कबीर

Jaswant Dass
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9 days ago
#GodNightWednesday . सिमरन क्यों करना चाहिए एक आदमी एक संत के पास गया। संत जी से नाम उपदेश लेकर सद्भक्ति करने लगा। कुछ दिन पश्चात वह फिर संत जी के पास गया और कहा कि आप जो सिमरन देते हो उसका क्या फायदा? तोते कि तरह नाममन्त्र रटने की बोल रहे हो। ये बेकार का प्रयास है और समय व्यर्थ करने वाली बात। संत शांत स्वभाव के थे। कुछ देर चुप रहे। फिर संत जी ने कहा कि तू बिलकुल बेवकूफ गधा है। वो व्यक्ति संत जी से गाली सुनकर गुस्से में तिलमिला उठा। बोला आपने ये बात मेरे को क्यों कही। संत जी ने कहा कि मैंने तो तुझे हाथ भी नहीं लगया तू क्यों गुस्सा हो रहा है ? उस व्यक्ति ने कहा कि जी आपने जो कहा वो मेरे दिल को जा के लगा है । संत जी ने कहा कि मैं भी तो यही कह रहा हूँ जो भी सिमरन मन्त्र करते हो वो परमात्मा के दिल को जाके लगता है। तेरा किया हुआ सिमरन परमात्मा के पास पहुँचता है। ये है सिमरन का फायदा #कबीर
Jaswant Dass
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10 days ago
#कबीर #SantRampalJi_Won_Hearts . सतगुरू की भूमिका गरीब, कदली बीच कपूर है, ताहि लखै नहीं कोय। पत्र घूंघची बर्ण है, तहां वहां लीजै जोय।। गरीब, गज मोती मस्तक रहै, घूमै फील हमेश। खान पान चारा नहीं, सुनि सतगुरु उपदेश।। गरीब, जिनकी अजपा ध्वनि लगी, तिनका योही हवाल। सो रापति पुरूष कबीर के, मस्तक जाकै लाल। गरीब, सीप समंदर में रहै, बूठै स्वांति समोय। वहां गज मोती जदि भवै, तब चुंबक चिडिया होय। गरीब, चुंबक चिडिया चंच भरि, डारै नीर बिरोल। जदि गज मोती नीपजै, रतन भरे चहंडोल।। गरीब, चुंबक तो सतगुरु कह्या, स्वांति शिष्य का रूप। बिन सतगुरु निपजै नहीं, राव रंक और भूप।। इन वाणियों में सतगुरू की भूमिका प्रमाण सहित समझाई है। कहा है कि केले के पेड़ के कोइए अथार्त केले का पूरा पेड़ पत्तों ही से निर्मित है। सबसे ऊपर वाला पत्ता गोलाकार में कीप की तरह ऊपर से चौड़ा गोलाकार नीचे कम परिधि का होता है। बीच में खाली होता है। उस गोल पत्ते के खाली भाग को कोइया कहते हैं। उसमे स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूँद गिर जाती है तो उस केले के पत्ते में कपूर बन जाता है। केला शिष्य है। स्वांति सतगुरू का मंत्र नाम है। नाम यदि योग्य शिष्य को दिया जाता है तो उसमें भक्ति रूपी कपूर तैयार होता है। मोक्ष मिलता है। अन्य उदाहरण हाथी का दिया है। कहा है कि हाथी के मस्तिक में एक स्थान परमात्मा ने बनाया है। श्वांति नक्षत्र की बारिश की बूँद ‘‘चुंबक’’ नाम की चिडि़या पृथ्वी पर गिरने से पहले अपने मुख में ग्रहण कर लेती है। वह कभी-कभी हाथी के मस्तक पर बैठी होती है। उसका स्वभाव है कि बारिश की बूँद को मुख में डालूँ। फिर उसका कुछ अंश मुख से नीचे गिर जाता है। वह उस हाथी के मस्तक में बने सुराख में गिर जाता है। उससे हाथी के माथे में बने सुराख में अंदर-अंदर मोती बनने लग जाते हैं। जैसे माता का गर्भ का बच्चा बढ़ता है तो माता का पेट भी बढ़ता रहता है। फिर समय आने पर बच्चा सुरक्षित जन्म लेता है। इसी प्रकार हाथी के उस मोती उद्गम सुराख में कई चुंबक चिडि़या श्वांति की बूँदें डाल देती हैं। हाथी के मस्तक वाले मोती उद्गम स्थान में सैंकड़ों मोती तैयार हो जाते हैं। समय पूरा होने पर अपने आप निकलने लगते हैं। ढ़ेर लग जाता है। यह स्थान सब हाथियों में नहीं होता। इसमें हाथी शिष्य है। चुंबक चिडि़या सतगुरू है। श्वांति बूंद नाम है। जैसे ऐसे सतगुरू रूप चुंबक चिडि़या सच्चे नाम रूपी श्वांति शिष्य के हृदय में डालते हैं। भक्ति तथा मोक्ष रूपी मोती बनते हैं। जिस हाथी के मस्तक के अंदर मोती होते हैं। उसे अंदर ही अंदर नशा हो जाता है। वह मस्ती में मतवाला होकर घूमता रहता है। चारा खाना भी छोड़ देता है। जिन साधकों ने सतगुरू जी से उपदेश सुनकर दीक्षा लेकर सच्चे मन से अजपा जाप जपा तो उनकी ऐसी ही दशा हो जाती है। वे कबीर परमात्मा के हाथी हैं जिनके हृदय में भक्ति रूपी लाल बन रहा है। अन्य उदाहरण सीप का दिया है। सीप एक जल की जीव है। समुद्र में रहती है। समुद्र का जल खारा होता है। जिस समय बारिश होने को होती है, तब समुद्र का जल अंदर से कुछ गर्म होता है। उस ऊष्णता से सीप को बेचैनी होती है। वह जल के ऊपर आकर मुख खोल लेती है। यदि उस समय बारिश की बूँदें गिर जाती हैं तो सीप को शांति हो जाती है। अपना मुख बंद कर लेती है। उस जल को जो सीप के मुख में गिरा, श्वांति कहते हैं। जिस सीप में श्वांति गिरी, उसमें मोती बन जाता है। कुछ समय उपरांत परिपक्व होकर मोती जल में गिर जाता है। इस उदाहरण में सीप शिष्य है। श्वांति दीक्षा मंत्र हैं। बादल सतगुरू है। सीप से मोती अपने आप नहीं निकलता। एक सुकच मीन है। वह मोती के ऊपर के माँस को खाने के लिए उसको टक्कर मारती है कि इस माँस के अंदर घुसकर खाऊँगी। परंतु वह माँस मात्र प्याज के जाले जैसा रक्त वर्ण का होता है। सुकच मछली की टक्कर से मोती सीप से निकलकर समुद्र में गिर जाती है। सुकच मीन सार शब्द है। श्वांती सतनाम है। यदि सुकच मीन टक्कर नहीं मारती है तो वह मोती सीप में ही गलकर नष्ट हो जाता है। गरीब सुकच मीन मिलता ना भाई, तो श्वांति सीप अहले जाई। संत गरीबदास जी ने बताया है कि यदि सुकच मछली नहीं मिलती तो सीप तथा उसमें गिरी श्वांति व्यर्थ जाती। सुकच मछली सारशब्द जानो। सारशब्द सतनाम के जाप को सफल करता है। सतगुरू सारशब्द देता है। इसी प्रकार भक्त को प्रथम नाम, द्वितीय नाम मिल गए। सारनाम नहीं मिला तो मोक्ष नहीं होगा। वह जीवन व्यर्थ गया। परंतु अगला मनुष्य जन्म मिलेगा। उस जन्म में सतगुरू मिले और सब तीनों नाम मिल गए तो मोक्ष हो जाएगा।
