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krishnapedit
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krishnapedit
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1 days ago
भगवान शिव और माता पार्वती की संतान "गर्भ से" न होने के पीछे पुराणों में एक नहीं, तीन जुड़ी हुई कथाएँ मिलती हैं — और तीनों का संबंध श्राप और देवताओं के भय से है। 1. सबसे पहला कारण: रति का श्राप ..... सती के बाद शिव गहरी तपस्या में चले गए। सृष्टि रुकने लगी तो देवताओं ने कामदेव को भेजा कि शिव का ध्यान तोड़ें। शिव ने तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए। कामदेव की पत्नी रति का हृदय टूट गया। दुःख में उसने श्राप दिया "जिस देवी को शिव की अर्धांगिनी बनना है, वह भी मेरी तरह संतान- सुख से वंचित रहेगी, वह कभी गर्भ धारण नहीं कर पाएगी।" इसी कारण कहा जाता है कि पार्वती, जो स्वयं शक्ति और उर्वरता की देवी हैं, फिर भी लंबे समय तक स्वाभाविक रूप से माँ नहीं बन पाईं "शक्ति का स्रोत होते हुए भी वह प्राकृतिक रूप से जन्म नहीं दे सकीं।" 2. दूसरा कारण: देवताओं का डर और उनकी प्रार्थना... शिव-शक्ति का मिलन सामान्य नहीं था। शिव पुराण कहता है, देवताओं को डर था कि यदि शिव और पार्वती का तेज एक साथ गर्भ में आए तो उससे जन्मा बालक इतना शक्तिशाली होगा कि इंद्र का सिंहासन भी हिल जाएगा। इसलिए उन्होंने शिव से प्रार्थना की — "आप पार्वती को कभी गर्भवती न करें।"शिव ने यह बात मान ली। जब तारकासुर वध के लिए पुत्र चाहिए था, तब शिव का वीर्य पार्वती के गर्भ में नहीं, बल्कि अग्नि में गया, अग्नि ने उसे गंगा को दिया, और गंगा से कार्तिकेय का जन्म हुआ। इसलिए कार्तिकेय को "अयोनिज" कहा जाता है। 3. तीसरा कारण: पार्वती का पलट-श्राप ..... जब पार्वती ने देखा कि उनका पुत्र उनके बिना ही जन्म ले रहा है, और देवताओं के कारण उनका मिलन बार-बार बाधित हो रहा है, तो वह अत्यंत क्रोधित हुईं। कथा कहती है पार्वती ने देवताओं को श्राप दिया कि — "तुमने मेरे रज को व्यर्थ किया, इसलिए तुम्हारी पत्नियाँ भी संतानहीन रहेंगी।" और — "पार्वती ने स्वर्गवासियों को श्राप दिया कि उनकी पत्नियाँ बाँझ रहेंगी।" यही कारण है कि पुराणों में अधिकांश देवताओं की अपनी जैविक संतानें नहीं दिखतीं। तो फिर गणेश, कार्तिकेय, अशोकसुंदरी कैसे हुए? कार्तिकेय: शिव के तेज से, अग्नि और गंगा के माध्यम से, कृत्तिकाओं द्वारा पाले गए — पार्वती के गर्भ से नहीं। गणेश: रति के श्राप को तोड़ने के लिए पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से बालक बनाया और उसमें प्राण फूँके — "माँ बनने के लिए गर्भ की नहीं, प्रेम की ज़रूरत होती है।" अशोकसुंदरी: पद्म पुराण के अनुसार कल्पवृक्ष की इच्छा से उत्पन्न। इसलिए शास्त्र कहते हैं — शिव-पार्वती की संतानें "जैविक" नहीं, "संकल्पज" हैं। यह श्राप नहीं, लीला थी, ताकि दुनिया समझे कि ईश्वर का परिवार रक्त से नहीं, भक्ति और इच्छा शक्ति से बनता है हर हर महादेव 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
krishnapedit
