#ramayan

sn vyas
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6 days ago
#रामायण ज्ञान #रामायण युवराज अंगद संपूर्ण परिचय 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेंटा॥ अंगद बालि के पुत्र थे। बालि इनसे सर्वाधिक प्रेम करता था। ये परम बुद्धिमान, अपने पिता के समान बलशाली तथा भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी और सर्वस्व हरण करने के अपराध में भगवान श्रीराम के हाथों बालि की मृत्यु हुई। मरते समय बालि ने भगवान राम को ईश्वर के रूप में पहचाना और अपने पुत्र अंगद को उनके चरणों में सेवक के रूप में समर्पित कर दिया। अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥ यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ॥ हे नाथ! अब मुझ पर दयादृष्टि कीजिए और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिए। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं राम (आप) के चरणों में प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिए। और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! इसकी बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइए। प्रभु राम ने बालि की अन्तिम इच्छा का सम्मान करते हुए अंगद को स्वीकार किया। सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य मिला और अंगद युवराज बनाये गये। "यह तो हम सब सुनते और पढते आये हैं " भगवान राम ने वानर सेना का नेतृत्व हनुमानजी सुग्रीव या जामवंतजी को नहीं सोपा था। उन्होंने सीता की खोज में वानरी सेना का नेतृत्व युवराज अंगद को ही दिया । सम्पाती से सीता के लंका में होने की बात जानकर तब जम्वंतजी कहते है के वो वृध होने कि वजह से वो 90 योजन पार जा सकते है पर पुरा 100 योजन का सागर पार नही कर सकते. तब अंगद कहते है के वो सागर पार कर सकते है. पर वापस आ सके या नही ये नही पता. तब जम्वंतजी अंगद को नही जाने देते. ओर हनुमानजी को उनकी शक्ति याद करवाते है ओर फिर बजरंगबली लंका जाते है। क्योंकि पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥ परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥ सबके पीछे पवनसुत हनुमान ने सिर नवाया। कार्य का विचार करके प्रभु ने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर-कमल से उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अँगूठी उतारकर दी। क्योंकि प्रभु राम ने दल में केवल हनुमानजी को आशिर्वाद दिया लेकिन आप जानते हैं कि अगंद क्यूँ बापस नहीं आ सकते थे? क्योंकी रावण का पुत्र अक्षय कुमार अंगद का काल था. अगर अंगद सागर पार करके लंका आते तो अक्षय कुमार से युध्ध मे मारे जाते। इसीलिये जब हनुमानजी पहली बार लंका आते है तो पहले रावण के पुत्र अक्षय कुमार का वध कर देते है. और अंगद के लंका आने का रास्ता साफ कर देते हैं अंगद समुद्र पार जाने के लिये तैयार हो गये थे , किन्तु दल का नेता होने के कारण जामवन्त ने इन्हें जाने नहीं दिया और हनुमान लंका गये। भगवान श्रीराम को अंगद के शौर्य और बुद्धिमत्ता पर पूर्ण विश्वास था, इसीलिये उन्होंने रावण की सभा में युवराज अंगद को अपना दूत बनाकर भेजा और यह कहलवाया कि यदि रावण सीता को सम्मान सहित वापस लौटा दे तो वह युद्ध नहीं करेंगे। रावण नीतिज्ञ था। उसने भेदनीति से काम लेते हुए अंगद जी से कहा- "बालि मेरा मित्र था। ये राम-लक्ष्मण तुम्हारे पिता बालि को मारने वाले हैं। यह बड़ी लज्जा की बात है कि तुम अपने पितृघातियों के लिये दूतकर्म कर रहे हो।" युवराज अंगद ने रावण को फटकारते हुए कहा- "मूर्ख