। क्रोध में आकर, इंद्र ने प्रलय के मेघों को बुलाया - सांवर्तक। भागवत में कहा गया है कि चार प्रकार के प्रलय मेघ होते हैं - सांवर्तक, आवर्तक, पुष्कर, द्रोण। इनमें सांवर्तक सबसे भयंकर होता है, जो केवल ब्रह्मा के एक दिन के अंत में, जब प्रलय होता है, तब वर्षा करता है। वही मेघ इंद्र ने बुलाए। इंद्र ने आदेश दिया - "जाओ, ब्रज पर जाओ। सात दिन तक, सात रात तक, लगातार इतनी वर्षा करो कि पूरा वृंदावन, पूरा ब्रज, यमुना में डूब जाए। कोई ग्वाला, कोई गाय, कोई बछड़ा जीवित न बचे। नंद के उस बेटे को भी पता चले कि इंद्र का अपमान करने का फल क्या होता है। बिजली गिराओ, ओले बरसाओ, आंधी चलाओ, प्रलय ला दो।" अध्याय 5: ब्रज में प्रलय - वह भयंकर रात उस रात ब्रज में जो हुआ, वह आज तक किसी ने नहीं देखा था। संध्या होते ही, पश्चिम से काले-काले बादल आए। ऐसे काले बादल जैसे काजल का पहाड़। हवा बंद हो गई, घुटन होने लगी। पशु-पक्षी चिल्लाने लगे। गायें रंभा-रंभा कर अपने बछड़ों को ढूंढने लगीं। फिर एकदम से हवा चली - तूफानी हवा। बड़े-बड़े पेड़ उखड़ने लगे। कदम्ब के पेड़ टूट गए। ग्वालों की झोपड़ियां उड़ने लगीं। फिर वर्षा शुरू हुई। मूसलाधार - मूसल जैसी मोटी धार। एक-एक बूंद सिर पर पत्थर जैसी लग रही थी। साथ में ओले - नींबू जितने बड़े-बड़े ओले। बिजली - ऐसी बिजली कि रात भी दिन जैसी लगने लगी। गर्जना - ऐसी गर्जना कि कान फट जाएं। एक घंटे में ही, यमुना उफान पर आ गई। यमुना का जल गांव में घुस गया। घरों में कमर तक पानी। गायें पानी में बहने लगीं, बछड़े डूबने लगे, बच्चे रोने लगे - "मैया बचाओ, बाबा बचाओ।" गोपियां दौड़-दौड़ कर नंद बाबा के पास आईं - "बाबा, बचाओ, ये क्या हो रहा है? प्रलय आ गया क्या?" नंद बाबा, उपनंद, सभी बड़े-बूढ़े, कृष्ण के पास दौड़े - "लाला, ये क्या हो गया? लगता है इंद्र नाराज हो गया है, हमने उसकी पूजा बंद की, इसलिए वह हमें दंड दे रहा है। अब क्या होगा? सब मर जाएंगे।" यशोदा मैया कृष्ण को छाती से चिपकाए रो रही थीं - "मेरे लाला को बचाओ, कोई मेरे लाला को बचाओ।" कृष्ण, जो अभी तक अपनी मैया की गोद में बैठे माखन खा रहे थे, उठ खड़े हुए। उनके चेहरे पर वही मंद मुस्कान थी - दिव्य, अभय देने वाली मुस्कान। कृष्ण ने कहा - "बाबा, डरो मत। मैया, डरो मत। आप सब गोवर्धन की ओर चलो। गोवर्धन ने हमारा भोग खाया है, वह हमारी रक्षा भी करेगा। मैं हूँ ना।" अध्याय 6: वह अलौकिक क्षण - गोवर्धन धारण सारे ब्रजवासी, अपने बच्चों को, अपनी गायों को, अपने बछड़ों को लेकर, रोते-बिलखते, गोवर्धन की ओर भागे। कृष्ण भी नंगे पांव, बिना छाता, बिना किसी डर के, उनके साथ दौड़े। गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचकर, कृष्ण ने एक ऐसी लीला की, जिसे देखकर ब्रह्मा, शिव, नारद, सभी देवता भी आश्चर्यचकित हो गए। कृष्ण ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली - कनिष्ठा उंगली - को गोवर्धन पर्वत के नीचे लगाया, और पूरे पर्वत को उठा लिया। कैसे? जैसे कोई व्यक्ति, छाते को उठा लेता है, जैसे कोई बच्चा, खिलौने को उठा लेता है, वैसे ही। पर्वत कितना बड़ा? पुराणों में लिखा है - गोवर्धन पर्वत 8 योजन लंबा है, 2 योजन चौड़ा है, 2 योजन ऊंचा है। 