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1 days ago
भगवान श्री राम ने सीता जी के स्वयंवर में गुरु विश्वामित्र जी की आज्ञा से शिवजी का कठोर धनुष तोड़ कर सीता जी से विवाह किया था। लेकिन शिवजी का वह धनुष किसने और किससे बनाया था तथा वह शिव धनुष महाराज जनक जी केपास कैसे पहुंचा, इस रहस्य को बहुत कम लोग जानते हैं। पिनाक धनुष की बड़ी विचित्र कथा है। कहते हैं एक बार घोर कानन के अंदर कण्व मुनि बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। तपस्या करते करते समाधिस्थ होने के कारण उन्हें भान ही नहीं रहा कि उनका शरीर दीमक के द्वारा बाँबी बना दिया गया। उस मिट्टी के ढ़ेर पर ही एक सुंदर बाँस उग आया। कण्व जी की तपस्या जब पूर्ण हुई, तब ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने अपने अमोघ जल के द्वारा कण्व जी की काया को सुंदर बना दिया। ब्रह्मा जी ने उन्हें अनेक वरदान प्रदान किए और जब ब्रह्मा जी जाने लगे, तब उन्हें ध्यान आया कि कण्व की मूर्धा पर उगी हुई बाँस कोई साधारण नहीं हो सकती। इसलिए इसका सद्उपयोग किया जाना चाहिए। यह विचारकर ब्रह्मा जी ने वह बाँस काटकर विश्वकर्मा जी को दे दिया। विश्वकर्मा जी ने उससे दो दिव्य धनुष बनाये, जिनमें एक जिसका नाम सारंग था, उन्होंने भगवान विष्णुजी को और एक जिसका नाम पिनाक था,‌शिव जी को समर्पित कर दिया। पिनाक धनुष धारण करने के कारण ही शिवजी को पिनाकी कहा जाता है। शिवजी ने जिस पिनाक धनुष को धारण किया था, उसकी एक टंकार से बादल फट जाते थे और पृथ्वी डगमगा जाती थी। ऐसा लगता था मानों कोई भयंकर भूकंप आ गया हो। यह असाधारण धनुष अत्यंत ही शक्तिशाली था। इसी के मात्र एक ही तीर से भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद यह धनुष देवताओं को सौंप दिया। देवताओं ने इस धनुष को महाराजा जनक जी के पूर्वज देवरात को दे दिया। महाराजा जनक जी के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे। शिवजी का वह धनुष उन्हीं की धरोहर स्वरूप जनक जी के पास सुरक्षित था। इस शिव-धनुष को उठाने की क्षमता कोई नहीं रखता था। एक बार देवी सीता जी ने इस धनुष को उठा दिया था, जिससे प्रभावित हो कर जनक जी ने सोचा कि यह कोई साधारण कन्या नहीं है। अत: जो भी इससे विवाह करेगा, वह भी साधारण पुरुष नहीं होना चाहिए। इसी लिए ही जनक जी ने सीता जी के स्वयंवर का आयोजन किया था और यह शर्त रखी थी कि जो कोई भी इस शिव-धनुष को उठाकर, तोड़ेंगा, सीता जी उसी से विवाह करेंगीं । उस सभा में भगवान श्री राम ने शिव-धनुष तोड़ कर सीता जी से विवाह किया था। जब शिवजी का वह कठोर धनुष टूटा तो उसकी ध्वनि सुनकर परशुराम जी इसलिए क्रोधित होकर जनक जी की सभा में आए थे क्योंकि भगवान शंकर, परशुराम जी के आराध्य देव हैं। जय पिनाक धनुष धारी शिव शंकर भोलेनाथ हर हर महादेव 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
krishnapedit
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5 days ago
