#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣0️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
#महाभारत
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कर्ण का रंगभूमि में प्रवेश तथा राज्याभिषेक...(दिन 406)
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द्विधा रंगः समभवत् स्त्रीणां द्वैधमजायत।
कुन्तिभोजसुता मोहं विज्ञातार्था जगाम ह ।। २७ ।।
रंगभूमिके पुरुषों और स्त्रियोंमें भी कर्ण और अर्जुनको लेकर दो दल हो गये। कुन्तिभोजकुमारी कुन्तीदेवी वास्तविक रहस्यको जानती थीं (कि ये दोनों मेरे ही पुत्र हैं), अतः चिन्ताके कारण उन्हें मूर्च्छा आ गयी ।। २७ ।।
तां तथा मोहमापन्नां विदुरः सर्वधर्मवित् ।
कुन्तीमाश्वासयामास प्रेष्याभिश्चन्दनोदकैः ।। २८ ।।
उन्हें इस प्रकार मूर्च्छामें पड़ी हुई देख सब धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने दासियोंद्वारा चन्दनमिश्रित जल छिड़कवाकर होशमें लानेकी चेष्टा की ।। २८ ।।
ततः प्रत्यागतप्राणा तावुभौ परिदंशिती ।
पुत्रौ दृष्ट्वा सुसम्भ्रान्ता नान्वपद्यत किंचन ।। २९ ।।
इससे कुन्तीको होश तो आ गया; किंतु अपने दोनों पुत्रोंको युद्धके लिये कवच धारण किये देख वे बहुत घबरा गयीं। उन्हें रोकनेका कोई उपाय उनके ध्यानमें नहीं आया ।। २९ ।।
तावुद्यतमहाचापौ कृपः शारद्वतोऽब्रवीत्।
द्वन्द्वयुद्धसमाचारे कुशलः सर्वधर्मवित् ।। ३० ।।
उन दोनोंको विशाल धनुष उठाये देख द्वन्द्व युद्धकी नीति-रीतिमें कुशल और समस्त धर्मोंके ज्ञाता शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने इस प्रकार कहा- ।। ३० ।।
अयं पृथायास्तनयः कनीयान् पाण्डुनन्दनः ।
कौरवो भवता सार्धं द्वन्द्वयुद्धं करिष्यति ।। ३१ ।।
त्वमप्येवं महाबाहो मातरं पितरं कुलम् ।
कथयस्व नरेन्द्राणां येषां त्वं कुलभूषणम् ।। ३२ ।।
'कर्ण! ये कुन्तीदेवीके सबसे छोटे पुत्र पाण्डु-नन्दन अर्जुन कुरुवंशके रत्न हैं, जो तुम्हारे साथ इन्द्र-युद्ध करेंगे। महाबाहो! इसी प्रकार तुम भी अपने माता-पिता तथा कुलका परिचय दो और उन नरेशके नाम बताओ, जिनका वंश तुमसे विभूषित हुआ है ।। ३१-३२ ।।
ततो विदित्वा पार्थस्त्वां प्रतियोत्स्यति वा न वा ।
वृथाकुलसमाचारैर्न युध्यन्ते नृपात्मजाः ।। ३३ ।।
'इसे जान लेनेके बाद यह निश्चय होगा कि अर्जुन तुम्हारे साथ युद्ध करेंगे या नहीं; क्योंकि राजकुमार नीच कुल और हीन आचार-विचारवाले लोगोंके साथ युद्ध नहीं करते' ।। ३३ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्य कर्णस्य व्रीडावनतमाननम् ।
बभौ वर्षाम्बुविक्लिन्नं पद्ममागलितं यथा ।। ३४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कृपाचार्यके यों कहनेपर कर्णका मुख लज्जासे नीचेको झुक गया। जैसे वर्षाके पानीसे भींगकर कमल मुरझा जाता है, उसी प्रकार कर्णका मुँह म्लान हो गया ।। ३४ ।।
दुर्योधन उवाच
आचार्य त्रिविधा योनी राज्ञां शास्त्रविनिश्चये ।
सत्कुलीनश्च शूरश्च यश्च सेनां प्रकर्षति ।। ३५ ।।