Jaswant Dass
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10 days ago
#कबीर #SantRampalJi_Won_Hearts . गुरु दर्श की अभिलाषा सत्संग में समय मिलते ही आने की कोशिश करे तथा सत्संग में मान बड़ाई करने नहीं आवे। अपितु अपने आपको एक बीमार समझ कर आवे। जैसे बीमार व्यक्ति चाहे कितने ही पैसे वाला हो, चाहे उच्च पदवी वाला हो जब हस्पताल में जाता है तो उस समय उसका उद्देश्य केवल रोग मुक्त होना होता है। जहाँ डॉक्टर लेटने को कहे लेट जाता है, बैठने को कहे बैठ जाता है, बाहर जाने का निर्देश मिले बाहर चला जाता है। फिर अन्दर आने के लिए आवाज आए चुपके से अन्दर आ जाता है। ठीक इसी प्रकार यदि हम जन्म मरण का दिव्य रोग खत्म करवाना चाहते है तो आप सतसंग में दिल मे गुरू जी के मिलन की कशिश लिये आते हो तो आपको सतसंग में आने का लाभ मिलेगा अन्यथा आपका आना निष्फल है। सतसंग में जहाँ बैठने को मिल जाए वहीं बैठ जाए, जो खाने को मिल जाए उसे परमात्मा कबीर साहिब की रजा से प्रसाद समझ कर खा कर प्रसन्न चित्त रहे। परमात्मा कबीर साहिब जी कहते है कि दोजग भिस्त स्वर्ग सभी को देखा, राजपाठ के रसिया। तीन लोक से तृप्ति नाही, ए मन भोगी खसिया।। इंद्र कुबेर ईस कि पदवी, ब्रम्हा वरूण धर्मराया। विष्णू नाथ के पुर को जाके, फिर भी वापस आया।। सतगुरू मिले तो इच्छा मिटे, पद मिले पदे समाना। चल हंसा सतलोक पठाऊं, जहाँ आदि अमर स्थाना।। कबीर साहब कहते- मन रूप में काल हमारे अंदर विद्यमान है। इसे यहाँ के सभी सुख सुविधा मिल जाय पुरी पृथ्वी का राज, या स्वर्ग का राज या इंद्र कुबेर ईश अथार्त ब्रम्ह काल भगवान, ब्रम्हा,विष्णू ,शंकर, वरूण, धर्मराज आदि कोई भी पद पदवी मिल जाय तीन लोक राज मिल जाय तो भी संतुष्ट नहीं होता है। हमारा जीव का मन बडा ही चंचल है। परमात्मा कबीर साहिब जी कहते है कि सतगुरु मिले तो यहाँ कि सभी ईच्छाए मिट जाएंगी, कहते है हे हंसआत्मा तुझे उस सतलोक में पहुँचा दुंगा जा आदि अजर अमर अविनासी स्थान है। जहाँ पर जाने के बाद फिर वापस नहीं आना होता है। गरीब, पीछै पीछै हरि फिरैं, आगै संत सुजान। संत करैं सोई साच है, च्यारि जुग प्रवान।। अपने सच्चे भक्त के साथ साथ पीछे-पीछे परमात्मा रहता है। संत जो करते हैं, सच्चा कार्य करते हैं यानि सही करते हैं। कभी किसी का अहित नहीं करते। चारों युगों में प्रमाण रहा है कि संत सही क्रिया करते हैं। भलाई के शुभ कर्म करते हैं। सच्चे साधक परमात्मा के समान आदरणीय हैं। इनके समान अन्य की तुलना नहीं की जा सकती। परमात्मा अपने सच्चे भक्त को अपनी शक्ति प्रदान कर देते हैं। परमात्मा कबीर जी कहते हैं कि मेरी बजाय इन संतों से माँगो। संत परमात्मा से प्राप्त शक्ति से अपने अनुयाईयों की मनोकामना पूर्ण करते हैं। उनकी रक्षा करते हैं। परमात्मा कबीर