सुप्रभात मित्रों 🙏 आज वेदों का सबसे बड़ा रहस्य जान लो 🔥 क्या वेद ऋषियों ने लिखे थे? 99% लोग गलत जानते हैं 🔥 महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका - अध्याय 2 वेदोत्पत्तिविषयः प्रकाशक: परोपकारिणी सभा अजयमेरु पहले ये मनु महाराज का प्रमाण देखो: अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्। दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम्। १ । अ० १ ॥ अध्यापयामास पितॄन् शिशुराङ्गिरसः कविः। अ० २। इति मनुसाक्ष्यत्वात्। अग्न्यादीनां सकाशाद् ब्रह्मापि वेदानामध्ययनं चक्रेऽन्येषां व्यासादीनां तु का कथा! अब सबसे बड़ा सवाल जिसका जवाब हर हिन्दू को पता होना चाहिए 👇 प्रश्न— जो सूक्त और मन्त्रों के ऋषि लिखे जाते हैं, उन्होंने ही वेद रचे हों ऐसा क्यों नहीं माना जाय? महर्षि का उत्तर जो आंखें खोल देगा— ऐसा मत कहो, क्योंकि ब्रह्मादि ने भी वेदों को पढ़ा है। सो श्वेताश्वतर आदि उपनिषदों में यह वचन है कि—'जिसने ब्रह्मा को उत्पन्न किया और ब्रह्मादि को सृष्टि की आदि में अग्नि आदि के द्वारा वेदों का भी उपदेश किया है उसी परमेश्वर के शरण को हम लोग प्राप्त होते हैं।' इसी प्रकार ऋषियों ने भी वेदों को पढ़ा है। क्योंकि जब मरीच्यादि ऋषि और व्यासादि मुनियों का जन्म भी नहीं हुआ था उस समय में भी ब्रह्मादि के समीप वेदों का वर्तमान था। इसमें मनु के श्लोकों की भी साक्षी है कि—'पूर्वोक्त अग्नि वायु रवि और अङ्गिरा से ब्रह्माजी ने वेदों को पढ़ा था।' जब ब्रह्माजी ने वेदों को पढ़ा था तो व्यासादि और हम लोगों की तो कथा क्या ही कहनी है। 💡 सीधी बात: वेद किसी मनुष्य के बनाए हुए नहीं हैं। वेद सृष्टि के आदि में परमेश्वर द्वारा दिए गए ज्ञान हैं। ऋषि तो केवल मन्त्रों के द्रष्टा हैं, रचयिता नहीं। ⚡ अगर आप सनातनी हैं तो ये 3 काम अभी करो: 1. SHARE करो - हर हिन्दू तक ये सत्य पहुंचना चाहिए 2. COMMENT में "वेद सनातन हैं" लिखो 3. SAVE कर लो - बच्चों को भी दिखाना जिसको भी लगता है वेद ऋषियों ने लिखे, उसको ये पोस्ट Tag कर दो 👇 जो सहमत है वो 🔥 वाला Emoji Comment करे #SanatanDharma #Vedas #MaharishiDayanand #VedicKnowledge #HinduDharma #Rigveda #Bharat #VedicWisdom #SatyarthPrakash #Manusmriti #Upanishads #AncientIndia #SpiritualIndia #Hinduism #Dharma #ViralPost #Knowledge #IndianCulture Special #MorningVibes #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
krishnapedit
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15 days ago
माँ शीतला और ज्वरासुर की कथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ शीतला देवी पार्वती का ही एक रूप हैं। वे स्वच्छता और आरोग्य की देवी मानी जाती हैं। ज्वरासुर का जन्म: कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव के पसीने की एक बूंद से ज्वरासुर (बुखार का असुर) का जन्म हुआ। वह अत्यंत शक्तिशाली था और जहाँ भी जाता, वहाँ लोगों को तेज बुखार और गंभीर बीमारियाँ (जैसे चेचक या बड़ी माता) घेर लेती थीं। शीतला माता का आगमन: जब ज्वरासुर का आतंक बढ़ा और देवताओं व मनुष्यों को कोई रास्ता नहीं सूझा, तब देवी पार्वती ने शीतला