यह चित्र भगवान वामन अवतार का है, जिसमें वे अपने विराट त्रिविक्रम रूप में राजा बलि को दर्शन दे रहे हैं। यह कथा भागवत पुराण, विष्णु पुराण तथा अन्य पुराणों में वर्णित है।
भगवान वामन अवतार की पूरी कथा
राजा बलि का उदय
प्राचीन समय में असुरराज महाबली, भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे। वे अत्यंत पराक्रमी, दानी और सत्यवादी राजा थे।
उन्होंने कठोर तप और यज्ञों के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। स्वर्ग भी उनके अधीन हो गया और देवताओं के राजा इंद्र अपना राज्य खो बैठे।
देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उनकी रक्षा करें।
भगवान का वामन अवतार
भगवान विष्णु ने ऋषि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में एक सुंदर ब्राह्मण बालक का अवतार लिया। यही वामन अवतार कहलाए।
उनके हाथ में कमंडल, छाता और दंड था। वे छोटे कद के ब्रह्मचारी के रूप में राजा बलि के यज्ञ में पहुँचे।
तीन पग भूमि का दान
उस समय राजा बलि विशाल अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे और घोषणा कर चुके थे कि कोई भी याचक खाली हाथ नहीं जाएगा।
वामन भगवान ने कहा—
"राजन्! मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए।"
राजा बलि हँसकर बोले—
"मैं तुम्हें पूरे गाँव, नगर या राज्य दे सकता हूँ। केवल तीन पग भूमि ही क्यों?"
वामन बोले—
"जो संतोषी होता है, उसके लिए तीन पग भूमि ही पर्याप्त है।"
शुक्राचार्य की चेतावनी
राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं।
उन्होंने बलि से कहा—
"दान मत दो। यह तुम्हारा सब कुछ ले लेंगे।"
लेकिन राजा बलि ने उत्तर दिया—
"यदि स्वयं भगवान याचक बनकर आए हैं, तो उनसे किया हुआ वचन मैं कैसे तोड़ सकता हूँ?"
उन्होंने दान देने का संकल्प कर लिया।
भगवान का विराट रूप
जैसे ही दान स्वीकार हुआ, छोटा-सा वामन बालक अचानक विराट त्रिविक्रम रूप में बदल गया।
उनका शरीर आकाश से भी ऊँचा हो गया।
पहले कदम में उन्होंने पूरी पृथ्वी नाप ली।
दूसरे कदम में पूरा स्वर्ग और समस्त ब्रह्मांड नाप लिया।
अब तीसरे कदम के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा।
राजा बलि का समर्पण
भगवान ने पूछा—
"राजा बलि! तीसरा कदम कहाँ रखूँ?"
राजा बलि ने हाथ जोड़कर कहा—
"प्रभु! अब मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं बचा। कृपया अपना तीसरा चरण मेरे सिर पर रख दीजिए।"
यह सुनकर भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए।
उन्होंने अपना तीसरा चरण राजा बलि के सिर पर रखा।
यही दृश्य इस चित्र में दर्शाया गया है—भगवान का विराट चरण और उसके सामने नतमस्तक राजा बलि।
भगवान का आशीर्वाद
भगवान विष्णु ने बलि को पाताल लोक का राजा बनाया।
साथ ही उन्हें यह वरदान दिया कि वे स्वयं उनके द्वारपाल बनकर रहेंगे।
कई परंपराओं में माना जाता है कि वर्ष में एक बार राजा बलि अपनी प्रजा से मिलने पृथ्वी पर आते हैं। दक्षिण भारत का प्रसिद्ध ओणम पर्व इसी स्मृति से जुड़ा माना जाता है।
कथा से मिलने वाली शिक्षा
सच्चा दान वही है जिसमें अहंकार न हो।
दिया हुआ वचन हर परिस्थिति में निभाना चाहिए।
भगवान अपने भक्त की परीक्षा लेते हैं, लेकिन अंत में उसका कल्याण ही करते हैं।
विनम्रता, सत्य और समर्पण मनुष्य को महान बनाते हैं।
यह कथा भगवान विष्णु के वामन (त्रिविक्रम) अवतार और राजा बलि की अद्भुत दानशीलता, सत्यनिष्ठा और भगवान के प्रति समर्पण का अमर उदाहरण मानी जाती है।
#श्री हरि विष्णु