कबीर

Jaswant Dass
616 views
7 days ago
#गैरां_के_दुख_दूर_करूं_या_ताकत_सै_मेरे_मैं #laxmibhandar #AnnapurnaYojana #westbengal #trendingnow #facebookpost #trendingpost #AnnapurnaMuhim #AnnapurnaMuhimYouTubeChannel #AnnapurnaMuhim_SantRampalJi #SantRampalJiMaharaj #SatlokAshram मंगलाज, शाजापुर (मध्य प्रदेश) के 70 वर्षीय बुज़ुर्ग जगन्नाथ जी और उनके बेटे की अन्नपूर्णा मुहीम के तहत लगातार तीसरी बार मदद की संत रामपाल जी महाराज जी ने। अन्नपूर्णा मुहिम का सहारा परिवार को राशन और अन्य आवश्यक सामग्रियां पहुँचाई गयी। आमला (बैतुल, म.प्र.): पति के निधन के बाद 4 बच्चों के पालन-पोषण में जूझ रही सोनू चौकीकर को मिला अन्नपूर्णा मुहिम का सहारा परिवार को राशन और अन्य आवश्यक सामग्रियां पहुँचाई गयी। #कबीर
Dhannu Das
1.9K views
20 days ago
*✰किसान, मजदूर बचाओ अभियान, फेस-3✰* पूरी वीडियो अवश्य देखिए *AnnaPurna Muhim* YouTube Channel पर ##Kabir #🙏गीता ज्ञान🛕 #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान #😎मोटिवेशनल गुरु🤘 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
Jaswant Dass
903 views
1 months ago
#GodMorningSunday #शराब_पीना_महापाप . #शब्द ऐसा कोई ना मिला, समुझै सैन सुजान.......। ढोल बाजता ना सुनै, सुरति-बिहूना कान....।। ऐसा कोई ना मिला, हम को देइ पहिचान.....। अपना करि किरपा करै, ले उतार मैदान......।। हम देखत जग जात है, जग देखत हम जाहिं। ऐसा कोई ना मिला, पकरि छुड़ावै बाहिं......।। प्रेमी ढूँढत मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोय.........। प्रेमी से प्रेमी मिले, विष से अमृत होय.........।। सिश तो ऐसा चाहिये, गुरु को सब कुछ देय...। गुरु तो ऐसा चाहिये, सिश से कछु न लेय.....।। हेरत हेरत हेरिया, रहा कबीर हिराय.............। बुंद समानी समुंद में, सो कित हेरी जाय.......।। हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराय.........। समुंद समाना बुंद में, सो कित हेरा जाय.....।। Sa True Story YouTube #कबीर
Jaswant Dass
1K views
1 months ago
#GodNightWednesday #किसानमजदूरबचेगा_तभी_देशबचेगा . बाखबर/ तत्त्वदर्शी संत कुरान शरीफ के ज्ञान का दाता एक बाखबर/ इल्मवाला/ तत्त्वदर्शी संत से पूर्ण परमेश्वर/अल्लाह की जानकारी पूछने का विकल्प छोड़ देता है। वह सर्वोच्च ईश्वर की जानकारी नहीं रखता है। वह किसी 'बाखबर' अर्थात 'तत्त्वदर्शी संत' से अल्लाह की जानकारी प्राप्त करने का निर्देश दे रहा है। कुरान शरीफ- सूरत अल फुरकान 25:59 कबीर प्रभु वही है जिसने जमीन तथा आसमान के बीच में जो भी विद्यमान है सर्व सृष्टी की रचना छः दिन में की तथा सातवें दिन अपने सत्यलोक(अविनाशी लोक) के सिंहासन पर विराजमान हो(बैठ) गया। उसके बारे में किसी बाख़बर से पूछो। बाख़बर अल्लाह से परिचित महात्मा हैं जिन्हें सभी पवित्र ग्रंथों का पूरा ज्ञान है। उन्हें तत्त्वदर्शी संत/धीरानाम कहा जाता है। वह इस सृष्टि की रचना का जानने वाला है, इसका मतलब है कि वह इस ब्रह्मांड के निर्माण के बारे में पूरी तरह से जानता है। अल्लाहु अकबर की सच्ची परिभाषा और अर्थ क्या है? अल्लाहु अकबर' का अर्थ है 'ईश्वर सबसे महत्वपूर्ण है