माता का रूप धारण किया। उन्होंने अपने हाथों में झाड़ू (स्वच्छता के लिए), नीम के पत्ते (औषधि के लिए) और शीतल जल का कलश लिया। युद्ध और विजय: देवी और ज्वरासुर के बीच युद्ध हुआ। अंत में माँ शीतला ने अपनी दिव्यता से ज्वरासुर की गर्मी और रोगों को शांत कर दिया। अपनी हार स्वीकार करते हुए ज्वरासुर ने माता से क्षमा मांगी। माँ ने उसे अपना वाहन (गधा) बनने और भक्तों के रोगों को हरने में सहायक होने का आदेश दिया। बटुक भैरव की भूमिका इस कथा में बटुक भैरव को माँ शीतला के रक्षक और सहायक के रूप में देखा जाता है। रक्षक के रूप में: जब माँ शीतला रोगों का निवारण करने संसार में भ्रमण करती हैं, तब भगवान शिव के बाल रूप बटुक भैरव उनके साथ चलते हैं। वे बुरी शक्तियों से माता के भक्तों की रक्षा करते हैं। संबंध: कई स्थानों पर ऐसी मान्यता है कि ज्वरासुर के प्रकोप को पूरी तरह शांत करने के लिए माँ शीतला ने बटुक भैरव की सहायता ली थी। जहाँ माता शीतलता प्रदान करती हैं, वहीं भैरव बाबा उस नकारात्मक ऊर्जा और भय को जड़ से समाप्त करते हैं। #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
krishnapedit
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17 days ago
चंद्रमा का तेज किसने छीन लिया था? 🌙 जानिये प्रथम ज्योतिर्लिंग 'सोमनाथ' के प्राकट्य का अद्भुत रहस्य! 🔱👇 प्रजापति दक्ष के समझाने पर भी जब चंद्रदेव (सोम) के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया, तो क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें शरीर क्षय (नष्ट) होने का भयंकर श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव को क्षय रोग ने जकड़ लिया और उनका सारा तेज और दिव्य सौंदर्य छिन गया। चंद्रदेव की अन्य पत्नियों की प्रार्थना के बाद भी दक्ष अपना श्राप वापस लेने में असमर्थ रहे। ✨ महादेव की शरण और घोर तपस्या: श्राप से मुक्ति का मार्ग खोजने चंद्रदेव परमपिता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी के मार्गदर्शन पर, वे सीधे 'प्रभास तीर्थ' गए और वहां विधिवत एक शिवलिंग की स्थापना की। महादेव को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने पूरे छः महीने तक एक पैर पर खड़े रहकर 'महामृत्युंजय मंत्र' का 10 करोड़ बार जाप किया! 🕉️ श्राप से मुक्ति और 'सोमनाथ' का प्राकट्य: इस घोर तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने चंद्रदेव को वरदान दिया कि क्षय रोग से उनकी मृत्यु नहीं होगी, बल्कि कृष्ण पक्ष में 15 दिन उनकी कांति घटेगी और शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन बढ़ते हुए पूर्णिमा को वे अपनी पूर्ण कांति प्राप्त कर लेंगे। चंद्रदेव की भावपूर्ण प्रार्थना पर, महादेव माता पार्वती के साथ उसी ज्योतिर्लिंग में सदा के लिए विराजमान हो गए। चंद्रदेव का एक नाम 'सोम' भी है, इसीलिए उनके द्वारा स्थापित यह पावन शिवलिंग 'सोमेश्वर' या 'सोमनाथ' कहलाया। मान्यता है कि सोमनाथ महादेव की पूजा करने से व्यक्ति हर प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्त हो जाता है। 🙏 राधे राधे 🌺 👇 कमेंट्स में 'हर हर महादेव' जरूर लिखें! हर हर महादेव 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #जय श्री राम 🙏
