sn vyas
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10 days ago
#कर्म #कर्म ही पूजा है 📕शास्त्रों मे लिखा है कि मनुष्य शरीर कर्म प्रधान है । जब मनुष्य के भीतर कुछ पाने की इच्छा होती है, तब उसकी कर्म करने मे प्रवृति होती है । कर्म के दो प्रकार हैं – कर्तव्य और अकर्तव्य । निष्काम भाव से कर्म करना ‘कर्तव्य’ हैँ ओर सकामभाव से कर्म करना ‘अकर्तव्य’ है । अकर्तव्य का मूल कारण है – संयोगजन्य सुख की कामना । अपने सुख की कामना मिटने पर अकर्तव्य नही होता । अकर्तव्य न होने पर कर्तव्य का पालन अपने- आप होता है । जो साधन अपने- आप होता है, वह असली होता है और जो साधन किया जाता है, वह नकली होता है ।📕 🧘मनुष्य मे यदि कोई कामना हो जाय तो वह पूरी होगी ही – ऐसा कोई नियम नही है । कामना पूरी होती भी है और नही भी होती । सब कामनाऐं आज तक किसी एक भी व्यक्ति की पूरी नही हुई और पूरी हो सकती भी नही । अगर कामना पैदा हो, तो हो जाय, पर पूरी न हो तो बड़ा दु:ख होता है ! परन्तु मनुष्य की दशा यह है कि वह कामना की अपूर्ति से दु:खी भी होता रहता है ओर कामना भी करता रहता है !🧘 ‼️परिणाम यह होता है कि न तो सब कामनाएँ पूरी होती हैं और न दु:ख ही मिटता है । इसलिये अगर किसी को दु:ख से बचना हो तो इसका उपाय है – कामना का त्याग । यहाँ शंका हो सकती है कि अगर हम कोई भी कामना न करें तो फिर कर्म करे ही क्यों ? इसका समाधान है कि कर्म फल प्राप्ति के लिये भी किया जाता है और फल की कामना का त्याग करने के लिये भी किया जाता है । जो कर्म बन्धन से मुक्त होना चाहता है, वह फलेच्छा का त्याग करने के लिये कर्म करता है ।‼️