सुशील मेहता
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11 hours ago
गुरु अमर दास जयंती सिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमर दास जी का जन्म वैशाख शुक्ल 14वीं, 1479 ई. में अमृतसर के 'बासर के' गांव में पिता तेजभान एवं माता लखमीजी के घर हुआ था। गुरु अमर दास जी बड़े आध्यात्मिक चिंतक थे। वे दिन भर खेती और व्यापार के कार्यो में व्यस्त रहने के बावजूद हरि नाम सिमरन में लगे रहते। लोग उन्हें भक्त अमरदास जी कहकर पुकारते थे। उन्होंने 21 बार हरिद्वार की पैदल फेरी लगाई थी। 26 मार्च, 1552 को अमरदास को सिख गुरु केखिताब से नवाजा गया था। गुरु अमरदास जी एक गुरु होने के साथ-साथ समाज सुधारक के रुप में भी जाने जाते थे। जिन्होने समाज में व्याप्त कई बुराईयों के खिलाफ आवाज उठाई और उनका खंडन किया। उन्होंने हमेशा महिलाओं की बराबरी की बात कही। उनका मानना था कि जिस तरह पुरुष को पुनर्विवाह करने का हक है वैसे ही महिलाओं को भी पुनर्विवाह का अधिकार है। पति की मृत्यु होने पर महिलाओं के सती होने की प्रथा के खिलाफ भी उन्होने आंदोलन छेड़ा। वो हमेशा महिलाओं के पक्ष में रहते थे। समाज को अंधविश्वास से निकालना चाहते थे। उन्होंने लोगों के बीच प्यारऔर सौहार्द बढ़ाने के लिए लंगर के आयोजन की शुरुआत की। गुरु अमरदास जी की जयंती सिख समुदाय बड़ी ही धूम-धाम और हर्षोल्लास के साथ मनाता है। गुरु अमरदास जी सिखों के साथ-साथ हिंदू धर्म में भी काफी लोकप्रिय है।गुरु अमरदास जी एक महान समाज सुधारक थे। वो समाज को केवल अध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं देते थे बल्कि समाज की बुराईयों को दूर करवने में विश्वास रखते थे। वो हमेशा स्त्री शिक्षा, उनकी समानता के पक्षधर थे। उस समय मध्यकालीन भारतीय समाज 'सामंतवादी समाज' होने के कारण अनेक सामाजिक बुराइयों से ग्रस्त था। उस समय जाति-प्रथा, ऊंच-नीच, कन्या-हत्या, सती-प्रथा जैसी अनेक बुराइयां समाज में प्रचलित थीं। ये बुराइयां समाज के स्वस्थ विकास में अवरोध बनकर खड़ी थीं। ऐसे कठिन समय में गुरु अमरदास जी ने इन सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध बड़ा प्रभावशाली आंदोलन चलाया।जाति-प्रथा एवं ऊंच-नीच को समाप्त करने के लिए गुरु जी ने लंगर प्रथा को और सशक्त किया। उस जमाने में भोजन करने के लिए जातियों के अनुसार 'पांतें' लगा करती थीं, लेकिन गुरु जी ने सभी के लिए एक ही पंगत में बैठकर 'लंगर खाना अनिवार्य कर दिया। कहते हैं कि जब मुगल बादशाह अकबर गुरु-दर्शन के लिए गोइंदवाल साहिब आया, तो उसने भी 'संगत' के साथ एक ही 'पंगत' में बैठकर लंगर खाया। लंगर खिलान का मकसद ही यही था कि लोगों के मनमें से उंच-नीच, अमीर-गरीब एवं छोटे-बड़े का भाव मिटे। यही नहीं, छुआछूत को समाप्त करने के लिए गुरु जी ने गोइंदवाल साहिब में एक 'सांझी बावली' का निर्माण भी कराया। कोई भी मनुष्य बिना किसी भेदभाव के इसके जल का प्रयोग कर सकता था। गुरु अमरदास जी ने सबसे ज्यादा जोर विधवा विवाह एवं सती प्रथा पर रोक लगा कर दिया। उनका मानना था कि पुरुषों की तरह ही स्त्रियों को भी पुनः शादी करने का अधिकार होना चाहिये । उन्हें अपनी जिंदगी जीने का हक होना चाहिए। पति के साथ स्त्रियों को नहीं जलना चाहिए। सती प्रथा के प्रति तोका समर्थन नहीं किया। सती-प्रथा जैसी घिनौनी रस्म को स्त्री के अस्तित्व का विरोधी मानकर, उसके विरुद्ध जबरदस्त प्रचार किया। गुरु जी द्वारा रचित 'वार सूही' में सती प्रथा का ज़ोरदार खंडन किया है। इतिहासकारों का मत है कि गुरु जी सती प्रथा के विरोध में आवाज उठाने वाले पहले समाज सुधारक थे। उन्होंने कभी भी इस प्रथा का समर्थन नहीं किया। यह गुरु अमरदास जी एवं बाद के अन्य समाज सुधारकों के प्रयत्नों का ही फल है कि आज का समाज अनेक बुराइयों से दूर हो सका है। #शत शत नमन