krishnapedit
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17 days ago
अनेकों शोध से पता चलता है की वनस्पति विज्ञान का पितामह होने का श्रेय किसी को दिया जाना चाहिए तो वह ''ऋषि पराशर'' हैं। इस एक ग्रंथ में ही किसी बीच के पौधे बनने से लेकर पेड़ बनने तक संपूर्णता के साथ वैज्ञानिक विवेचन दिया गया है, वह विस्मयकारी है। इस ''वृक्ष आयुर्वेद'' पुस्तक के छह भाग हैं अद्भुत ग्रंथ-पाराशर वृक्ष आयुर्वेद :: इस पुस्तक के 6 भाग हैं- (1). बीजोत्पत्ति काण्ड, (2). वानस्पत्य काण्ड, (3). गुल्म काण्ड, (4).वनस्पति काण्ड, (5). विरुध वल्ली काण्ड एवं (6) चिकित्सा काण्ड। इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं, जिनमें बीज के वृक्ष बनने तक का विवरण है। इसका, इसमें महर्षि पाराशर कहते हैं- आपोहि कललं भुत्वा यत्‌ पिण्डस्थानुकं भवेत्‌। तदेवं व्यूहमानत्वात्‌ बीजत्वमघि गच्छति॥ (1). बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय :: पहले पानी जैली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका आदि बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण करता है। आदि बीज यानी प्रोटोप्लाज्म के बनने की प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति बीजत्व अधिकरण में की गई है। (2). भूमि वर्गाध्याय :: इसमें मिट्टी के प्रकार, गुण आदि का विस्तृत वर्णन है। (3). वन वर्गाध्याय :: इसमें 14 प्रकार के वनों का उल्लेख है। (4). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें प्रकाश संश्लेषण यानी फोटो सिंथेसिस की क्रिया के लिए कहा है :- पत्राणि तु वातातपरञ्जकानि अभिगृहन्ति। यह स्पष्ट है कि वात कार्बन डाय आक्साइड, सूर्य प्रकाश और क्लोरोफिल से अपना भोजन वृक्ष बनाते हैं। (5). पुष्पांग सूत्राध्याय :: इसमें कितने प्रकार के फूल होते हैं, उनके कितने भाग होते हैं, उनका उस आधार पर वर्गीकरण किया गया है। उनमें पराग कहाँ होता है, पुष्पों के हिस्से क्या हैं आदि का उल्लेख है। (6). फलांग सूत्राध्याय :: इसमें फलों के प्रकार, फलों के गुण और रोग का वर्गीकरण किया गया है। (7). वृक्षांग सूत्राध्याय :: इसमें वृक्ष के अंगों का वर्णन करते हुए पाराशर कहते है- पत्रं (पत्ते) पुष्प (फूल) मूलं (जड़) त्वक्‌ (शिराओं सहित त्वचा) काण्डम्‌ (स्टिम्‌) सारं (कठोर तना) सारसं र्नियासा बीजं (बीज) प्ररोहम्‌-इन सभी अंगों का परस्पर सम्बन्ध होता है। (8). बीज से पेड़ का विकास :: पाराशर कहते हैं- बीज मातृका तु बीजस्यम्‌ बीज पत्रन्तुबीजमातृकायामध्यस्थमादि। पत्रञ्च मातृकाछदस्तु तनुपत्रकवत्‌ मातृकाछादनञ्च कञ्चुकमित्याचक्षते॥ बीजन्तु प्रकृत्या द्विविधं भवति एकमातृकं द्विमातृकञ्च। तत्रैकपत्रप्ररोहानां वृक्षाणां बीजमेकमातृकं भवति। द्वि पत्र प्ररोहानान्तु द्विमातृकञ्च। मोनोकॉटिलिडेन और डायकॉटिलिडेन। यानी एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री बीजों का वर्णन है। किस प्रकार बीज धीरे-धीरे रस ग्रहण करके बढ़ते हैं और वृक्ष का रूपधारण करते हैं। कौन सा बीज कैसे उगता है, इसका वर्गीकरण के साथ स्पष्ट वर्णन है। बीज के विभिन्न अंगों के कार्य अंकुरण (जर्मिनेशन) के समय कैसे होते हैं। [वृक्ष आयुर्वेद-द्विगणीयाध्याय] अंकुरनिर्विते बीजमात्रकाया रस: संप्लवते प्ररोहांगेषु। यदा प्ररोह: स्वातन्त्रेन भूम्या: पार्थिवरसं गृहणाति तदा बीज मातृका प्रशोषमा पद्यमे॥ वृक्ष रस ग्रहण करता है, बढ़ता है। जड़ बन जाने के बाद बीज मात्रिका यानी बीज पत्रों की आवश्यकता नहीं रहती, वह समाप्त हो जाती है। फिर पत्तों और फलों की संरचना के बारे में कहा है कि वृक्ष का भोजन पत्तों से बनता है। पार्थिव रस जड़ में से स्यंदिनी नामक वाहिकाओं के द्वारा ऊपर आता है। यह रस पत्तों में पहुंच जाता है। जहां पतली-पतली शिराएं जाल की तरह फैली रहती हैं। ये शिरायें दो प्रकार की हैं- “उपसर्प” और “अपसर्प”। वे रस प्रवाह को ऊपर भी ले जाती हैं और नीचे भी ले जाती हैं। दोनों रास्ते अलग-अलग हैं। “रंजकेन पश्च्यमानात” किसी रंग देने वाली प्रक्रिया से यह पचता है-यानी फोटो सिंथेसिस। यह बड़ा महत्वपूर्ण है। “उत्पादं-विसर्जयन्ति” पत्तियां फोटो सिंथेसिस से दिन में आक्सीजन निकालती हैं और रात में कार्बन डाय अक्साइड। दिन में कार्बन डाय आक्साइड लेकर भोजन बनाती हैं। अतिरिक्त वाष्प का विसर्जन करती हैं, जिसे ट्रांसपिरेशन कहते हैं। जब उसमें से वाष्प का विसर्जन होता है तब उसमें ऊर्जा उत्पन्न होती है, यानी श्वसन की क्रिया का वर्णन है। यह वर्णन बताता है कि किस प्रकार रस का ऊपर चढ़ना, पंक्तियों में जाना, भोजन बनाना, फिर श्वसन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना होता है। इस सारी क्रमिक क्रिया से पेड़ बनता है। इसके अतिरिक्त आज भी कोई दूसरी प्रक्रिया वृक्षों के बढ़ने की ज्ञात नहीं है। अंग्रेजो ने इसलिए ही संस्कृत भाषा और हमारे प्रामाणिक ग्रंथ हटाकर यह भ्रम पैदा किया की ये तो धार्मिक ग्रंथ है लोगो को विज्ञान पढ़ना चाहिए क्या ये ग्रंथ विज्ञान के नही थे.....सोचिए हमने क्या खोया और क्या पाया...?? . #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
krishnapedit
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17 days ago
श्री दामोदर लीला यह कथा भगवान श्रीकृष्ण के भक्त-वत्सल स्वरूप को दर्शाती है, जहाँ ब्रह्मांड के स्वामी अपनी माया को छोड़कर भक्त के प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं। बाल हठ और क्रोध: माता यशोदा जब दूध गरम करने रसोई में गईं, तो बालक कृष्ण ने क्रोधवश माखन के घड़े फोड़ दिए। यह उनकी लीला थी ताकि माता का ध्यान कर्म (काम) से हटकर पूर्णतः उन पर (ईश्वर) पर केंद्रित हो जाए। पकड़ से परे परमात्मा: यशोदा मैया उन्हें दंड देने के लिए पीछे दौड़ीं। जो परमात्मा योगियों के ध्यान में नहीं आते, वे आज एक मैया के डर से भाग रहे थे। अंततः जब माता थक गईं, तो प्रभु स्वयं ही उनके हाथों में आ गए। दो अंगुल का अंतर: मैया ने उन्हें ओखली से बाँधना चाहा, पर हर बार रस्सी 'दो