#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 388)
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द्रोण उवाच
एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता ।। २७ ।।
द्रोण बोले-ये मुट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया है ।। २७ ।।
अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते।
भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया ।। २८ ।।
तुमलोग इसका बल देखो, जो दूसरेमें नहीं है। मैं पहले एक सींकसे उस गुल्लीको बींध दूंगा; फिर दूसरी सींकसे उस पहली सींक को बींधूंगा ।। २८ ।।
तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम ।
इसी प्रकार दूसरी को तीसरी से बींधते हुए अनेक सींकों का संयोग होने पर मुझे गुल्ली मिल जायगी ।। २८ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततो यथोक्तं द्रोणेन तत् सर्वं कृतमञ्जसा ।। २९ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया ।। २९ ।।
तदवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ।
आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचोऽब्रुवन् ।। ३० ।।
यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले ।। ३० ।।
कुमारा ऊचुः
मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर ।
कुमारों ने कहा- ब्रह्मर्षे! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।। ३०
वैशम्पायन उवाच
ततः शरं समादाय धनुर्द्राणो महायशाः ।। ३१ ।।
शरेण विद्ध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत् प्रभुः ।
सशरं समुपादाय कूपादङ्गुलिवेष्टनम् ।। ३२ ।।
ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः ।
मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः ।। ३३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँ से बाण सहित अँगूठी निकालकर उन आश्चर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा ।। ३१-३३ ।।
कुमारा ऊचुः
अभिवादयामहे ब्रह्मन् नैतदन्येषु विद्यते ।
कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे ।। ३४ ।।
कुमार बोले- ब्रह्मन् ! हम आपको प्रणाम करते हैं। यह अद्भुत अस्त्र-कौशल दूसरे किसीमें नहीं है। आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं- यह हम जानना चाहते हैं। बताइये, हमलोग आपकी क्या सेवा करें? ।। ३४ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान्।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा ।। ३४ ।।
द्रोण उवाच
आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्च माम् ।। ३५ ।।
स एव सुमहातेजाः साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते ।
द्रोण बोले-तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो। वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं ।। ३५३ ।।
वैशम्पायन उवाच
तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचुः कुमारकाः ।। ३६ ।।
ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम् ।
भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत ।। ३७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- 'बहुत अच्छा' कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्मणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं ।। ३६-३७ ।।
युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च ।
अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम् ।। ३८ ।।
परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः ।
हेतुमागमने तच्च द्रोणः सर्वं न्यवेदयत् ।। ३९ ।।
फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया ।। ३८-३९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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