1 योजन = लगभग 13 किलोमीटर। यानी लगभग 100 किलोमीटर की परिधि। वजन - करोड़ों, अरबों टन। पत्थर, मिट्टी, पेड़, झरने, गुफाएं - सब कुछ के साथ। और उठाने वाला? 7 साल का बालक। ऊंचाई - लगभग 3.5 फुट। वजन - 25 किलो। और उठाया किस पर? सबसे छोटी उंगली पर, जो सबसे कमजोर होती है। कृष्ण ने कहा - "आ जाओ, सब लोग इसके नीचे आ जाओ।" पहले तो लोग डरे - यह छोटा सा बालक, पहाड़ उठाएगा? पर्वत गिर गया तो? पर फिर देखा - पर्वत सच में हवा में है, और उसके नीचे एक विशाल मैदान जैसा स्थान है, जहां पूरा ब्रज समा सकता है। एक-एक करके, सारे ग्वाले, सारी गोपियां, सारी गायें, सारे बैल, सारे बछड़े, सारे कुत्ते, सारे पक्षी - सब गोवर्धन के नीचे आ गए। आश्चर्य देखिए - बाहर मूसलाधार बारिश, तूफान, बिजली, पर गोवर्धन के नीचे, एक बूंद भी पानी नहीं। वहां हल्की-हल्की धूप, गर्मी, प्रकाश - जैसे घर के अंदर बैठे हों। और कृष्ण? कृष्ण, 7 दिन तक, 7 रात तक, बिना कुछ खाए, बिना कुछ पिए, बिना सोए, बिना अपनी उंगली हिलाए, बिना थके, गोवर्धन को उठाए खड़े रहे। चेहरे पर वही मंद मुस्कान। अध्याय 7: सात दिन, सात रात - गोवर्धन के नीचे नया ब्रज इन सात दिनों में, गोवर्धन के नीचे क्या हुआ? गोपियां कृष्ण को देख-देख कर गीत गा रही थीं - "गिरधारी लाल की जय, गोवर्धन धारी की जय।" ग्वाले कृष्ण की उंगली को देख रहे थे - कहीं उंगली में दर्द तो नहीं हो रहा? कोई ग्वाला कहता - "कन्हैया, थोड़ा मैं भी हाथ लगा दूं?" कृष्ण कहते - "नहीं, तुम बस आराम करो, ये तो फूल से भी हल्का है।" यशोदा मैया बार-बार कहतीं - "लाला, तेरी उंगली दुख रही होगी, अब रख दे, मैं इंद्र से माफी मांग लूंगी।" कृष्ण कहते - "मैया, तू चिंता मत कर, मुझे कुछ नहीं हो रहा।" बलराम दाऊ, कृष्ण के पास खड़े होकर, सबको ढांढस बंधा रहे थे। गायें, जो पहले डर रही थीं, अब आराम से बैठकर जुगाली कर रही थीं। बछड़े कृष्ण के पैरों के पास खेल रहे थे, उनके पैर चाट रहे थे। देवता आकाश से यह दृश्य देख रहे थे। ब्रह्मा जी आए, शिव जी आए, नारद जी आए, सभी ने पुष्प वर्षा की - "धन्य है कृष्ण, धन्य है ब्रज, धन्य है गोवर्धन।" अध्याय 8: इंद्र का घमंड टूटा - क्षमा याचना सात दिन बाद, सांवर्तक मेघों का सारा जल खत्म हो गया। वे थक गए, हार गए। इंद्र ने नीचे देखा - ब्रज वैसा का वैसा है। एक भी ग्वाला नहीं मरा, एक भी गाय नहीं मरी, एक भी बछड़ा नहीं मरा। सब गोवर्धन के नीचे सुरक्षित हैं, खुश हैं, और वह छोटा सा बालक, अभी भी, बिना थके, पहाड़ को उठाए खड़ा है, मुस्कुरा रहा है। इंद्र समझ गया - "यह कोई साधारण बालक नहीं है। यह स्वयं