प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 क्रांति) दिवस
1857 का भारतीय विद्रोह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ 1857-58 में भारत में एक बड़ा विद्रोह था, जो ब्रिटिश ताज की ओर से एक संप्रभु शक्ति के रूप में कार्य करता था। विद्रोह 10 मई 1857 को दिल्ली से 40 मील (64 किमी) उत्तर-पूर्व में मेरठ के गैरीसन शहर में कंपनी की सेना के सिपाहियों के विद्रोह के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद यह मुख्य रूप से ऊपरी गंगा के मैदान और मध्य भारत में अन्य विद्रोहों और नागरिक विद्रोहों में बदल गया, हालांकि विद्रोह की घटनाएं उत्तर और पूर्व में भी हुईं। नमस्ते विद्रोह ने उस क्षेत्र में ब्रिटिश सत्ता के लिए एक सैन्य खतरा पैदा कर दिया, और 20 जून 1858 को ग्वालियर में विद्रोहियों की हार के साथ ही इस पर काबू पाया जा सका। 1 नवंबर 1858 को, ब्रिटिशों ने हत्या में शामिल नहीं होने वाले सभी विद्रोहियों को माफी दे दी, हालांकि उन्होंने 8 जुलाई 1859 तक औपचारिक रूप से शत्रुता समाप्त होने की घोषणा नहीं की। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सन 1757 में प्लासी का युद्ध जीता। युद्ध के बाद हुई संधि में अंग्रेजों को बंगाल में कर मुक्त व्यापार का अधिकार मिल गया। सन 1764 में बक्सर का युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों का बंगाल पर पूरी तरह से अधिकार हो गया। इन दो युद्धों में हुई जीत ने अंग्रेजों की ताकत को बहुत बढ़ा दिया और उनकी सैन्य क्षमता को परम्परागत भारतीय सैन्य क्षमता से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। कंपनी ने जल्द ही बॉम्बे और मद्रास में अपने ठिकानों के आसपास अपने क्षेत्रों का विस्तार किया; बाद में, आंग्ल-मैसूर युद्ध (1766-1799) और आंग्ल-मराठा युद्ध (1772-1818) के कारण भारत के और भी अधिक हिस्से पर कंपनी का नियंत्रण हो गया।
१८५७ के विद्रोह का एक प्रमुख कारण कंपनी द्वारा भारतीयों का आर्थिक शोषण भी था। कंपनी की नीतियों ने भारत की पारम्परिक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया था। इन नीतियों के कारण बहुत से किसान, कारीगर, श्रमिक और कलाकार कंगाल हो गये। इनके साथ साथ जमींदारों और बड़े किसानों की स्थिति भी बदतर हो गयी। सन १८१३ में कंपनी ने एक तरफा मुक्त व्यापार की नीति अपना ली इसके अन्तर्गत ब्रितानी व्यापारियों को आयात करने की पूरी छूट मिल गयी, परम्परागत तकनीक से बनी हुई भारतीय वस्तुएं इसके सामने टिक नहीं सकी और भारतीय शहरी हस्तशिल्प व्यापार को अकल्पनीय क्षति हुई। विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ। सिपाहियों को पैटऱ्न १८५३ एनफ़ील्ड बंदूक दी गयीं जो कि ०.५७७ कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली (प्रिकशन कैप) का प्रयोग किया गया था परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी।
#शत शत नमन


