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कबीर सागर में वर्णित घटनाएं कबीर परमात्मा के चारों युगों में प्रकट होने की महिमा बताती हैं। सतसुकृत, मुनीन्द्र, करुणामय और कबीर—ये चारों नाम एक ही पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के हैं, जो युगों-युगों से मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
द्वापरयुग में 'करुणामय' रूप में आए कबीर साहेब ने रानी इन्द्रमती और उनके पति चंद्रविजय को अपनी शरण में लिया था। जब सर्प ने रानी इन्द्रमती को डसा, तब कबीर साहेब ने उनके गुरु रूप में प्रकट होकर उनकी रक्षा की थी:
डसी सर्प नै जब जाय, पुकारी इन्द्रमति अकुलाय।
आप ने तुरंत करी सहाय, बहरूली मंत्र सुनाने वाले।।
धन-धन सतगुरु सत कबीर, भक्त की पीर मिटाने वाले।।
कबीर परमेश्वर केवल कलियुग में ही नहीं आए, बल्कि वे चारों युगों में प्रकट होते हैं। महाभारत युद्ध के उपरांत पांडवों ने श्रीकृष्ण जी के सान्निध्य में जो धर्म यज्ञ किया था, उसे परमात्मा कबीर जी ने अपने भक्त सुपच सुदर्शन के रूप में आकर पूर्ण करवाया था:
बज्या सुपच का शंख, स्वर्ग में धुनि सुनि।
गण गंधर्व गलतान, सकल ज्ञानी गुनी।।