पोरानिक कथा

sn vyas
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#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा राजा मुचुकुंद की संपूर्ण कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ सूर्यवंश में अनेक महान और धर्मात्मा राजाओं का जन्म हुआ। इन्हीं में एक थे राजा मुचुकुंद। वे चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता के पुत्र और भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। राजा मुचुकुंद सत्यनिष्ठ, पराक्रमी, दयालु और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनका जीवन धर्म, त्याग और भक्ति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। देवताओं की सहायता एक समय असुरों का अत्याचार इतना बढ़ गया कि देवता बार-बार पराजित होने लगे। उन्होंने देवराज इंद्र के साथ भगवान ब्रह्मा से सहायता माँगी। उस समय देवताओं के पास ऐसा कोई महान योद्धा नहीं था जो लंबे समय तक असुरों का सामना कर सके। तब देवताओं ने पृथ्वी पर राज्य करने वाले राजा मुचुकुंद से सहायता की प्रार्थना की। धर्म की रक्षा को अपना कर्तव्य मानकर राजा मुचुकुंद स्वर्ग पहुँचे और देवताओं की ओर से असुरों के विरुद्ध युद्ध करने लगे। यह युद्ध कुछ दिन या कुछ वर्ष नहीं, बल्कि बहुत लंबे समय तक चलता रहा। इस दौरान राजा मुचुकुंद अपने परिवार, राज्य और सुख-सुविधाओं से पूरी तरह दूर रहे। पृथ्वी पर समय बीतता गया। उनके परिवार के लोग, मित्र और प्रजा भी काल के प्रवाह में बदल गए, परंतु राजा मुचुकुंद देवताओं की रक्षा में लगे रहे। इंद्र का वरदान अंततः भगवान कार्तिकेय देवसेना के सेनापति बने और देवताओं की रक्षा का दायित्व संभाल लिया। तब देवराज इंद्र ने राजा मुचुकुंद से कहा— "राजन! आपने देवताओं के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। हम आपके इस उपकार का प्रतिदान नहीं दे सकते। आप कोई भी वर माँगिए।" राजा मुचुकुंद अत्यंत थक चुके थे। उन्होंने कहा— "मैं बहुत वर्षों से सोया नहीं हूँ। मुझे केवल विश्राम चाहिए।" तब इंद्र ने उन्हें वरदान दिया— "आप जितनी इच्छा हो उतनी देर तक सो सकते हैं। जो भी आपकी नींद भंग करेगा, आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जाएगा।" यह वरदान पाकर राजा मुचुकुंद पृथ्वी पर आए और एक विशाल पर्वतीय गुफा में जाकर गहरी निद्रा में लीन हो गए। कालयवन का जन्म और अहंकार बहुत समय बाद द्वापर युग आया। उस समय मथुरा पर भगवान श्रीकृष्ण का राज्य था। उसी समय एक अत्यंत शक्तिशाली यवन राजा कालयवन ने विशाल सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण कर दिया। कालयवन को वरदान प्राप्त था कि उसे सामान्य अस्त्र-शस्त्र से कोई नहीं मार सकता। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध में मारने के बजाय एक दिव्य योजना बनाई। श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला भगवान श्रीकृष्ण बिना शस्त्र उठाए युद्धभूमि से निकल पड़े। कालयवन उन्हें कायर समझकर उनके पीछे दौड़ा। श्रीकृष्ण उसे पहाड़ों के बीच स्थित उसी गुफा तक ले गए जहाँ राजा मुचुकुंद युगों से सो रहे थे। गुफा के भीतर घना अंधकार था। भगवान श्रीकृष्ण एक ओर छिप गए। कालयवन ने अंधेरे में सोए हुए राजा मुचुकुंद को ही श्रीकृष्ण समझ लिया। उसने क्रोध में आकर उन्हें पैर से लात मार दी। कालयवन का अंत लात लगते ही राजा मुचुकुंद की नींद खुल गई। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने खड़े कालयवन को देखा। इंद्र के वरदान के प्रभाव से जैसे ही उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी, वह तुरंत अग्नि के समान जल उठा और उसी क्षण भस्म होकर राख बन गया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने बिना अस्त्र चलाए कालयवन का अंत करा दिया। भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य चतुर्भुज स्वरूप में राजा मुचुकुंद के सामने प्रकट हुए। उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था। पीताम्बर धारण किए, वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह, गले में कौस्तुभ मणि और मुख पर मधुर मुस्कान देखकर राजा मुचुकुंद समझ गए कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे भाव-विभोर होकर भगवान के चरणों में गिर पड़े। मुचुकुंद की प्रार्थना राजा मुचुकुंद ने कहा— "प्रभु! मैंने राज्य, वैभव और पराक्रम में जीवन व्यतीत किया, पर अब समझ आया कि संसार का सब सुख क्षणभंगुर है। आपकी भक्ति ही जीवन का सच्चा धन है। मुझे ऐसा वर दीजिए कि मेरा मन सदैव आपके चरणों में लगा रहे।" भगवान श्रीकृष्ण उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा— "राजन! तुम्हारा हृदय निर्मल हो गया है। इस जन्म में तपस्या करके अपने शेष कर्मों का क्षय करो। अगले जन्म में तुम महान ब्राह्मण रूप में जन्म लेकर अंततः मुझे प्राप्त करोगे।" गंधमादन पर्वत की तपस्या भगवान के दर्शन के बाद राजा मुचुकुंद गुफा से बाहर निकले। उन्होंने देखा कि संसार पूरी तरह बदल चुका है। मनुष्य छोटे हो गए हैं, आयु कम हो गई है और युग भी बदल चुका है। उन्हें समझ आ गया कि अनेक युग बीत चुके हैं। उन्होंने संसार का त्याग कर उत्तर दिशा में स्थित गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्होंने वर्षों तक भगवान विष्णु का ध्यान, जप और कठोर तप किया। उनकी तपस्या से उनका मन पूर्णतः निर्मल हो गया और अंततः उन्हें भगवान की परम कृपा प्राप्त हुई। कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ धर्म की रक्षा के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए अद्भुत और अप्रत्याशित उपाय करते हैं। अहंकार का अंत निश्चित है, चाहे व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो। सांसारिक वैभव क्षणिक है, जबकि भगवान की भक्ति ही शाश्वत सुख देती है। सच्चे मन से भगवान की शरण लेने वाला अंततः मोक्ष का अधिकारी बनता है। जय श्रीकृष्ण। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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sn vyas
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#जय श्री कृष्ण #पौराणिक कथा कंस वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी को वेद-शास्त्र, धनुर्विद्या और ६४ कलाओं का अध्ययन करने के लिए उज्जयिनी (उज्जैन) में अवंतिका नगरी के परम ज्ञानी महर्षि सांदीपनि के आश्रम में भेजा गया साक्षात सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान श्रीकृष्ण ने एक साधारण शिष्य की भांति गुरु सांदीपनि की सेवा की—लकड़ियाँ चुनीं, आश्रम की सफाई की और केवल ६४ दिनों में संपूर्ण