विष्णु है, यह परब्रह्म है, यह मेरा भी स्वामी है। मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है।" इंद्र घबराकर, अपने ऐरावत हाथी को छोड़कर, अकेले, नंगे पांव, ब्रज आया। आते ही, कृष्ण के चरणों में गिर पड़ा, और फूट-फूट कर रोने लगा। इंद्र ने कहा - "हे प्रभु, हे गोविंद, हे गोपाल, मुझे क्षमा करो। मैं अज्ञानी हूँ, मैं अहंकारी हूँ, मैं मूर्ख हूँ। मैंने समझा मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ, पर आप ही ईश्वर हैं, आप ही सब कुछ हैं। मैंने आपके भक्तों को दुख दिया, मैंने आपके ब्रज को डुबाने की कोशिश की, मैंने अहंकार में आकर प्रलय मेघ भेजे। प्रभु, मुझे क्षमा करो, मुझे क्षमा करो। हे कृष्ण, आप तो करुणा के सागर हैं, आप तो भक्तवत्सल हैं, आप मुझे क्षमा कर दो।" कृष्ण ने मुस्कुराकर इंद्र को उठाया, अपने पीतांबर से उसके आंसू पोंछे, और कहा - "इंद्र, उठो, तुम्हें क्षमा किया। मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ। मैं तो तुम्हें शिक्षा देना चाहता था। याद रखो इंद्र, कभी अहंकार मत करना। बड़ा पद, बड़ी शक्ति, हमेशा अहंकार लाती है, और अहंकार हमेशा पतन लाता है। और एक बात याद रखो - पूजा हमेशा उसकी करनी चाहिए जो पास है। गाय पास है, पर्वत पास है, नदी पास है, धरती पास है, कर्म पास है। इनकी पूजा ही मेरी पूजा है। दूर के देवता से ज्यादा, पास के देवता बड़े होते हैं। तुम जाओ, और फिर कभी किसी भक्त का अपमान मत करना।" अध्याय 9: गोविंदाभिषेक - इंद्र द्वारा कृष्ण का अभिषेक फिर इंद्र ने कृष्ण का अभिषेक किया। इंद्र ने कामधेनु की पुत्री सुरभि गाय को बुलाया, और कहा - "सुरभि, अपने दूध से कृष्ण का अभिषेक करो।" सुरभि ने अपने दूध से कृष्ण का अभिषेक किया। फिर इंद्र ने आकाशगंगा के जल से, सभी तीर्थों के जल से, सभी औषधियों से, कृष्ण का अभिषेक किया। और इंद्र ने कृष्ण को तीन नए नाम दिए - 1. *गोविंद* - गो का अर्थ होता है गाय, वेद, इंद्रियां, धरती। गोविंद का अर्थ है जो गायों की, वेदों की, इंद्रियों की, धरती की रक्षा करे। 2. *गोपाल* - जो गायों का पालन करे, ग्वालों का पालन करे। 3. *गिरधारी* - जिसने गिरि, यानी गोवर्धन पर्वत को धारण किया। उसी दिन से कृष्ण का नाम गोविंद, गोपाल, गिरधारी प्रसिद्ध हो गया। फिर इंद्र ने ब्रज की परिक्रमा की, गायों को प्रणाम किया, ग्वालों से क्षमा मांगी, और स्वर्ग लौट गया। कृष्ण ने भी धीरे से गोवर्धन पर्वत को वापस रख दिया। जैसे कोई फूल को रखता है, वैसे ही। गोवर्धन फिर से अपनी जगह पर स्थित हो गया। सारे ब्रजवासी बाहर आए, उन्होंने कृष्ण को गले लगाया, यशोदा मैया ने कृष्ण को गोद में उठा लिया, और कहा - "मेरा लाला, मेरा लाला, तूने आज सबको बचा लिया।" अध्याय 10: इस कथा के 11 गूढ़ रहस्य - जो जीवन बदल देते हैं 1. *छोटी उंगली पर पहाड़ क्यों?