जी उनके बीच में कोई दखल नहीं देते। इसलिए कहा है कि :- संत करें सो होत है, साहिब अपनी ठौर। परमात्मा ने भक्तों के लिए पृथ्वी तथा इसके सहयोगी सूर्य, आकाश, हवा, व जल अन्य ग्रह बनाए हैं ताकि वे भक्ति करके अपना कल्याण करवा सकें। तीर्थ स्थान भी भक्तों का साधना स्थल है। दान की परंपरा भी भक्ति में अति सहयोगी है। परंतु दान संत को दिया जाए। कुपात्रा को दिया दान तो रण-रेह अथार्त अन उपजाऊ भूमि में बीज डालकर खराब करने के समान है। परमात्मा कबीर जी ने कहा है कि कबीर, गुरू बिना माला फेरते, गुरू बिना देते दान। गुरू बिन दोनों निष्फल है, भावें देखो वेद पुराण।। साधक को चाहिए कि पहले पूर्ण गुरू से दीक्षा ले। फिर उनको दान करे। उनके बताए मंत्रों का जाप करे। गुरूजी से दीक्षा लिए बिना भक्ति के मंत्रों के जाप की माला फेरना तथा दान करना व्यर्थ है। गुरू बनाना अति आवश्यक है। जै सतगुरू की संगत करते, सकल कर्म कटि जाईं। अमर पुरि पर आसन होते, जहाँ धूप न छाँइ।। सन्त गरीब दास ने परमेश्वर कबीर जी से प्राप्त सूक्ष्मवेद में आगे कहा है कि यदि सतगुरू अथार्त तत्वदर्शी सन्त की शरण में जाकर दीक्षा लेते तो उपरोक्त सर्व कर्मों के कष्ट कट जाते अर्थात् न प्रेत बनते, न गधा, न बैल बनते। अमरपुरी पर आसन होता अर्थात् गीता अध्याय 18 श्लोक 62 तथा अध्याय 15 श्लोक 4 में वर्णित सनातन परम धाम प्राप्त होता, परम शान्ति प्राप्त हो जाती। फिर कभी लौटकर संसार में नहीं आते अर्थात् जन्म-मरण का कष्टदायक चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता। उस अमर लोक (सत्यलोक) में धूप-छाया नहीं है अर्थात् जैसे धूप दुःखदाई हुई तो छाया की आवश्यकता पड़ी। उस सत्यलोक में केवल सुख है, दुःख नहीं है। कबीर, भक्ति बीज विनशै नहीं, आय पड़ो सो झोल। जे कंचन बिष्टा पड़े, घटै न ताका मोल।। कबीर परमेश्वर जी ने संत गरीबदास जी को बताया कि मैं अपनी अच्छी आत्माओं को खोजता फिरता हूँ। स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल लोक में कहीं भी मिले, मैं वहीं पहुँच जाता हूँ। उनको पुनः भक्ति की प्रेरणा करता हूँ। मनुष्य जन्म के भूले उद्देश्य की याद दिलाकर भक्ति करने को कहता हूँ। वे अच्छी आत्माऐं पूर्व के किसी जन्म में मेरी शरण में आई होती हैं, परंतु पुनः जन्म में कोई संत न मिलने के कारण वे भक्ति न करके या तो धन संग्रह करने में व्यस्त हो जाती हैं या बुराईयों में फँसकर शराब, माँस खाने-पीने में जीवन नष्ट कर देती हैं या फिर अपराधी बनकर जनता के लिए दुःखदाई बनकर बेमौत मारी जाती हैं। उनको उस दलदल से निकालने के लिए मैं कोई न कोई कारण बनाता हूँ। वे आत्माऐं तत्वज्ञान के अभाव से बुराईयों रूपी कीचड़ में गिर तो जाती हैं, परंतु जैसे कंचन बिष्टा में गिर जाए तो उसका मूल्य कम नहीं होता। बिष्टा से निकालकर साफ कर ले। उसी मोल