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बोझ दिल का उतार आये क्या
दर्द की हद गुज़ार आये क्या
हम समझ लेते है इशारों को
दिल कहीं अपना हार आये क्या
हर मुहब्बत सफल नही होती
तुम मुकद्दर सवार आये क्या
उम्र गुस्ताखियों में गुजारी
कोई अच्छे विचार आये क्या
हिज्र की रात ढल गई तेरी
दिल मे फिर भी करार आये क्या
चाँदनी मिल गई भले तुमको
ज़िन्दगी में मयार आये क्या
वस्ल की रातेँ खुश नुमा होगी
कोई पल खुशगवार आये क्या
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
27/10/2017
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