या अल्लाह/ईश्वर सबसे महान है’। यह इस्लाम में एक प्रचलित उद्गार है। इसका उपयोग किसी भी स्थिति में अल्लाह के ऊपर विश्वास की घोषणा के तौर पर किया जाता है। आगे अदान/अजान के कुछ भाग दिए गए है। इसमें 'अल्ला' का अर्थ है सबका मालिक/सर्वशक्तिमान। "अल्लाहु अकबर, आशादू अल्ला इलाहा इल्लल्लाह" भावार्थ: भगवान की शान सभी से अधिक होती है, मैं इस बात का गवाह हूं कि उस अल्लाह के सिवा कोई भगवान नहीं है। अज़ान/अदान (पूजा करने का आह्वान) एक प्रार्थना समारोह है जो इस्लाम में काफी प्रचलित है। इसमें 'अल्लाहु अकबर' से बार-बार एक छोटी प्रार्थना छंद के जरिये फरियाद जाता है। सूक्ष्मवेद में इस तरह की पूजा के बारे में उल्लेख है। उल्ट मोहम्मद महल पठाया, गुज़ बिरज एक कलमा ले आया। रोज़ा बंग नमाज़ दई रे, बिस्मिल की नहीं बात कही रे।।" पूर्ण परमात्मा कबीर ने बताया है, कि मैं मोहम्मद को वहाँ शाश्वत स्थान (सतलोक) में लेकर गया और जब हज़रत मोहम्मद जी वापस आए, तो उन्होंने तीन बातें बताईं- रोजा रखना, बंग देना और नमाज करना। पर उन्होंने बिस्मिल की बात बिल्कुल भी नहीं कही। इस्लाम में अल्लाह का क्या अर्थ है? अल्लाह शब्द इस्लाम में सर्वोच्च/सर्वशक्तिमान ईश्वर का पर्याय है जो दुनिया का निर्माता, नियंत्रक और संयोजक है। क़ुरान शरीफ़- सूरत फुरकान 25, आयत-52 इस बात का प्रमाण देता है कि अल्लाह ही वह 'एक' ईश्वर है। “फला-तूतिईल-काफिरिन-व-जाहिदुम-बिहि-जिहादन-कबीरन” यहां स्पष्ट रूप से 'कबीरन' शब्द वर्णित है। हम इसे 'कबीर/ कबीरा/ कबीरन/ खबीरा/ खबीरन' कह सकते हैं। इस आयत से यह स्पष्ट है कि ब्रह्मांड का निर्माता, सर्वशक्तिमान अल्लाह कबीर है। इस्लाम में अल्लाहु अकबर या भगवान कौन है? सातवीं शताब्दी ईसवी में अरब में पैगंबर मुहम्मद द्वारा फैलाया गया इस्लाम, अल्लाह को एकमात्र ईश्वर के रूप में देखता है और वे मानते हैं कि वह दुनिया का निर्माता, नियंत्रक और संयोजक है। वे कुरान शरीफ/मज़ीद को सबसे पवित्र ग्रंथ मानते हैं जो अल्लाह ने अपने पैगंबर मुहम्मद को दिया था। इस्लाम में पैगम्बर की प्रथा को समझने के लिए आदम, नूह, अब्राहम, मूसा और सुलेमान का उल्लेख करना अनिवार्य है। हज़रत मुहम्मद इस श्रृंखला में अंतिम स्थान पर आते हैं। Farmers Savior SantRampalJi #कबीर
Jaswant Dass
1K views
2 months ago
#GodNightSaturday #महर्षिदयानंदसरस्वती_कीसच्चाई . परमात्मा का तत्त्वज्ञान तुरा न तीखा कूदना पुरूष नहीं रणधीर। नहीं पदमनी नगर में या मोटी तकसीर।। कबीर जी ने बताया है कि हे गरीबदास! जिस नगर व देश में तुरा अथार्त घोड़ा तेज दौड़ने व ऊँचा कूदने वाला नहीं है, और नागरिक रणधीर अथार्त शूरवीर नहीं हैं और जिस देश व नगर में पद्मनी यानि पतिव्रता स्त्री नहीं है तो यह मोटी तकसीर अथार्त बहुत बड़ी गलती है यानि कमी है। इस प्रकार का चरित्रावान स्त्री-पुरूष दोनों का होना अनिवार्य है। विवाह के पश्चात् ससुराल में कुछ लड़कियाँ सर्व श्रृंगार करती हैं। सज-धजकर गलियों से गुजरती हैं। अजीबो गरीब हरकत करती हैं। असहज लगने वाले भड़कीले चमकीले वस्त्र पहनकर बाजार या खेतों में या पानी लेने नल या कूँऐ पर जाती हैं। उनका उद्देश्य क्या होता है? स्पष्ट है कि अपने पति के अतिरिक्त अन्य पुरूषों