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मां पार्वती

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sn vyas
616 views • 19 days ago
#मां पार्वती #महादेव मां पार्वती जी #जय मां पार्वती🙏 एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती को अत्यंत तीव्र क्षुधा (भूख) लगी। वह कोई साधारण शारीरिक भूख नहीं थी, बल्कि ब्रह्मांड के समस्त जीवों की सामूहिक भूख की ज्वाला थी। माता ने भगवान शिव से कहा: हे महादेव! मुझे बहुत तेज भूख लगी है। मुझे तुरंत कुछ खाने को दीजिए।महादेव ने मंद मुस्कान के साथ कहा देवि, थोड़ा धैर्य रखें। मैं अभी कुछ प्रबंध करता हूँ।परंतु भूख का वेग क्षण-प्रतिक्षण बढ़ता जा रहा था। माता पार्वती की देह तपने लगी, कंठ सूखने लगा और उनका स्वरूप मलिन होने लगा। उन्होंने बार-बार महादेव से भोजन की याचना की, परंतु शिव समाधिस्थ भाव से उन्हें प्रतीक्षा करने को कहते रहे। जब भूख असहनीय हो गई और धैर्य का बांध टूट गया, तब क्षुधा से व्याकुल माता ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी कल्पना तीनों लोकों में किसी ने नहीं की थी।माता पार्वती ने अपना मुख विशाल फैलाया और साक्षात देवाधिदेव महादेव को ही एक ही घूंट में निगल लिया!जैसे ही भगवान शिव उनके उदर में प्रविष्ट हुए संपूर्ण ब्रह्मांड का ताप उनके शरीर में समा गया।भगवान शिव के कंठ में स्थित 'हलाहल विष' की तीखी ज्वाला देवी के उदर में धधक उठी। देवी के शरीर के रोम-रोम, नासिका, मुख और नेत्रों से काला, घना और विषैला धुआँ (धूम्र) बाहर निकलने लगा।उस प्रलयंकारी धुएं से संपूर्ण कैलाश और तीनों लोक अंधकार में डूब गए। धुएं से आच्छादित होने के कारण ही उनका नाम 'धूमावती' पड़ा। उदर के भीतर से भगवान शिव ने अपनी योग-माया से देवी से कहा: देवि! आपने मुझे निगल लिया है। जब पुरुष (पति) ही नहीं रहा, तो स्त्री का स्वरूप संसार में विधवा का हो जाता है। आपने अपनी भूख मिटाने के लिए अपने ही स्वामी को उदरस्थ कर लिया, इसलिए अब आप सांसारिक दृष्टि से 'विधवा' रूप में जानी जाएँगी।" देवी को अपने कृत्य का भान हुआ। उन्होंने तुरंत भगवान शिव को अपने मुख से बाहर निकाल दिया।शिव जब बाहर आए, तो उन्होंने देवी के उस उग्र, मलिन और धुआंधार रूप को प्रणाम किया और कहा:पार्वती, यह केवल एक लीला थी। संसार सदा सुख, वैभव, सौंदर्य (लक्ष्मी) की पूजा करता है, परंतु दरिद्रता, भूख, शोक, बुढ़ापा और अभाव भी इसी सृष्टि का हिस्सा हैं।आप ही 'अलक्ष्मी' और 'धूमावती' बनकर संसार के उन दीन, दुखी और त्यागे हुए जीवों की रक्षा करेंगी जिनका संसार में कोई नहीं होता। माँ धूमावती का विग्रह गूढ़ आध्यात्मिक संदेश देता है: सूप (छाज): हाथ में सूप यह दर्शाता है कि जैसे सूप सार-तत्व (अनाज) को रख लेता है और भूसी (कचरे) को उड़ा देता है, वैसे ही देवी अपने भक्त के जीवन से सारहीन भ्रम को उड़ाकर केवल सत्य ज्ञान को बचाती हैं। कौआ (काक): कौआ चालाकी, मृत्यु की सूचना और सतर्कता का प्रतीक है। रूखे बाल और फटे वस्त्र: यह सांसारिक मोह-माया, शारीरिक सुंदरता के मिथ्या अभिमान और अंतिम वैराग्य का प्रतीक है।
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