रावण! तुम्हारी इन बातों से केवल उनके मन में भेद पैदा हो सकता है, जिनकी श्रीराम के प्रति भक्ति नहीं है। बालि ने जो किया, उसे उसका फल मिला। तुम भी थोड़े दिनों बाद जाकर वहीं यमलोक में अपने मित्र का समाचार पूछना। श्रीराम के दूत रूप में महाबली अंगद ने रावण को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह अपने इरादे से टस से मस नहीं हुआ। लंका से लौटने से पूर्व अपनी ताकत दिखाने के लिए भरे दरबार में अंगद ने अपना पाँव जमीन पर जमाया और रावण को ललकारा कि- "यदि उसके दरबार का कोई भी वीर और बलशाली योद्धा जमीन से मेरा पाँव हिला दे तो हम हार स्वीकार कर लेगें। " मेघनाद और कुंभकर्ण सहित रावण के कई योद्धाओं ने प्रयत्न किए, लेकिन अंगद का पाँव जमीन से कोई नहीं हिला पाया। अंत में रावण स्वयं अंगद का पाँव हिलाने के लिए आया और उसके पाँव पकड़े, किंतु अंगद ने पाँव छुड़ा लिए और रावण से कहा कि- "रावण मेरे पाँव को तुमने जिस प्रकार पकड़ा है, यदि ऐसे ही श्रीराम के चरण पकड़ते तो तुम्हारा कल्याण हो जाता।" जब रावण भगवान राम की निन्दा करने लगा तो युवराज अंगद सह नहीं सके। क्रोध करके इन्होंने मुठ्ठी बाँध कर अपनी दोनों भुजाएँ पृथ्वी पर इतने ज़ोर से मारी कि भूमि हिल गयी। रावण गिरते-गिरते बचा। उसका मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़ा। उनमें से चार मुकुट अंगद ने उठा लिये और श्रीराम के शिविर की ओर फेंक दिये। कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू॥ ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥ प्रभु ने (उनसे) हँसकर कहा - मन में डरो नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं। अरे भाई! ये तो रावण के मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगद के फेंके हुए आ रहे हैं। दो० - तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥ मित्रों इन मुकटो में एक वही मुकुट था जो रावण रधुवन्शीओ से जीत लाया था। लंका युद्ध में भी अंगद का शौर्य अद्वितीय रहा। लाखों राक्षस इनके हाथों यमलोक सिधारे। लंका-विजय के बाद श्री राम अयोध्या पधारे। उनका विधिवत अभिषेक सम्पन्न हुआ। सभी कपि नायकों को जब विदा करके भगवान श्री राम अंगद के पास आये, तब अंगद के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। वे भगवान से बोले- 'नाथ! मेरे पिता ने मरते समय मुझे आप के चरणों में डाला था अब आप मेरा त्याग न करें। मुझे अपने चरणों में ही पड़ा रहने दें। यह कहकर अंगद भगवान के चरणों में गिर पड़े। प्रभु श्री राम ने इन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। उन्होंने अपने निजी वस्त्र तथा आभूषण अंगद को पहनाये और स्वयं इन्हें पहुँचाने चले। अंगद मन मारकर किष्किन्धा लौटे और भगवान के स्मरण में अपना समय बिताने लगे। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰
sn vyas
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14 days ago
**कलियुग और रामचरितमानस: सदियों पहले लिखा गया आज का सच** सोचिए, क्या कोई बिना इंटरनेट और बिना किसी आधुनिक मशीन के यह बता सकता है कि आज से सदियों बाद आपकी दुनिया कैसी दिखेगी? क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 452 साल पहले, जब न बिजली थी, न इंटरनेट और न ही आधुनिक विज्ञान, तब एक संत ने आपके स्मार्टफोन, आज की जहरीली राजनीति और आपके घर के भीतर मरते हुए रिश्तों की पटकथा लिख दी थी? जब हम आज की भागदौड़, गिरते हुए रिश्तों और बाज़ारों में बिकती शिक्षा को देखते हैं, तो हमें लगता है कि यह सब नया है। लेकिन सच तो यह है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने **'रामचरितमानस'** के पन्नों पर सदियों पहले ही हमारे आज का सच दिखा दिया था। आइए, उन दो चौपाइयों के भीतर झाँकते हैं, जहाँ भविष्य की स्याही से आज का चेहरा उकेरा गया है। उनकी चौपाइयां आज महज़ शब्द नहीं, बल्कि हमारे समाज का 'लाइव टेलीकास्ट' हैं: > **चौपाई:** > **बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति विरोध रत सब नर नारी॥