तब दुर्योधनने कहा- आचार्य! शास्त्रीय सिद्धान्तके अनुसार राजाओंकी तीन योनियाँ हैं- उत्तम कुलमें उत्पन्न पुरुष, शूरवीर तथा सेनापति (अतः शूरवीर होनेके कारण कर्ण भी राजा ही हैं) ।। ३५ ।।
यद्ययं फाल्गुनो युद्धे नाराज्ञा योद्धमिच्छति ।
तस्मादेषोऽङ्गविषये मया राज्येऽभिषिच्यते ।। ३६ ।।
यदि ये अर्जुन राजासे भिन्न पुरुषके साथ रणभूमिमें लड़ना नहीं चाहते तो मैं कर्णको इसी समय अंगदेशके राज्यपर अभिषिक्त करता हूँ ।। ३६ ।।
वैशम्पायन उवाच
(ततो राजानमामन्त्र्य गाङ्गेयं च पितामहम् ।
अभिषेकस्य सम्भारान् समानीय द्विजातिभिः ।।)
ततस्तस्मिन् क्षणे कर्णः सलाजकुसुमैर्घटैः।
काञ्चनैः काञ्चने पीठे मन्त्रविद्भिर्महारथः ।। ३७ ।।
अभिषिक्तोऽङ्गराज्ये स श्रिया युक्तो महाबलः ।
(समौलिहारकेयूरैः सहस्ताभरणाङ्गदैः ।
राजलिङ्गैस्तथान्यैश्च भूषितो भूषणैः शुभैः ।।)
सच्छत्रवालव्यजनो जयशब्दोत्तरेण च ।। ३८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर दुर्योधनने राजा धृतराष्ट्र और गंगानन्दन भीष्मकी आज्ञा ले ब्राह्मणोंद्वारा अभिषेकका सामान मँगवाया। फिर उसी समय महाबली एवं महारथी कर्णको सोनेके सिंहासनपर बिठाकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंने लावा और फूलोंसे युक्त सुवर्णमय कलशोंके जलसे अंगदेशके राज्यपर अभिषिक्त किया। तब मुकुट, हार, केयूर, कंगन, अंगद, राजोचित चिह्न तथा अन्य शुभ आभूषणोंसे विभूषित हो वह छत्र, चॅवर तथा जय-जयकारके साथ राज्यश्रीसे सुशोभित होने लगा ।। ३७-३८ ।।
(सभाज्यमानो विप्रैश्च प्रदत्त्वा ह्यमितं वसु ।) उवाच कौरवं राजन् वचनं स वृषस्तदा । अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददानि ते ।। ३९ ।।
प्रब्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप । अत्यन्तं सख्यमिच्छामीत्याह तं स सुयोधनः ।। ४० ।।
फिर ब्राह्मणोंसे समादृत हो राजा कर्णने उन्हें असीम धन प्रदान किया। राजन् ! उस समय उसने कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनसे कहा- 'नृपतिशिरोमणे! आपने मुझे जो यह राज्य प्रदान किया है, इसके अनुरूप मैं आपको क्या भेंट दूँ? बताइये, आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूँगा।' यह सुनकर दुर्योधनने कहा- 'अंगराज! मैं तुम्हारे साथ ऐसी मित्रता चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो' ।। ३९-४० ।।
एवमुक्तस्ततः कर्णस्तथेति प्रत्युवाच तम् । हर्षाच्चोभौ समाश्लिष्य परां मुदमवापतुः ।। ४१ ।।
उसके यों कहनेपर कर्णने 'तथास्तु' कहकर उसके साथ मैत्री कर ली। फिर वे दोनों बड़े हर्षसे एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर आनन्दमग्न हो गये ।। ४१ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णाभिषेके पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कर्णके राज्याभिषेकसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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