* - छोटी उंगली शरीर की सबसे कमजोर उंगली है। भगवान बताना चाहते हैं कि भक्ति में सबसे कमजोर व्यक्ति भी सबसे मजबूत बन जाता है, अगर भगवान का सहारा हो। 2. *बाएं हाथ पर क्यों?* - बायां हाथ हृदय के पास होता है। भक्ति हृदय से होती है, दिमाग से नहीं। 3. *7 दिन क्यों?* - 7 का अंक बहुत पवित्र है - 7 चक्र, 7 रंग, 7 लोक, 7 ऋषि, 7 दिन। 7 दिन तक भगवान ने हमें धैर्य सिखाया। संकट आता है, 7 दिन, 7 महीने, 7 साल रहता है, पर अंत में भगवान रक्षा करते हैं। 4. *गोवर्धन ही क्यों?* - गोवर्धन धरती का टुकड़ा है, प्रकृति का प्रतीक है। भगवान कहना चाहते हैं कि प्रकृति की रक्षा करो, पेड़ बचाओ, पहाड़ बचाओ, नदी बचाओ, गाय बचाओ। 5. *गायें क्यों बचीं?* - गाय सनातन धर्म की आत्मा है। जिस धर्म में गाय सुरक्षित है, वह धर्म सुरक्षित है। 6. *इंद्र ही क्यों नाराज हुआ?* - इंद्र पद, शक्ति, अहंकार का प्रतीक है। बड़ा पद मिलते ही अहंकार आता है। अहंकार टूटना जरूरी है। 7. *अन्नकूट क्यों?* - अन्न ही जीवन है। अन्न का सम्मान करो, अन्न को व्यर्थ मत फेंको। अन्नकूट का अर्थ है अन्न की पूजा। 8. *आज भी गोवर्धन पूजा क्यों होती है?* - हर साल दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा होती है, अन्नकूट बनता है, ताकि हम प्रकृति को याद रखें, गाय को याद रखें, किसान को याद रखें। 9. *कृष्ण 7 साल के ही क्यों?* - 7 साल की उम्र नादानी की है। भगवान बताना चाहते हैं कि सच्चा ज्ञान उम्र से नहीं, भक्ति से, प्रेम से आता है। 10. *मंद मुस्कान क्यों?* - पूरे प्रलय में भी कृष्ण मुस्कुरा रहे थे। क्योंकि भगवान के लिए कोई काम कठिन नहीं। वे लीला करते हैं, खेलते हैं। हमें भी संकट में मुस्कुराना चाहिए। 11. *मूसलाधार बारिश, कड़कती बिजली और काले बादलों के बीच...* - यह दृश्य हमें सिखाता है कि जब चारों ओर अंधेरा हो, तूफान हो, बिजली कड़क रही हो, तब भी अगर भगवान पर विश्वास हो, तो एक छोटी सी उंगली भी पूरे पहाड़ को उठा सकती है, पूरे जीवन को बचा सकती है। फलश्रुति - इस कथा को सुनने का फल भागवत में लिखा है - जो व्यक्ति कार्तिक मास में, विशेषकर गोवर्धन पूजा के दिन, इस गोवर्धन धारण की कथा को सुनता है, पढ़ता है, दूसरों को सुनाता है - - उसके घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होती। - उसके पशुधन की वृद्धि होती है। - उसके सारे संकट, गोवर्धन पर्वत की तरह, उसके ऊपर से टल जाते हैं। - इंद्र जैसे बड़े-बड़े संकट, बड़े-बड़े शत्रु भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। - उसे गोविंद, गोपाल, गिरधारी की कृपा प्राप्त होती है। - अंत में, उसे गोलोक धाम, वृंदावन धाम की प्राप्ति होती है। इसलिए, हे भक्तों, हर साल, दिवाली के अगले दिन, गोबर का गोवर्धन बनाओ, उसकी पूजा करो, अन्नकूट बनाओ, गायों को खिलाओ, और जोर से कहो - *।। इति श्रीमद्भागवत महापुराणे दशम स्कंधे गोवर्धन धारण कथा संपूर्णा ।।*
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