को अपनी ओर आकर्षित करना। अपनी सुंदरता तथा वैभव का प्रदर्शन करना जो एक अच्छी बहू बेटी के लक्षण नहीं हैं। यदि कहें कि पति को प्रसन्न करने के लिए ऐसा करती हैं तो वे घर तक ही सीमित रहती तो अच्छा होता, परंतु ऐसे लक्षण मन में दोष के प्रतीक होते हैं। साधारण वस्त्र पहनने चाहिए, चाहे मंहगे हों, चाहे सस्ते। बहन-बेटी-बहू की नजर सामने 12 फुट तक रहनी चाहिए। चलते-बैठते, उठते समय ध्यान रखे कि कोई ऐसी गतिविधि न हो जाए जो किसी के लिए उत् प्रेरक हो। जैसे बहन-बेटी, बहू यानि युवती अपने परिजनों के साथ रहती है। ऐसा ही आचरण घर से बाहर होना चाहिए। उसकी प्रशंसा सभ्य समाज किया करता है। अन्य युवाओं को उसका उदाहरण बताते हैं। यदि पैट्रोल को चिंगारी नहीं मिलेगी तो वह विस्फोटक नहीं होता। Visit Sa News Channel #कबीर
Jaswant Dass
951 views
2 months ago
#GodMorningSaturday #महर्षिदयानंदसरस्वती_कीसच्चाई . तुम कौन हो जानना आत्म बोध एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था। एक छोटी सी रियासत के बाहर एक आश्रम में मेहमान हुआ। उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा कि हे स्वामी जी! एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं। कोई उत्तर नहीं मिल रहा है। क्या आप मुझे उत्तर देंगे? स्वामी जी ने कहा कि निश्चित दूंगा। उस संन्यासी ने उस राजा से कहा कि नहीं, आज तुम खाली नहीं लौटोगे। उस राजा ने कहा कि मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं। ईश्वर के बारे मे मुझे समझाने की कोशिश मत करना। मैं सीधा मिलना चाहता हूं। उससे बात करना चाहता हूं। उस संन्यासी ने कहा कि अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर! राजा ने कहा कि माफ़ करिए महाराज! शायद आप समझे नहीं। मैं ईश्वर यानी परम ईश्वर यानी परमात्मा की बात कर रहा हूं, आप यही ये ना समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं। जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो! उस संन्यासी ने कहा कि महानुभाव! भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं। अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं, सीधा जवाब दें। बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो। राजा ने हिम्मत की, उसने कहा कि अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए। संन्यासी ने कहा कि कृपा करो, इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं। राजा ने लिखा है कि अपना नाम, अपना महल, अपना परिचय, अपनी उपाधियां और उसे दीं। वह संन्यासी बोला कि महाशय, ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिख कर दी है। उस संन्यासी ने कहा कि मित्र! अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे? तुम्हारी चेतना, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा? उस राजा ने कहा कि नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा? नाम केवल इस शरीर का नाम है, न कि राजा का या मेरी आत्मा का। ना मेरे विचार का ना मेरे किसी रिस्ते का। तो संन्यासी ने कहा कि एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है। क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं। आज