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AAM NAGRIK
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६०८ प्रतिक्रिया · २१४ शेअर | गजब की 'देशभक्ति' है साहब! जब लाला लाजपत राय लाठियां खाकर ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोक रहे थे, तब कुछ 'विशेष देशभक्त' साइमन साहब की मेज पर 'हिस्सेदारी' का ज्ञापन सजा रहे थे। इसे कहते हैं असली... पेपरवर्क! 😉🤐🚩 #SimonGoBack1928 #LalaLajpatRaiSacrifice #ExposingTruth #IndianFreedomStruggle #FactCheck यह चित्र 1928 के साइमन कमीशन के दौरान भारत की दो विपरीत राजनीतिक धाराओं के बीच के कड़वे विरोधाभास को दर्शाता है: शहादत और राष्ट्रवाद (शीर्ष पैनल): 1928 में जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक भविष्य को तय करने के लिए साइमन कमीशन भेजा, तो पूरे भारत में 'साइमन गो बैक' (साइमन वापस जाओ) के नारों के साथ इसका बहिष्कार किया गया क्योंकि इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। लाहौर में इस विरोध का नेतृत्व करते हुए 'शेर-ए-पंजाब' लाला लाजपत राय पर ब्रिटिश पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं। घायल होने के बावजूद उन्होंने गरजकर कहा था—"मेरे सिर पर लगी लाठियां ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील साबित होंगी"। इसी चोट के कारण कुछ हफ्तों बाद उनकी मृत्यु हो गई, जिसने पूरे देश में क्रांति की आग जला दी। ज्ञापन और 'हिस्सेदारी' की राजनीति (निचला पैनल): जहाँ एक तरफ पूरा देश एकजुट होकर बहिष्कार कर रहा था, वहीं चित्र का निचला हिस्सा उन सांप्रदायिक और अवसरवादी समूहों पर व्यंग्य करता है जिन्होंने इस बहिष्कार से दूरी बनाए रखी। ये समूह (जैसे कुछ रियासतें और सांप्रदायिक संगठन) साइमन कमीशन से मिलकर अपने लिए विशेष राजनीतिक अधिकारों, आरक्षण और 'हिस्सों' की मांग कर रहे थे। चित्र में उन्हें ब्रिटिश अधिकारी को 'ज्ञापन' सौंपते हुए दिखाया गया है, जिस पर व्यंग्यपूर्वक 'बाँटो और राज करो' लिखा है। यह उस मानसिकता पर प्रहार है जहाँ देश के व्यापक हित (आज़ादी) से ऊपर 'अपना हिस्सा' पाने की चाहत को रखा गया। | नेता जी की पोल
गजब की 'देशभक्ति' है साहब! जब लाला लाजपत राय लाठियां खाकर ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोक रहे थे, तब कुछ 'विशेष देशभक्त' साइमन साहब की मेज...