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द्वापरयुग में कबीर साहेब 'करुणामय' ऋषि के रूप में प्रकट हुए थे। जब पांडवों का यज्ञ सफल नहीं हो रहा था, तब कबीर साहेब ने अपने भक्त सुपच सुदर्शन के रूप में आकर उस यज्ञ को सफल करवाया था। इसका प्रमाण संत गरीबदास जी की वाणी में मिलता है:
सुपच रूप धर आईया, सतगुरु पुरुष कबीर।
तीन लोक की मेदनी, सुर नर मुनि जन भीर।।
कबीर साहेब जी सतयुग में 'सतसुकृत' नाम से मनु जी से मिले थे। उन्होंने मनु जी को तत्वज्ञान (यथार्थ ज्ञान) समझाना चाहा, परंतु मनु जी ने सतसुकृत रूप में आए कबीर साहेब के ज्ञान पर विश्वास करने के बजाय उनका उपहास किया और उन्हें 'वामदेव' (विपरीत ज्ञान देने वाला) कहा। इसका उल्लेख यजुर्वेद के अध्याय 12, मंत्र 4 में मिलता है, जहाँ स्पष्ट है कि वामदेव ने यजुर्वेद के वास्तविक ज्ञान को समझा और अन्य लोगों को भी समझाया। #परमात्मा_चारों_युगमें_आतेहैं