बिकता है। इसी प्रकार जो जीव मानव शरीर में एक बार मेरी (कबीर परमेश्वर जी की) शरण में किसी जन्म में आ जाता है। प्रथम, द्वितीय या तीनों मंत्रों में से कोई भी प्राप्त कर लेता है। किसी कारण से नाम खंडित हो जाता है, मृत्यु हो जाती है तो उसको मैं नहीं छोडूंगा। कलयुग में सब जीव पार होते हैं। यदि कलयुग में भी कोई उपदेशी रह जाता है तो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग में उन्हीं की भक्ति से मैं बिना नाम लिए, बिना धर्म-कर्म किए आपत्ति आने पर अनोखी लीला करके रक्षा करता हूँ। उसको फिर भक्ति पर लगाता हूँ। उनमें परमात्मा में आस्था बनाए रखता हूँ। गरीब, राम कहा तो क्या हुआ, उर में नहीं यकीन। चोर मुसें घर लूटहि, पाँच पचीसों तीन।। यदि साधक को परमात्मा पर विश्वास ही नहीं है तो नाम सुमरण का कोई लाभ नहीं। उसके मानव जीवन को काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार रूपी पाँच चोर चुरा रहे हैं। इन पाँचों की पाँच-पाँच प्रकृति यानि 25 ये तथा रजगुण के आधीन होकर कोठी-बंगले बनाने में, कभी कार-गाड़ी खरीदने में जीवन नष्ट कर देता है। सतगुण के प्रभाव से पहले तो किसी पर दया करके बिना सोचे समझे लाखों रूपये खर्च कर देता है। फिर उसमें त्राटि देखकर तमोगुण के प्रभाव से झगड़ा कर लेता है। इस प्रकार तीन गुणों के प्रभाव से मानव जीवन नष्ट हो जाता है। यदि तत्वदर्शी संत से ज्ञान सुनकर विश्वास के साथ नाम का जाप करे तो जीवन सफल हो जाता है। जिन जिन भक्तों ने मर्यादा में रहकर जिस स्तर की भक्ति, दान आदि-आदि किया है, उनको लाभ अवश्य मिला है। कबीर, संत मिलन कूं चालिए, तज माया अभिमान। जो-जो कदम आगे रखे, वो ही यज्ञ समान।। कबीर, संत मिलन कूं जाईए, दिन में कई-कई बार। आसोज के मेह ज्यों, घना करे उपकार।। कबीर, दर्शन साधु का, परमात्मा आवै याद। लेखे में वोहे घड़ी, बाकी के दिन बाद।। कबीर, दर्शन साधु का, मुख पर बसै सुहाग। दर्श उन्हीं को होत हैं, जिनके पूर्ण भाग।
Jaswant Dass
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14 days ago
#कबीर #Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6 अल्लाह कबीर.... पवित्र कुरआन में प्रमाण है कि कबीर अल्लाह ही पूजा के योग्य हैं। वह सर्व पापों को विनाश करने वाले हैं। उनकी पवित्र महिमा का गुणगान करो। सूरह - फुरकान 25:58 🙏🙏संत रामपाल जी महाराज Watch Factful Debates Yt
Jaswant Dass
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1 months ago
#GodNightWednesday #TrueWorship_EndsSuffering कबीर, बन्दे तू कर बन्दगी, जे चाहे दीदार। अवसर मानुष जन्म का, बहुर न बारम्बार ।। संत रामपाल जी महाराज जी से निःशुल्क नामदीक्षा व निःशुल्क पुस्तक प्राप्त करने के लिये संपर्क सूत्र : 917496801823 Sa True Story YtChannel #कबीर