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शिव पुराण कथा

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sn vyas
634 views • 25 days ago
#श्री शिव महापुराण कथा कुछ लोगों के मन में प्रश्न आता है, यदि परमेश्वर शिव ही सर्वोपरि है तो सभी लोग उनका पूजन क्यों नहीं करते है, इसका कारण है शिव माया, परमेश्वर शिव की माया सभी को मोहित कर देती है जिसके कारण साधारण लोग उन्हें जान नहीं पाते है और उन्हें परमेश्वर न जानकर केवल देवता मान लेते है। सनत्कुमार नो वेत्ति महिमानं महेशितुः। चतुर्भुजोऽपि विष्णुर्वै चतुर्वक्त्रोऽपि वै विधिः॥ ३ ॥ ​ हे सनत्कुमार! चतुर्भुज विष्णु तथा चतुर्मुख ब्रह्माजी भी महेश्वर की महिमा को नहीं जान पाते हैं॥ ​ चित्रमत्र न किञ्चिद्वै दुर्ज्ञेया खलु शाम्भवी। तया संमोहिताः सर्वे नार्चयन्त्यपि तं परम्॥ ४ ॥ ​ इसमें कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि शिवजी की माया दुर्ज्ञेय है। उसी माया से मोहित होकर ये सभी संसारी लोग उन परमेश्वर की पूजा नहीं करते हैं॥ ​ वेदयेद्यदि वात्मानं स एव परमेश्वरः। तदा विदन्ति ते सर्वे स्वेच्छया न हि केऽपि तम्॥ ५ ॥ ​ यदि वे परमेश्वर स्वयं ही अपना ज्ञान करा दें, तभी वे सभी लोग उन्हें जान सकते हैं, अपनी इच्छा से कोई भी उन्हें नहीं जान पाता है॥ सर्वगोऽपि महेशानो नेक्ष्यते मूढबुद्धिभिः। देववद् बुध्यते लोके योऽतीतो मनसां गिराम्॥ ६ ॥ यद्यपि महेश्वर सर्वव्यापी हैं, किंतु मूढ़ बुद्धिवाले उन्हें देख नहीं पाते हैं। जो वाणी एवं मनसे परे हैं, उन्हें लोग मात्र देवता ही समझते हैं॥ शिव महापुराण, शतरूद्र संहिता ,अध्याय 8
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sn vyas
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#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱हर हर महादेव #शिव पुराण 🌺 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी महर्षि पराशर और 'एकचक्रा' शिव-कृपा प्रसंग (शिव पुराण - वायवीय संहिता) शिव पुराण की वायवीय संहिता में महर्षि पराशर (महर्षि वेदव्यास के पिता) की कठिन तपस्या, असुरों द्वारा उपद्रव और भगवान शिव द्वारा उन्हें 'शिव-ज्ञान' तथा अमोघ तपोबल प्रदान करने की कथा आती है। 1. महर्षि पराशर का उग्र तप प्राचीन काल में महर्षि शक्ति के पुत्र महर्षि पराशर ने एकचक्रा नगरी के पास घने वनों में भगवान शिव की आराधना आरंभ की। वे अपने पिता की अकाल मृत्यु का शोक त्यागकर केवल आशुतोष महादेव के स्वरूप का ध्यान करते थे। उन्होंने एक पारद (पारे का) शिवलिंग स्थापित किया और बिना जल पीए केवल पवन का भक्षण करते हुए सहस्र वर्षों तक 'अघोर' मंत्र का जाप किया। 2. राक्षसों का विघ्न और मुनि की शांति उस वन में निवास करने वाले भीषण असुरों को भय हुआ कि मुनि पराशर के तपोबल से उनका विनाश हो जाएगा। असुरों ने मुनि की साधना भंग करने के लिए हिंसक पशुओं, भयंकर गर्जनाओं और मायावी अग्नि का चक्र रचा। किंतु महर्षि पराशर अपने स्थान से तनिक भी नहीं डिगे। वे अपने दोनों नेत्र मूँदे शिवलिंग से लिपटे रहे और बोले: "यह शरीर नश्वर है, किंतु मेरे महादेव का नाम शाश्वत है। यदि असुर मेरा संहार भी कर दें, तो भी मेरी चेतना शिव-चरणों में ही विलीन होगी।" 3. साक्षात 'अघोरेश्वर' का प्राकट्य मुनि के भीतर का निष्काम भय और अटल निष्ठा देखकर साक्षात भगवान शिव 'अघोर' रूप में प्रकट हुए। उनके प्राकट्य से निकली तेजोमय ज्वाला ने मुनि को कष्ट देने वाले समस्त राक्षसों के तपोबल और माया को क्षण भर में भस्म कर दिया। महादेव ने अत्यंत वात्सल्य भाव से मुनि पराशर को उठाया और उनके मस्तक पर अपना हस्त-कमल रखा। 4. महापुराण रचना का अनुग्रह भगवान शिव ने महर्षि पराशर को आलिंगन में लेकर कहा: "हे पराशर! तुम्हारी क्षमा और अनन्य शिव-भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें अमर वाणी और त्रिकालदर्शिता का वरदान देता हूँ। तुम्हारे ही पुत्र के रूप में स्वयं श्रीहरि 'वेदव्यास' बनकर अवतरित होंगे, जो पुराणों का विभाग करेंगे।" महादेव के इसी वरदान के प्रभाव से महर्षि पराशर ने विष्णु पुराण और अनेक ज्योतिषीय ग्रंथों की रचना की तथा उनका वंश परम शिव-भक्तों का वंश कहलाया। 💡 कथा का आध्यात्मिक संदेश यह कथा सिखाती है कि जब साधक विपरीत परिस्थितियों और बाह्य विघ्नों के बीच भी शांत रहकर शिव-आश्रय में टिका रहता है, तो ईश्वर न केवल उसकी रक्षा करते हैं बल्कि उसकी भावी पीढ़ियों को भी महान कल्याणकारी मार्ग दिखाते हैं।
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