#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणाचार्य द्वारा राजकुमारों की शिक्षा, एकलव्य की गुरुभक्ति तथा आचार्य द्वारा शिष्यों की परीक्षा...(दिन 392)
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वैशम्पायन उवाच
ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः । विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी द्रोणाचार्यने भीष्मजीके द्वारा पूजित हो कौरवोंके घरमें विश्राम किया। वहाँ उनका बड़ा सम्मान किया गया ।। १ ।।
विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन् पौत्रानादाय कौरवान् । शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च ।। २ ।।
गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम् । भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः ।। ३ ।।
गुरु द्रोणाचार्य जब विश्राम कर चुके, तब सामर्थ्यशाली भीष्मजीने अपने कुरुवंशी पौत्रोंको लेकर उन्हें शिष्यरूपमें समर्पित किया। साथ ही अत्यन्त प्रसन्न होकर भरद्वाजनन्दन द्रोणको नाना प्रकारके धन-रत्न और सुन्दर सामग्रियोंसे सुसज्जित तथा धन-धान्यसे सम्पन्न भवन प्रदान किया ।। २-३ ।।
स ताज्शिष्यान् महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान् । पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो मुदितमानसः ।। ४ ।।
महाधनुर्धर आचार्य द्रोणने प्रसन्नचित्त होकर उन धृतराष्ट्र-पुत्रों तथा पाण्डवोंको शिष्यरूपमें ग्रहण किया ।। ४ ।।
प्रतिगृह्य च तान् सर्वान् द्रोणो वचनमब्रवीत् ।
रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा ।। ५ ।।
उन सबको ग्रहण कर लेनेपर एक दिन एकान्तमें जब द्रोणाचार्य पूर्ण विश्वासयुक्त मनसे अकेले बैठे थे, तब उन्होंने अपने पास बैठे हुए सब शिष्योंसे यह बात कही ।। ५ ।।
द्रोण उवाच
कार्य मे काङ्क्षितं किंचिद्धृदि सम्परिवर्तते । कृतास्त्रैस्तत् प्रदेयं मे तदेतद् वदतानघाः ।। ६ ।।
द्रोण बोले-निष्पाप राजकुमारो! मेरे मन में एक कार्य करने की इच्छा है। अस्त्रशिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् तुमलोगों को मेरी वह इच्छा पूर्ण करनी होगी। इस विषय में तुम्हारे क्या विचार हैं, बतलाओ ।। ६ ।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन् विशाम्पते । अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परंतप ।। ७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा जनमेजय ! आचार्यकी वह बात सुनकर सब कौरव चुप रह गये; परंतु अर्जुनने वह सब कार्य पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली ।। ७ ।।
ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः।
प्रीतिपूर्व परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ।। ८ ।।
तब आचार्यने बारंबार अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर वे हर्षके आवेशमें रो पड़े ।। ८ ।।
ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च ।
ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान् ।। ९ ।।
तब पराक्रमी द्रोणाचार्य पाण्डवों (तथा अन्य शिष्यों) को नाना प्रकार के दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देने लगे ।। ९ ।।
राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ ।
अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम् ।। १० ।।
भरतश्रेष्ठ ! उस समय दूसरे-दूसरे राजकुमार भी अस्त्रविद्याकी शिक्षा लेनेके लिये द्विजश्रेष्ठ द्रोणके पास आने लगे ।। १० ।।
वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः । सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा ।। ११ ।।
वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशोंके राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण- ये सभी आचार्य द्रोणके पास (अस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये) आये ।। ११ ।।
स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः ।
दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ।। १२ ।।
सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग-डॉट रखता और अत्यन्त अमर्षमें भरकर दुर्योधनका सहारा ले पाण्डवोंका अपमान किया करता था ।। १२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणाचार्य द्वारा राजकुमारों की शिक्षा, एकलव्य की गुरुभक्ति तथा आचार्य द्वारा शिष्यों की परीक्षा...(दिन 394)
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वैशम्पायन उवाच
ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः । विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी द्रोणाचार्यने भीष्मजीके द्वारा पूजित हो कौरवोंके घरमें विश्राम किया। वहाँ उनका बड़ा सम्मान किया गया ।। १ ।।
विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन् पौत्रानादाय कौरवान् । शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च ।। २ ।।
गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम् । भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः ।। ३ ।।
गुरु द्रोणाचार्य जब विश्राम कर चुके, तब सामर्थ्यशाली भीष्मजीने अपने कुरुवंशी पौत्रोंको लेकर उन्हें शिष्यरूपमें समर्पित किया। साथ ही अत्यन्त प्रसन्न होकर भरद्वाजनन्दन द्रोणको नाना प्रकारके धन-रत्न और सुन्दर सामग्रियोंसे सुसज्जित तथा धन-धान्यसे सम्पन्न भवन प्रदान किया ।। २-३ ।।
स ताज्शिष्यान् महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान् । पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो मुदितमानसः ।। ४ ।।
महाधनुर्धर आचार्य द्रोणने प्रसन्नचित्त होकर उन धृतराष्ट्र-पुत्रों तथा पाण्डवोंको शिष्यरूपमें ग्रहण किया ।। ४ ।।
प्रतिगृह्य च तान् सर्वान् द्रोणो वचनमब्रवीत् ।
रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा ।। ५ ।।
उन सबको ग्रहण कर लेनेपर एक दिन एकान्तमें जब द्रोणाचार्य पूर्ण विश्वासयुक्त मनसे अकेले बैठे थे, तब उन्होंने अपने पास बैठे हुए सब शिष्योंसे यह बात कही ।। ५ ।।
द्रोण उवाच
कार्य मे काङ्क्षितं किंचिद्धृदि सम्परिवर्तते । कृतास्त्रैस्तत् प्रदेयं मे तदेतद् वदतानघाः ।। ६ ।।
द्रोण बोले-निष्पाप राजकुमारो! मेरे मन में एक कार्य करने की इच्छा है। अस्त्रशिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् तुमलोगों को मेरी वह इच्छा पूर्ण करनी होगी। इस विषय में तुम्हारे क्या विचार हैं, बतलाओ ।। ६ ।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन् विशाम्पते । अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परंतप ।। ७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा जनमेजय ! आचार्यकी वह बात सुनकर सब कौरव चुप रह गये; परंतु अर्जुनने वह सब कार्य पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली ।। ७ ।।
ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः।
प्रीतिपूर्व परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ।। ८ ।।
तब आचार्यने बारंबार अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर वे हर्षके आवेशमें रो पड़े ।। ८ ।।
ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च ।
ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान् ।। ९ ।।
तब पराक्रमी द्रोणाचार्य पाण्डवों (तथा अन्य शिष्यों) को नाना प्रकार के दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देने लगे ।। ९ ।।
राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ ।
अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम् ।। १० ।।
भरतश्रेष्ठ ! उस समय दूसरे-दूसरे राजकुमार भी अस्त्रविद्याकी शिक्षा लेनेके लिये द्विजश्रेष्ठ द्रोणके पास आने लगे ।। १० ।।
वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः । सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा ।। ११ ।।
वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशोंके राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण- ये सभी आचार्य द्रोणके पास (अस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये) आये ।। ११ ।।
स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः ।
दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ।। १२ ।।
सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग-डॉट रखता और अत्यन्त अमर्षमें भरकर दुर्योधनका सहारा ले पाण्डवोंका अपमान किया करता था ।। १२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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