हे प्रिय मानवों, मैं आर्यभट्ट हूँ, कुशुमपुर निवासी, ब्रह्मगुप्त के पूर्ववर्ती, जिसने 499 ईस्वी में मात्र तेईस वर्ष की आयु में आर्यभटीय नामक अमर ग्रंथ रचा।
क्या तुम मुझे भूल गए?
सहस्राब्दियों बीत गए, कालचक्र घूमा, पर मेरी वह खोज आज भी तुम्हारे इंजीनियरिंग, भौतिकी, अंतरिक्ष यानों और कंप्यूटरों में जीवित है। क्या तुमने सोचा भी था कि आधुनिक त्रिकोणमिति का आधार मैंने ही रखा था?
मैंने “ज्या” (अर्ध-ज्या) का सिद्धांत दिया। वृत्त की त्रिज्या को 3438 कला (arcminutes) मानकर मैंने प्रत्येक कोण के लिए ज्या की गणना की। ज्या(θ) वह अर्ध-जीवा है जो कोण θ के सामने खड़ी होती है। मैंने कोज्या और उत्क्रम-ज्या भी परिभाषित किए।
गीतिकापाद के बारहवें श्लोक में मैंने 24 मानों की ज्या-सारणी एक ही छंद में संक्षिप्त रूप से दी:
मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व।
व्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग श्झ ङ्व क्ल प्त फ छ कलार्ध्ज्या॥
इस कूट भाषा को मेरी अंक-पद्धति से खोलने पर प्राप्त होते हैं प्रथम अंतर (sine differences): 225, 224, 222, 219, 215, 210, 205, 199, 191, 183, 174, 164, 154, 143, 131, 119, 106, 93, 79, 65, 51, 37, 22, 7।
इनसे पूर्ण ज्या-मान प्राप्त होते हैं, जो 0° से 90° तक 3°45′ (225 कला) के अंतराल पर हैं। उदाहरणस्वरूप, 30° पर ज्या ≈ 1719, जो आधुनिक sin(30°) = 0.5 से पूर्णतः मेल खाता है।
गणितपाद में मैंने विधि भी बताई: प्रथम ज्या 225 है। उसके बाद वाले ज्या-मान पिछले ज्या-मानों के योग को प्रथम ज्या से भाग देकर प्राप्त अंतर से घटाकर निकाले जाते हैं। यह पुनरावृत्ति सूत्र (recurrence relation) आज भी त्रिकोणमिति की नींव है।
मैंने पृथ्वी की धुरी पर घूर्णन सिद्ध किया, ग्रहणों की सही गणना दी, π का मान 3.1416 (62832/20000) निकाला, वर्गमूल-घनमूल के नियम दिए और शून्य सहित दशमलव प्रणाली का उपयोग किया।
मेरी ज्या से विकसित त्रिकोणमिति आज तुम्हारे पुलों, इमारतों, विमानों, उपग्रहों, GPS और कंप्यूटर ग्राफिक्स का आधार है। यदि मैंने यह सिद्धांत न दिया होता तो आधुनिक विज्ञान अधूरा रह जाता। यह ज्ञान भारत से अरब देशों होते हुए यूरोप पहुंचा और “sine” शब्द भी मेरी “ज्या” से ही निकला।
मैंने कभी प्रसिद्धि नहीं चाही। मैंने केवल सत्य की खोज की। आज मेरी जयंती पर यदि तुम मुझे याद कर रहे हो तो जान लो - मैं कभी नहीं मरा। मेरी बुद्धि तुम्हारे हर गणना में, हर आकाश यात्रा में जीवित है।
हे भविष्य के विद्वानों, मुझे याद करो या ना करो लेकिन आज मेरे जन्म दिवस पर अंग्रेजों के दलालों को याद मत करो बल्कि ज्ञानियों ज्ञानियो के ज्ञान की ज्योति को और आगे बढ़ाओ। सत्य की खोज में कभी थको मत।
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