** > **द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥** > **अर्थ:** कलियुग में लोग अपने कर्तव्य भूल जाएंगे, रिश्तों की मर्यादा खत्म हो जाएगी। स्त्रियां और पुरुष दोनों ही मर्यादाओं को तोड़कर मनमानी करेंगे। जो ज्ञानी हैं, वे ज्ञान को बेचेंगे और जो रक्षक हैं, वे भक्षक बन जाएंगे। समाज में कोई भी व्यक्ति नैतिकता या मानवीय नियमों को नहीं मानेगा। ### **1. रिश्तों का पतन और 'श्रुति विरोध'** 'बरन धर्म' का अर्थ है—वह जिम्मेदारी जो हमें इंसान बनाती है। आज पिता का धर्म, पुत्र का धर्म और पति-पत्नी की मर्यादा, सब कुछ 'निजी पसंद' की भेंट चढ़ चुका है। जिसे हम 'मॉर्डन' होना कहते हैं, तुलसीदास जी ने उसे 'श्रुति विरोध' (प्राकृतिक नियमों का अपमान) कहा था। आज 'फ्रीडम' के नाम पर हम अपनों से ही दूर हो रहे हैं। जब संस्कार बोझ लगने लगें और स्वार्थ ही जीवन का लक्ष्य बन जाए, तो समझ लीजिए समाज की नींव हिलने लगी है। ### **2. द्विज श्रुति बेचक: शिक्षा का बाज़ारीकरण** तुलसीदास जी ने चेतावनी दी थी कि कलियुग में सबसे बड़ा पाप यह होगा कि ज्ञान की बोली लगेगी। ज़रा अपने आसपास देखिए—महंगे स्कूल, आलीशान कोचिंग सेंटर और अध्यात्म के नाम पर खुली दुकानें। पुराने समय में शिक्षा 'दान' थी, व्यापार नहीं। आज गुरु मार्गदर्शक कम और 'बिजनेसमैन' ज्यादा नज़र आते हैं। सरस्वती की इस नीलामी पर 'श्रुति बेचक' शब्द आज के एजुकेशन मार्केट पर सबसे सटीक प्रहार है। ### **3. भूप प्रजासन: रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं** तुलसीदास जी ने लिखा कि कलियुग के राजा (सत्ताधीश) रक्षक नहीं, भक्षक होंगे। आज सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग जनसेवक के बजाय प्रजा का हक डकारने वाले शिकारी बन चुके हैं। भ्रष्टाचार की दीमक और घोटालों की सड़ांध व्यवस्था की दीवारों से टपक रही है। जिसे हमने सुरक्षा के लिए चुना, वही जब शोषण करने लगे, तो आम आदमी कहाँ जाए? ### **4. कोउ नहिं मान निगम अनुसासन** यहाँ नियम का मतलब सिर्फ कानून तोड़ना नहीं है। हमने प्रकृति के नियम तोड़े, इसलिए आपदाएं आईं; भोजन के नियम तोड़े, इसलिए बीमारियां आईं; और व्यवहार के नियम तोड़े, इसलिए अपराध बढ़े। आज हर व्यक्ति 'जुगाड़' और 'शॉर्टकट' के नशे में चूर है। **जागिए, इससे पहले कि अंधेरा गहरा जाए!** बाबा तुलसी ने जो चित्र खींचा था, वह आज आपके मोबाइल, आपके ऑफिस और आपके घर के भीतर साक्षात मौजूद है। हम चाँद पर पहुँच गए, लेकिन अपनों के दिल तक पहुँचने का रास्ता भूल गए। हम विज्ञान में 'सुपरपावर' तो बन गए, लेकिन संस्कारों के मामले में आज भी निर्धन हैं। यह विश्लेषण हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि यह याद दिलाने के लिए है कि हम वापस उस 'अनुशासन' और 'मर्यादा' की ओर लौटें, जो हमें सच में मानव बनाती है। प्रकृति का नियम अटल है—यदि हम अपनी जड़ों (संस्कारों) को काटेंगे, तो शाखाएं (भविष्य) कभी हरी-भरी नहीं रह सकेंगी। **कलियुग बदला नहीं है, बस तुलसी के शब्द चरित्र बनकर हमारे सामने खड़े हो गए हैं।** #रामायण ज्ञान #रामायण