अंगुल' छोटी पड़ जाती थी। ये दो अंगुल वास्तव में जीव का 'अहंकार' और 'प्रयास' हैं। जब तक मनुष्य को लगता है कि वह अपने बल पर ईश्वर को पा लेगा, तब तक परमात्मा हाथ नहीं आते। बंधन का स्वीकार: जब माता पूरी तरह थक गईं और उनका ममत्व (प्रेम) चरम पर पहुँचा, तब श्रीकृष्ण ने स्वयं को बंधवाना स्वीकार किया। प्रेम की इसी रस्सी के कारण उनका नाम 'दामोदर' (दाम = रस्सी, उदर = पेट) पड़ा। उद्धार की कृपा: बंधे होने के बावजूद प्रभु ने ओखली घसीटते हुए नलकुबेर और मणिग्रीव का उद्धार किया, जो जड़वत (वृक्ष) होकर अपने कर्मों का फल भोग रहे थे। निष्कर्ष: दामोदर लीला यह सिखाती है कि भगवान को रस्सी से नहीं, बल्कि केवल अनन्य प्रेम और समर्पण से ही बाँधा जा सकता है। जो सारे जगत को बांधते हैं, वे प्रेम के कारण स्वयं बंधने को भी तैयार रहते हैं। राधे राधे #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
krishnapedit
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18 days ago
एक बार देवर्षि नारद ने पृथ्वीलोक का भ्रमण करने के बाद भगवान विष्णु से शिकायत की कि संसार में न्याय नहीं हो रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि पापियों को सुख मिल रहा है और धर्म की राह पर चलने वाले कष्ट भोग रहे हैं। नारद जी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए एक घटना बताई— पापी चोर: एक चोर ने दलदल में फंसी गाय पर पैर रखकर उसे और कष्ट दिया, लेकिन आगे जाने पर उसे सोने की मोहरों से भरी थैली मिली। धर्मात्मा साधु: उसी गाय को बचाने के लिए एक साधु ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन गाय को मुक्त कराने के बाद वह आगे जाकर गड्ढे में गिर गया। भगवान विष्णु का समाधान: प्रभु ने नारद को समझाया कि यह अन्याय नहीं, बल्कि कर्मों का परिमार्जन है। चोर का भाग्य: चोर के भाग्य में पूर्व कर्मों के कारण वास्तव में एक बड़ा खजाना लिखा था, लेकिन गाय को कष्ट देने के पाप के कारण उसका भाग्य सिमट गया और उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं। साधु का भाग्य: साधु के भाग्य में उस समय मृत्यु लिखी थी, लेकिन गाय की रक्षा करने के पुण्य के कारण उसकी अकाल मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई। निष्कर्ष: यह कथा सिखाती है कि ईश्वर का न्याय मनुष्य की सीमित बुद्धि से परे है। हमारे पुण्य बड़े संकटों को छोटा कर देते हैं और हमारे पाप हमारे बड़े सुखों को कम कर देते हैं। अंततः, नियति और कर्म का संतुलन कभी नहीं बिगड़ता। राधे राधे #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
krishnapedit
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18 days ago
