sn vyas
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1 days ago
#पौराणिक कथा यक्ष और तिनके का रहस्य: एक बार देवताओं और असुरों के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। वह युद्ध सदियों तक चला, लेकिन अंत में भगवान नारायण की गुप्त कृपा से देवताओं की जीत हुई और असुर हारकर पाताल लोक भाग गए। जब युद्ध समाप्त हुआ, तो स्वर्ग लोक में एक भव्य विजय उत्सव रखा गया। उस उत्सव में सभी देवता अपनी-अपनी तारीफों के पुल बांध रहे थे। अग्निदेव गर्व से कह रहे थे, "इस युद्ध में यदि मेरी लपटें असुरों को न जलातीं, तो हम कभी नहीं जीत सकते थे। मेरी शक्ति ही इस विजय का मूल कारण है। वायुदेव ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा, "अगर मैं अपनी आंधी से असुरों के रथों को न उखाड़ता, तो अग्नि भी क्या कर लेती? असली विजेता तो मैं हूँ। देवराज इंद्र अपने सिंहासन पर बैठकर मुस्कुराए, "तुम दोनों भूल रहे हो, मेरे वज्र के प्रहार के बिना शुम्भ-निशुम्भ और अन्य राक्षस कभी नहीं मरते। मैं देवताओं का राजा हूँ, इसलिए यह जीत केवल मेरे पराक्रम की है।इस प्रकार, सभी देवता यह भूल गए कि उन्हें यह शक्ति साक्षात परमब्रह्म (ईश्वर) से मिली थी। वे अपनी ही महिमा के गुणगान में चूर हो गए। देवताओं के इस गहरे अहंकार को दूर करने के लिए, साक्षात परमब्रह्म ने एक कौतुक (लीला) रचा। उत्सव के बीचों-बीच अचानक एक अत्यंत विशाल, रहस्यमयी और दिव्य 'यक्ष' प्रकट हुआ। वह यक्ष इतना ऊंचा था कि उसका सिर बादलों को छू रहा था और उसके शरीर से ऐसा तेज निकल रहा था जिसके सामने सूर्य की रोशनी भी फीकी पड़ गई। उसे देखकर सभी देवता सहम गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह अद्भुत जीव कौन है और कहाँ से आया है। इंद्र ने अग्निदेव से कहा, हे जातवेदा (अग्नि)! तुम देवताओं में सबसे आगे रहते हो। जाओ और पता लगाओ कि यह रहस्यमयी पुरुष कौन है और यहाँ क्यों आया है?अग्निदेव अपने पूरे तेज और धधकती लपटों के साथ उस यक्ष के सामने पहुंचे। उन्होंने गर्व से अपना सीना फुलाया। यक्ष ने शांत और गंभीर आवाज़ में पूछा, "तुम कौन हो हे राहगीर? और तुम्हारी शक्ति क्या है? अग्निदेव अट्टहास करते हुए बोले, "मुझे नहीं जानते? मैं साक्षात अग्निदेव हूँ। इस ब्रह्मांड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मैं पल भर में जलाकर भस्म न कर सकूं। मेरी शक्ति असीम है। यक्ष मंद-मंद मुस्कुराया। उसने जमीन से एक छोटा सा, सूखा हुआ तिनका (घास का टुकड़ा) उठाया और अग्निदेव के सामने रख दिया। यक्ष ने कहा, "यदि तुम इतने ही शक्तिशाली हो, तो जरा इस छोटे से तिनके को जलाकर दिखाओ। अग्निदेव को लगा कि यह उनका अपमान है। उन्होंने खेल-खेल में उस तिनके पर अपनी थोड़ी सी आग फेंकी, पर तिनके को कुछ नहीं हुआ। अग्निदेव हैरान रह गए। उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाई, उनके मुंह से भयंकर ज्वालामुखी जैसी लपटें निकलने लगीं, पूरा स्वर्ग तपने लगा, लेकिन वह छोटा सा तिनका वैसा का वैसा ही हरा-सूखा रहा, उस पर एक काली लकीर तक नहीं आई। अग्निदेव का सारा घमंड पानी-पानी हो गया। वे लज्जित होकर सिर झुकाए वापस इंद्र के पास लौट आए। "महाराज, मैं नहीं जान सका कि वह कौन है। मेरी आग उस तिनके को छू भी नहीं सकी। अब इंद्र ने वायुदेव को भेजा। "हे पवनदेव! आपकी गति को कोई नहीं रोक सकता। आप जाकर इसका रहस्य जानें। वायुदेव बड़े वेग से, कड़कती आंधी और बवंडर बनाते हुए यक्ष के सम्मुख पहुंचे। यक्ष ने फिर वही प्रश्न किया, "तुम्हारा क्या नाम है? और तुम क्या कर सकते हो? वायुदेव ने गर्व से कहा, "मैं वायुदेव हूँ। मैं चाहूं तो पर्वतों को उखाड़ फेंकूं, समुद्र को सुखा दूं और इस पूरे ब्रह्मांड को अपनी फूंक से उड़ा दूं। यक्ष ने फिर वही छोटा सा तिनका आगे बढ़ा दिया। "जरा इस तिनके को अपनी जगह से हिलाकर दिखाओ। वायुदेव हँसे और उन्होंने एक हल्की सी हवा चलाई, पर तिनका अपनी जगह से एक मिलीमीटर भी नहीं हिला। वायुदेव अचंभित हुए। उन्होंने प्रलयंकारी चक्रवात का रूप धारण किया, इतनी तेज हवा चलाई कि स्वर्ग के महल थरथराने लगे, लेकिन वह तिनका पत्थर की तरह अपनी जगह पर जमा रहा। वायुदेव की सांस फूल गई। वे अपनी हार स्वीकार करके वापस लौट आए। "देवराज, मेरी शक्ति वहां काम नहीं कर रही है। अब देवताओं के राजा इंद्र स्वयं आगे बढ़े। वे अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर पूरे वैभव के साथ उस यक्ष की ओर चले। जैसे ही इंद्र वहां पहुंचे, उनका अहंकार तोड़ने के लिए वह यक्ष अचानक अंतर्ध्यान (गायब) हो गया। जहाँ यक्ष खड़ा था, अब वहाँ केवल शून्य था। इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने सोचा, "अग्नि और वायु के सामने तो वह यक्ष बात कर रहा था, पर मेरे आते ही वह गायब हो गया। इसका अर्थ है कि मैं सबसे बड़ा अभिमानी हूँ। इंद्र अहंकार छोड़कर वहीं ज़मीन पर बैठ गए और सच्चे मन से उस अदृश्य शक्ति की आराधना करने लगे। तभी उस आकाश में साक्षात माता उमा (भगवती पार्वती) प्रकट हुईं। वे ज्ञान की देवी हैं। इंद्र ने उनके सामने हाथ जोड़े, "हे माता! कृपा करके मुझे बताइए कि वह अद्भुत यक्ष कौन था, जिसने हमारी सारी शक्तियां छीन ली थीं? माता उमा ने मुस्कुराकर कहा: "हे इंद्र! वह कोई यक्ष नहीं था, वे साक्षात परमब्रह्म (ईश्वर) थे। तुम सब जो अपनी जीत पर घमंड कर रहे थे, वह शक्ति तुम्हारी नहीं थी। अग्नि केवल उतनी ही आग जला सकती है जितनी शक्ति ब्रह्म उसे देते हैं। वायु केवल उतना ही उड़ सकती है जितनी अनुमति उन्हें परमात्मा से मिलती है। वे तुम्हें यह सिखाने आए थे कि इस संसार में 'मैं' कुछ नहीं हूँ, जो कुछ भी है, वह केवल उस एक परमेश्वर की इच्छा है।" यह सुनते ही इंद्र का विवेक जाग उठा। उन्होंने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। उसी दिन से इंद्र, अग्नि और वायु का घमंड हमेशा के लिए समाप्त हो गया और वे समझ गए कि देवताओं का वैभव भी वास्तव में ईश्वर की ही देन है। !! जय श्री कृष्णा!!