तुम राजा हो, कल गांव के भिखारी हो जाओ तो बदल जाओगे? उस राजा ने कहा कि नहीं, राज्य चला जाएगा, भिखारी हो जाऊंगा, लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा? मै केवल राजा न होकर एक साधारण व्यक्ति बन जाऊगा। मैं तो जो हूं ऐसा ही रहूगा। राजा होकर जो हूं, भिखारी होकर भी वही होऊंगा। न होगा महल, न होगा राज्य, न होगी धनसंपति, लेकिन मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं। तो संन्यासी ने कहा कि तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं। संन्यासी ने कहा कि तुम्हारी उम्र कितनी है ? राजा ने कहा कि चालीस वर्ष। संन्यासी ने कहा कि तो पचास वर्ष के होकर तुम दुसरे हो जाओगे ? बीस वर्ष या जब बच्चे थे तब दुसरे थे? उस राजा ने कहा कि नही महाराज! उम्र बदलती है, शरीर बदलता है लेकिन मैं ? मैं तो जो बचपन में था, जो मेरे भीतर था, वह आज भी है। उस संन्यासी ने कहा कि फिर उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा, शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा। फिर तुम कौन हो ? उसे लिख दो तो पहुंचा दूं भगवान के पास, नहीं तो मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ। यह कोई भी परिचय तुम्हारा नहीं है। राजा ने कहा कि तब तो बड़ी कठिनाई हो गई। उसे तो मैं भी नहीं जानता फिर। जो मैं हूं, उसे तो मैं नहीं जानता ! इन्हीं को मैं जानता हूं मेरा होना I उस संन्यासी ने कहा कि फिर बड़ी कठिनाई हो गई। क्योंकि जिसका मैं परमात्मा को परिचय भी न दे सकता बता भी नही सकता कि कौन मिलना चाहता है, तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलना चाहता है ? तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो। और मैं तुमसे कहे देता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो, उस दिन तुम आओगे नहीं भगवान को खोजने। क्योंकि खुद को जानने में और समझने मे वह भी जान लिया जाता है जो परमात्मा है।परमशक्ति है। Visit Sa News Channel #कबीर
Jaswant Dass
1.5K views
2 months ago
#GodNightMonday #रोटीकपड़ा_चिकित्सा_शिक्षामकान . केशव बन्जारा जब कबीर जी काशी में लीला से लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर शिशु रूप में प्रकट होकर लीला करने आए हुए थे। उसी समय एक रामानन्द जी पंडित थे जो प्रसिद्ध आचार्य माने जाते थे। उनको कबीर परमेश्वर जी ने अपने सत्यलोक के दर्शन कराए, अपना परिचय कराया। फिर वापिस शरीर में लाकर छोड़ा। उसके पश्चात् स्वामी रामानन्द जी ने कहा :- दोहू ठौर है एक तू, भया एक से दोय। गरीबदास हम कारणें, आए हो मग जोय।। बोलत रामानन्द जी, सुन कबीर करतार। गरीबदास सब रूप में, तुम ही बोलनहार।। तुम साहब तुम संत हो, तुम सतगुरू तुम हंस। गरीबदास तव रूप बिन, और न दूजा अंश।। भावार्थ :- स्वामी रामानन्द जी ने कहा है कि हे कबीर जी! आप ऊपर सतलोक में भी हैं, आप यहाँ हमारे पास भी विद्यमान हैं। आप दोनों स्थानों पर लीला कर रहे हैं। वास्तव में आप ही साहब यानि परमात्मा हैं। वास्तव में आप ही पूर्ण संत के गण हैं और वास्तव में सतगुरू भी आप ही हैं तथा एक वास्तविक हंस यानि जैसा भक्त होना चाहिए, वे लक्षण भी आप में ही हैं। कबीर जी एक उदाहरण पेश कर रहे थे कि जैसे मैं मेहनत करके धन कमाता हूँ, भक्ति भी करता हूँ तथा निर्धन होकर भी भोजन-भण्डारा (लंगर) करवाता रहता हूँ। यदि अन्य भक्त भी मेरी तरह पूर्ण विश्वास के साथ ऐसा करेगा तो परमात्मा उस भक्त की ऐसे सहायता करता है जैसे मेरी की है। अठारह लाख साधुओं-भक्तों को तीन दिन भण्डारा-भोजन करा दिया। वास्तव में सब लीला स्वयं कबीर जी ही ने की थी भक्तों का मनोबल बढ़ाने के लिए। वास्तविक कथा इस प्रकार हैः- शेखतकी सब मुसलमानों का मुख्य पीर (गुरू) था जो परमात्मा कबीर जी से पहले से ही खार खाए था अर्थात् पहले से ही ईर्ष्या करता था। सर्व ब्राह्मणों तथा मुल्ला-काजियों व शेखतकी ने मजलिस करके षड़यंत्र के तहत योजना बनाई कि कबीर निर्धन व्यक्ति है। इसके नाम से पत्र भेज दो कि कबीर जी काशी में बहुत बड़े सेठ हैं। उनका पूरा पता है कबीर पुत्र नूरअली अंसारी, जुलाहों वाली कॉलोनी, काशी शहर। कबीर जी तीन दिन का धर्म भोजन-भण्डारा करेंगे। सर्व साधु संत आमंत्रित हैं। प्रतिदिन प्रत्येक भोजन करने वाले को एक दोहर (जो उस समय का सबसे कीमती कम्बल के स्थान पर माना जाता था), एक मोहर (10 ग्राम स्वर्ण से बनी गोलाकार की मोहर) दक्षिणा में देगें। प्रतिदिन जो जितनी बार भी भोजन करेगा, कबीर उसको उतनी बार ही दोहर तथा मोहर दान करेगा। भोजन में लड्डू, जलेबी, हलवा, खीर, दही बड़े, माल पूडे़, रसगुल्ले आदि-2 सब मिष्ठान खाने को मिलेंगे। सुखा सीधा (आटा, चावल, दाल आदि सूखे जो बिना पकाए हुए, घी-बूरा) भी दिया जाएगा। एक पत्र शेखतकी ने अपने नाम तथा दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी के नाम भी भिजवाया। निश्चित दिन से पहले वाली रात्रि को ही साधु-संत भक्त एकत्रित होने लगे। अगले दिन भण्डारा (लंगर) प्रारम्भ होना था। परमेश्वर कबीर जी को संत रविदास दास जी ने बताया कि आपके नाम के पत्र लेकर लगभग 18 लाख साधु-संत व भक्त काशी शहर में आए हैं। भण्डारा खाने के लिए आमंत्रित हैं। कबीर जी अब तो अपने को काशी त्यागकर कहीं और जाना पड़ेगा। कबीर जी तो जानीजान थे। फिर भी अभिनय कर रहे थे, बोले रविदास जी झोंपड़ी के अंदर बैठ जा, सांकल लगा ले। अपने आप झख मारकर चले जाएंगे। हम बाहर निकलेंगे ही नहीं। परमेश्वर कबीर जी अन्य वेश में अपनी राजधानी सत्यलोक में पहुँचे। वहाँ से नौ लाख बैलों के ऊपर गधों जैसा बौरा (थैला) रखकर उनमें पका-पकाया सर्व सामान भरकर तथा सूखा सामान (चावल, आटा, खाण्ड, बूरा, दाल, घी आदि) भरकर पृथ्वी पर उतरे। सत्यलोक से ही सेवादार आए। परमेश्वर कबीर जी ने स्वयं बनजारे का रूप बनाया और अपना नाम केशव बताया। दिल्ली के सम्राट सिकंदर तथा उसका धार्मिक पीर शेखतकी भी आया। काशी में भोजन-भण्डारा चल रहा था। सबको प्रत्येक भोजन के पश्चात् एक दोहर तथा एक मोहर {10 ग्राम सोना }दक्षिणा दी जा रही थी। कई बेईमान साधक तो दिन में चार-चार बार भोजन करके चारों बार दोहर तथा मोहर ले रहे थे। कुछ सूखा सीधा (चावल, खाण्ड, घी, दाल, आटा) भी ले रहे थे। यह सब देखकर शेखतकी ने तो रोने जैसी शक्ल बना ली और जाँच करने लगा। सिकंदर लोधी राजा के साथ उस टैंट में गया जिसमें केशव नाम से स्वयं कबीर जी वेश बदलकर बनजारे (उस समय के व्यापारियों को बनजारे कहते थे) के रूप में बैठे थे। सिकंदर लोधी राजा ने पूछा आप कौन हैं? क्या नाम है? आप जी का कबीर जी से क्या संबंध है? केशव रूप में बैठे परमात्मा जी ने कहा कि मेरा नाम केशव है, मैं बनजारा हूँ। कबीर जी मेरे पगड़ी बदल मित्र हैं। मेरे पास उनका एक छोटा-सा पत्रा गया था कि एक छोटा-सा भण्डारा यानि लंगर करना है, कुछ सामान लेते आइएगा। उनके आदेश का पालन करते हुए सेवक हाजिर है। भण्डारा चल रहा है। शेखतकी तो कलेजा पकड़कर जमीन पर बैठ गया जब यह सुना कि एक छोटा-सा भण्डारा करना है जहाँ पर 18 लाख व्यक्ति भोजन करने आए हैं। प्रत्येक को दोहर तथा मोहर और आटा, दाल, चावल, घी, खाण्ड भी सूखा सीधा रूप में दिए जा रहे हैं। इसको छोटा-सा भण्डारा कह रहे हैं। परंतु ईर्ष्या की अग्नि में जलता हुआ विश्राम गृह में चला गया जहाँ पर राजा ठहरा हुआ था। सिकंदर लोधी ने केशव से पूछा कबीर जी क्यों नहीं आए? केशव ने उत्तर दिया कि उनका गुलाम जो बैठा है, उनको तकलीफ उठाने की क्या आवश्यकता? जब इच्छा होगी, आ जाएंगे। यह भण्डारा तो तीन दिन चलना है। सिकंदर लोधी हाथी पर बैठकर अंगरक्षकों के साथ कबीर जी की झोंपड़ी पर गए। वहाँ से उनको तथा रविदास जी को साथ लेकर भण्डारा स्थल पर आए। सबसे कबीर सेठ का परिचय कराया तथा केशव रूप में स्वयं डबल रोल करके उपस्थित संतों-भक्तों को प्रश्न-उत्तर करके सत्संग सुनाया जो 24 घण्टे तक चला। कई लाख सन्तों ने अपनी गलत भक्ति त्यागकर कबीर जी से दीक्षा ली, अपना कल्याण कराया। भण्डारे के समापन के बाद जब बचा हुआ सब सामान तथा टैंट बैलों पर लादकर चलने लगे, उस समय सिकंदर लोधी राजा तथा शेखतकी, केशव तथा कबीर जी एक स्थान पर खड़े थे, सब बैल तथा साथ लाए सेवक जो बनजारों की वेशभूषा में थे, गंगा पार करके चले गए। कुछ ही देर के बाद सिकंदर लोधी राजा ने केशव से कहा आप जाइये आपके बैल तथा साथी जा रहे हैं। जिस ओर बैल तथा बनजारे गए थे, उधर राजा ने देखा तो कोई भी नहीं था।आश्चर्यचकित होकर राजा ने पूछा कबीर जी! वे बैल तथा बनजारे इतनी शीघ्र कहाँ चले गए? उसी समय देखते-देखते केशव भी परमेश्वर कबीर जी के शरीर में समा गए। अकेले कबीर जी खड़े थे। सब माजरा (रहस्य) समझकर सिकंदर लोधी राजा ने कहा कि कबीर जी! यह सब लीला आपकी ही थी। आप स्वयं परमात्मा हो। शेखतकी के तो तन-मन में ईर्ष्या की आग लग गई, कहने लगा ऐसे-ऐसे भण्डारे हम सौ कर दें, यह क्या भण्डारा किया है? महौछा किया है। महौछा उस अनुष्ठान को कहते हैं जो किसी गुरू द्वारा किसी वृद्ध की गति करने के लिए थोपा जाता है। उसके लिए सब घटिया सामान लगाया जाता है। जग जौनार करना उस अनुष्ठान को कहते हैं जो विशेष खुशी के अवसर पर किया जाता है, जिसमें अनुष्ठान करने वाला दिल खोलकर धन खर्च करता है। संत गरीबदास जी ने कहा है कि :- गरीब, कोई कह जग जौनार करी है, कोई कहे महौछा। बड़े बड़ाई किया करें, गाली काढे़ औछा।। सारांश :- कबीर जी ने भक्तों को उदाहरण दिया है कि यदि आप मेरी तरह सच्चे मन से भक्ति करोगे तथा ईमानदारी से निर्वाह करोगे तो परमात्मा आपकी ऐसे सहायता करता है। भक्त ही वास्तव में सेठ अर्थात् धनवंता हैं। भक्त के पास दोनों धन हैं, संसार में जो चाहिए वह भी धन भक्त के पास होता है तथा सत्य साधना रूपी धन भी भक्त के पास होता है। AnnapurnaMuhim SantRampalJi #कबीर