जब धन की देवी माता लक्ष्मी और पालनहार भगवान विष्णु अपने-अपने वाहन पर विराजमान होकर कृपा बरसाते हैं, तब इसका अर्थ सिर्फ सोना-चांदी नहीं होता। यह संकेत है कि जहां लक्ष्मी आती हैं वहां समृद्धि आती है, और जहां विष्णु जी की कृपा होती है वहां स्थिरता, सुरक्षा और जीवन में संतुलन आता है। धन तभी टिकता है जब घर में शांति, धर्म और सद्बुद्धि हो। इसलिए केवल कमाने पर नहीं, सही कर्म, सेवा और संयम पर भी ध्यान देना चाहिए। अगर जीवन में बार-बार धन आता है लेकिन रुकता नहीं, तो रोज सुबह भगवान विष्णु का स्मरण करें और माता लक्ष्मी को दीपक अर्पित करें। धीरे-धीरे रास्ते खुलने लगते हैं, मन शांत होता है और बरकत बढ़ती है। #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस
krishnapedit
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18 days ago
जब माता पार्वती ने महादेव से उनके गले में मौजूद मुंडों का रहस्य जान लिया, तब उन्होंने अमर होने की इच्छा प्रकट की। इसी के फलस्वरूप महादेव ने उन्हें अमर कथा सुनाई.. माता पार्वती के हठ करने पर भगवान शिव उन्हें अमरत्व का ज्ञान देने के लिए तैयार हुए। उन्होंने एक ऐसे स्थान का चयन किया जहाँ कोई अन्य जीव उस गोपनीय कथा को न सुन सके। इसके लिए उन्होंने अमरनाथ गुफा को चुना। गुफा की ओर जाते समय महादेव ने अपने सभी आभूषणों और गणों का त्याग किया (जैसे नंदी को पहलगाम में, चंद्रमा को चंदनवाड़ी में और सर्पों को शेषनाग झील पर छोड़ा)। गुफा में प्रवेश कर महादेव ने चारों ओर अग्नि प्रज्वलित कर दी ताकि कोई भी जीवित प्राणी अंदर न आ सके। कथा शुरू होने से पहले, गुफा के भीतर एक सुख चुके पेड़ के खोखल में एक तोते का अंडा पड़ा था। महादेव की उपस्थिति और वहां की ऊर्जा से वह अंडा फूट गया और उसमें से एक छोटा सा शुक (तोता) निकला। अग्नि के घेरे के कारण वह बाहर नहीं जा सका और चुपचाप वहीं छिपा रहा। महादेव ने माता पार्वती को अमर कथा (ब्रह्म ज्ञान) सुनाना शुरू किया। कथा बहुत लंबी थी। सुनते-सुनते माता पार्वती को थकान महसूस हुई और वे गहरी निद्रा में सो गईं। महादेव को लगा कि माता कथा सुन रही हैं क्योंकि बीच-बीच में "हुंकारी" (हूँ-हूँ की आवाज) सुनाई दे रही थी। वास्तव में, वह हुंकारी माता पार्वती नहीं, बल्कि वह **छोटा तोता** भर रहा था ताकि कथा रुक न जाए। जब कथा समाप्त हुई, तब महादेव ने देखा कि पार्वती जी तो सो रही हैं। उन्होंने आश्चर्य से पूछा कि "फिर हुंकारी कौन भर रहा था?" तभी उनकी दृष्टि उस छोटे तोते पर पड़ी। महादेव क्रोधित हो गए कि एक पक्षी ने अमर कथा सुन ली है। वे उसे मारने के लिए दौड़े। वह तोता अपनी जान बचाकर भागा और सीधे महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम पहुँचा। वहां व्यास जी की पत्नी वाटिका जम्हाई ले रही थीं। वह छोटा तोता सूक्ष्म रूप धारण कर उनके मुख के रस्ते उनके गर्भ में प्रविष्ट हो गया। वह बालक 12 वर्षों तक गर्भ से बाहर नहीं आया क्योंकि उसे डर था कि बाहर आते ही वह माया के जाल में फंस जाएगा। स्वयं भगवान कृष्ण के आश्वासन के बाद वह बालक बाहर आया, जो आगे चलकर महान ज्ञानी महर्षि शुकदेव कहलाए। चूंकि शुकदेव जी ने भगवान शिव के मुख से स्वयं अमर कथा सुनी थी, इसलिए वे जन्म से ही आत्मज्ञानी और माया से मुक्त थे। उन्होंने ही बाद में राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनाई थी हर हर महादेव 🙏 #जय श्री राम 🙏 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस