श्रीमद्भागवत गीता

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sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग०६/०२ प्रारब्ध कर्म 🏹🎻🪔📝🦚💥🦚📝🪔🎻🏹 *और बाद में जो दूसरे संचित कर्म पक कर फल देने के लिए तैयार हो जाएं, उन प्रारब्ध कर्म के फल भोगने के लिए , उसके अनुरूप ऐसी दूसरी देह जीव धारण करता है, और उसके अनुरूप माता- पिता , स्त्री , पुत्र आदिक उस को मिलते हैं ।* *जीवन काल दरमियान उस जीवन में भोगने वाले तमाम प्रारब्ध कर्म भोग कर ही छुटते हैं , इस तरह जीव बार-बार जन्म मरण के चक्कर में भ्रमण करता रहता है, और अनादिकाल से अनेक जन्म जन्मांतर के जमा हुए संचित कर्म पक कर फल देने के लिए प्रारब्ध रूप से तैयार हो जाते हैं।* *वैसे वह अनंत काल तक अलग-अलग देह धारण करता ही रहता है , और जब तक देह धारण करनी पड़े तब तक उसको मोक्ष प्राप्त हुआ नहीं माना जाएगा ,,,,* *श्री शंकराचार्य जी कहते हैं--* *पुनरपि जननं पुनरपि मरणं* *पुनरपि जननि जठरे शयनम्।* *इह संसारे खलु दुस्तारे* *कृपया पारे पाहि मुरारे ॥* *अनेक योनियों में जीव भटकता ही रहे , भटकता ही रहे, नये क्रियमाण कर्म करता ही रहे, उसमें से अनेक संचित कर्म जमा हो जाए, तो काल के अनुरूप पक कर फल देने के लिए, प्रारब्ध रूप से जीव के सामने आकर खड़े हो जाते हैं ,,, और अंत काल तक जीव का मोक्ष होने ही नहीं देते ,, इसलिए संसार सागर दुस्तर माना गया है।* प्रारब्ध कर्म का लेख पूरा हुआ #कर्म #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #श्रीमद्भागवत गीता
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