वेद, शास्त्र और ६४ कलाओं में निपुणता प्राप्त कर ली। शिक्षा पूर्ण होने पर श्रीकृष्ण और बलराम जी हाथ जोड़कर गुरु सांदीपनि के सामने खड़े हुए और बोले: "हे गुरुदेव! आपने हमें संपूर्ण विद्याएँ प्रदान की हैं। अब कृपा करके अपनी मनोवांछित गुरु-दक्षिणा माँगिए।" महर्षि सांदीपनि जानते थे कि ये दोनों बालक साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात जगन्नायक हैं। उन्होंने अपनी पत्नी (गुरुमाता) से परामर्श किया गुरुमाता की आँखों में अश्रु आ गए। उन्होंने कहा: "कई वर्ष पूर्व हमारा इकलौता पुत्र प्रभास-क्षेत्र (समुद्र तट) में स्नान करते समय एक प्रचंड समुद्री लहर में बह गया था और उसका कोई पता नहीं चला। यदि ये सर्वसमर्थ हैं, तो मुझे मेरा 'मृत पुत्र' वापस ला दें। यही हमारी गुरु-दक्षिणा होगी। श्रीकृष्ण और बलराम जी तुरंत अपने रथ पर सवार होकर प्रभास-क्षेत्र (समुद्र तट) पहुँचे समुद्र देव ने प्रकट होकर प्रणाम किया। जब श्रीकृष्ण ने गुरुपुत्र के बारे में पूछा, तो समुद्र देव ने कांपते हुए कहा: "हे प्रभु! मैंने उस बालक का हरण नहीं किया। मेरे जल में 'पांचजन्य' नाम का एक भयानक असुर रहता है, जो शंख के रूप में रहता है। वही उस बालक को निगल गया था श्रीकृष्ण ने तुरंत समुद्र में प्रवेश करके उस पंचजन असुर का वध कर दिया और उसके पेट की जाँच की, परंतु गुरुपुत्र वहाँ नहीं मिला। प्रभु ने उस असुर की अस्थियों से बना हुआ अलौकिक 'पांचजन्य शंख' अपने पास रख लिया। जब बालक समुद्र में नहीं मिला, तो श्रीकृष्ण और बलराम जी समझ गए कि उसकी मृत्यु हो चुकी है। वे सीधे साक्षात यमराज की नगरी 'संयमनी पुरी' (यमलोक) पहुँचे वहाँ पहुँचकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपना 'पांचजन्य शंख' फूंका। शंख की गूंज से संपूर्ण यमलोक कांप उठा यमराज स्वयं दौड़ते हुए आए और भगवान के चरणों में गिर पड़े। यमराज ने हाथ जोड़कर कहा: हे सर्वेश्वर! हे अच्युत! इस यमलोक में आपका आगमन कैसे हुआ? मैं आपकी क्या सेवा करूँ? भगवान श्रीकृष्ण ने दृढ़ स्वर में कहा: "हे यमराज! हमारे गुरुदेव सांदीपनि का बालक अपने कर्म-चक्र के कारण तुम्हारे वश में आकर यहाँ आया है। तुम तुरंत उस बालक की आत्मा को उसके पूर्व शरीर के साथ हमारे हवाले कर दो! यमराज ने कहा—"हे प्रभु! काल और कर्म के सिद्धांत के अनुसार जो एक बार यहाँ आ जाता है, वह वापस नहीं लौट सकता। परंतु आपकी आज्ञा ही काल और कर्म का सबसे बड़ा सिद्धांत है। यमराज ने तुरंत उस बालक की आत्मा को पुनः जीवित करके सुंदर, दिव्य शरीर के साथ भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दिया। श्रीकृष्ण और बलराम जी अपने गुरुपुत्र को रथ में बैठाकर वापस उज्जैन में गुरु सांदीपनि के आश्रम पहुँचे। जब गुरु सांदीपनि और गुरुमाता ने अपने मृत पुत्र को हँसते-खेलते जीवित वापस देखा, तो उनके नेत्रों से अश्रु बह निकले। उन्होंने अपने पुत्र को छाती से लगा लिया और श्रीकृष्ण-बलराम को गद्गद होकर आशीर्वाद दिया हे कृष्ण! तुमने संसार में गुरु-भक्ति का सबसे महान आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारे द्वारा सीखी गई विद्याएँ सदा अमर रहेंगी और तीनों लोकों में तुम्हारी यह गुरु-दक्षिणा युगों-युगों तक गाई जाएगी। !! जय श्री कृष्णा!!
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