sn vyas
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23 days ago
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ऋषियों का कुन्ती और पाण्डवों को लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदि के हाथों सौंपना...(दिन 371) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत वैशम्पायन उवाच पाण्डोरुपरमं दृष्ट्वा देवकल्पा महर्षयः । ततो मन्त्रविदः सर्वे मन्त्रयांचक्रिरे मिथः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा पाण्डुकी मृत्यु हुई देख वहाँ रहनेवाले, देवताओंके समान तेजस्वी सम्पूर्ण मन्त्रज्ञ महर्षियोंने आपसमें सलाह की ।। १ ।। तापसा ऊचुः हित्वा राज्यं च राष्ट्र च स महात्मा महायशाः । अस्मिन् स्थाने तपस्तप्त्वा तापसाञ्शरणं गतः ।। २ ।। तपस्वी बोले- महान् यशस्वी महात्मा राजा पाण्डु अपना राज्य तथा राष्ट्र छोड़कर इस स्थानपर तपस्या करते हुए तपस्वी मुनियोंकी शरणमें रहते थे ।। २ ।। स जातमात्रान् पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह । प्रादायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः ।। ३ ।। वे राजा पाण्डु अपनी पत्नी और नवजात पुत्रोंको आपलोगोंके पास धरोहर रखकर यहाँसे स्वर्गलोक चले गये ।। ३ ।। तस्येमानात्मजान् देहं भार्या च सुमहात्मनः । स्वराष्ट्र गृह्य गच्छामो धर्म एष हि नः स्मृतः ।। ४ ।। उनके इन पुत्रोंको, पाण्डु और माद्रीके शरीरोंकी अस्थियोंको तथा उन महात्मा नरेशकी महारानी कुन्तीको लेकर हमलोग उनकी राजधानीमें चलें। इस समय हमारे लिये यही धर्म प्रतीत होता है ।। ४ ।। वैशम्पायन उवाच ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षयः । पाण्डोः पुत्रान् पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम् ।। ५ ।। उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः । भीष्माय पाण्डवान् दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि ।। ६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार परस्पर सलाह करके उन देवतुल्य उदारचेता सिद्ध महर्षियोंने पाण्डवोंको भीष्म एवं धृतराष्ट्रके हाथों सौंप देनेके लिये पाण्डुपुत्रोंको आगे करके हस्तिनापुर नगरमें जानेका विचार किया ।। ५-६ ।। तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे । पाण्डोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरे ते च तापसाः ।। ७ ।। उन सब तपस्वी मुनियोंने पाण्डुपत्नी कुन्ती, पाँचों पाण्डवों तथा पाण्डु और माद्रीके शरीरकी अस्थियोंको साथ लेकर उसी क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ।। ७ ।। सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला। प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत ।। ८ ।। पुत्रोंपर सदा स्नेह रखनेवाली कुन्ती पहले बहुत सुख भोग चुकी थी, परंतु अब विपत्तिमें पड़कर बहुत लंबे मार्गपर चल पड़ी; तो भी उसने स्वदेश जानेकी उत्कण्ठा अथवा महर्षियोंके योगजनित प्रभावसे उस मार्गको अल्प ही माना ।। ८ ।। सा त्वदीर्घेण कालेन सम्प्राप्ता कुरुजाङ्गलम् । वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी ।। ९ ।। यशस्विनी कुन्ती थोड़े ही समयमें कुरुजांगल देशमें जा पहुँची और नगरके वर्धमान नामक द्वारपर गयी ।। ९ ।। द्वारिणं तापसा ऊचू राजानं च प्रकाशय । ते तु गत्वा क्षणेनैव सभायां विनिवेदिताः ।। १० ।। तब तपस्वी मुनियोंने द्वारपालसे कहा- 'राजाको हमारे आनेकी सूचना दो!' द्वारपालने सभामें जाकर क्षणभरमें समाचार दे दिया ।। १० ।। तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा । श्रुत्वा नागपुरे नृणां विस्मयः समपद्यत ।। ११ ।। सहस्रों चारणोंसहित मुनियोंका हस्तिनापुरमें आगमन सुनकर उस समय वहाँके लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ११ ।। मुहूर्तोदित आदित्ये सर्वे बालपुरस्कृताः । सदारास्तापसान् द्रष्टुं निर्ययुः पुरवासिनः ।। १२ ।। दो घड़ी दिन चढ़ते-चढ़ते समस्त पुरवासी स्त्रियों और बालकोंको साथ लिये तपस्वी मुनियोंका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर निकल आये ।। १२ ।। स्त्रीसङ्घाः क्षत्रस‌ङ्घाश्च यानसङ्घसमास्थिताः । ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुर्बाह्मणानां च योषितः ।। १३ ।। झुंड-की-झुंड स्त्रियाँ और क्षत्रियोंके समुदाय अनेक सवारियोंपर बैठकर बाहर निकले। ब्राह्मणोंके साथ उनकी स्त्रियाँ भी नगरसे बाहर निकलीं ।। १३ ।। तथा विट्शूद्रसङ्घानां महान् व्यतिकरोऽभवत् । न कश्चिदकरोदीर्ष्यामभवन् धर्मबुद्धयः ।। १४ ।। शूद्रों और वैश्योंके समुदायका बहुत बड़ा मेला जुट गया। किसीके मन में ईर्ष्या का भाव नहीं था। सबकी बुद्धि धर्म में लगी हुई थी ।। १४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️