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#रामायण की सबसे समझदार स्त्री कौन थी? मंदोदरी लंका की महारानी, एक ऋषि की पुत्री, एक राक्षस की पत्नी।
रामायण की सबसे समझदार स्त्री,😱
रामायण में मंदोदरी का नाम आता है, पर कथा नहीं। वह रावण की पत्नी थी, मेघनाद की माँ थी, लंका की पटरानी थी। पर वाल्मीकि जी ने उसे सिर्फ कुछ श्लोक दिए। तुलसीदास जी ने भी दो चार दोहे।
क्यों? क्योंकि मंदोदरी ने कभी युद्ध नहीं किया, कभी शाप नहीं दिया, कभी वर नहीं माँगा, उसने सिर्फ समझाया, रावण को, सीता को लौटा दो, मेघनाद को समझाया, युद्ध मत करो विभीषण को समझाया, भाई को मत छोड़ो।
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पर उसकी किसी ने नहीं सुनी, क्योंकि समझदार स्त्री की आवाज इतिहास में दब जाती है, रावण का अहंकार बड़ा था, मंदोदरी की बुद्धि छोटी पड़ गई।
मंदोदरी का जन्म साधारण नहीं था उसके पिता थे मय दानव, वही मय जिसने पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ का मायामहल बनाया था, शिल्प के आचार्य, देवताओं के भी गुरु।
माता थी हेमा अप्सरा, इंद्र की सभा की नर्तकी, एक दिन मय ने हेमा को देख लिया, प्रेम हुआ विवाह हुआ।
दो पुत्र हुए, मायावी और दुंदुभी, फिर एक कन्या जन्मी, नाम रखा मंदोदरी (मंद यानी कोमल, उदरी यानी पेट, कोमल पेट वाली) अर्थात जिसके विचार कोमल हैं, हृदय कोमल है।
जन्म के समय ज्योतिषियों ने कहा, "यह कन्या असाधारण है, रूप में अप्सरा, बुद्धि में ऋषि, पर इसका विवाह किसी महान तपस्वी से होगा, जो तप से राक्षस बन जाएगा।"
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मय चिंतित हुए, "मेरी पुत्री राक्षस की पत्नी बनेगी?"
हेमा बोली, "भाग्य है पर हमारी बेटी राक्षस को भी देवता बना देगी।"
मंदोदरी का बचपन मय के महल में बीता, पर वह महल साधारण नहीं था, मय ने उसे हवा में बनाया था, दीवारें पारदर्शी, फर्श पर जल, छत पर आकाश।
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मय ने पुत्री को वास्तु सिखाया, शिल्प सिखाया, ज्योतिष सिखाया, वेद सिखाया, मंदोदरी दस साल की उम्र में ही विमान उड़ा लेती थी, सोलह साल में पूरे ब्रह्मांड का नक्शा बना दिया।
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एक दिन उसने पिता से पूछा, "पिताजी, आप दानव होकर भी देवताओं के महल बनाते हो। क्यों?"
मय हँसे, "बेटी, कला का कोई धर्म नहीं होता, दानव का हाथ भी अगर मंदिर बनाए, तो वह देवता हो जाता है।"
यही शिक्षा मंदोदरी के जीवन का मंत्र बनी, वह राक्षसों के बीच रही, पर राक्षसी नहीं बनी
रावण तब ब्राह्मण था विश्रवा ऋषि का पुत्र, कैलाश पर तप कर रहा था, दस हजार साल, हर हजार साल पर एक सिर काटकर अग्नि में डाल देता, नौ सिर कट गए, दसवाँ काटने वाला था कि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। बोले वर माँग रावण ने अमरत्व
का वर माँगा, ब्रम्हा जी ने कहा नहीं ये तो नहीं दे सकता,
कुछ और माँग," तो रावण ने वर माँगा
नर और वानर के सिवा कोई न मार सके।"
"तथास्तु।"
रावण लौटा, पर तप से अहंकार भी आया शक्ति आई तो सत्ता चाहिए थी, उसने लंका जीती, कुबेर को भगाया अब चाहिए थी रानी, ऐसी रानी जो रूपवती हो, गुणवती हो, कुलवती हो।
नारद ने बताया, "मय दानव की पुत्री मंदोदरी तीनों लोक में सुंदर है, और विदुषी भी है।
रावण मय के पास गया, मय ने देखा, तपस्वी है, विद्वान है, ब्राह्मण पुत्र है, हाँ कर दी।
मंदोदरी ने रावण को देखा, तेज था, ज्ञान था, पर आँखों में अभिमान था, उसने पिता से कहा, "पिताजी, यह तप से शक्ति पाए हैं, शक्ति से विनाश न करें।"
मय बोले, "बेटी, तू सुधार लेना। स्त्री ही पुरुष को बनाती है।"
विवाह हो गया, मंदोदरी लंका की महारानी बनी।
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रावण ने सोने की लंका सजाई, पर मंदोदरी ने तुलसी का पौधा लगाया, रावण ने मदिरा के सरोवर बनाए, मंदोदरी ने गौशाला बनवाई, रावण ने युद्ध के नगाड़े बजवाए, मंदोदरी ने वेद पाठ करवाया।
एक दिन रावण ने पूछा, "तू राक्षसी होकर ऋषियों वाले काम क्यों करती है?"
मंदोदरी बोली, "स्वामी, आप ब्राह्मण होकर राक्षसों वाले काम क्यों करते हो? मैं आपको आपका कुल याद दिलाती हूँ।"
रावण हँस पड़ा, "तू मुझे सुधारेगी? मैं त्रिलोक विजेता हूँ।" मंदोदरी ने कहा,
"विजेता वही जो मन को जीते, आप तो मन के दास हैं।
रावण को गुस्सा आया, पर मंदोदरी से प्रेम भी था। उसकी बात टाल देता, पर भूलता नहीं।
मंदोदरी को पुत्र हुआ, मेघनाद जन्मते ही बादल गरजे इसलिए नाम पड़ा मेघनाद, बाद में इंद्र को जीता तो इंद्रजीत कहलाया।
मंदोदरी ने पुत्र को युद्ध नहीं, वेद पढ़ाया। धनुर्विद्या सिखाई, पर साथ में कहा, "पुत्र, शस्त्र रक्षा के लिए है, आक्रमण के लिए नहीं।"
मेघनाद ने निकुंभिला यज्ञ किया। ब्रह्मास्त्र पाया, मंदोदरी डर गई, "पुत्र, यह शक्ति तुझे अहंकारी न बना देगी"
मेघनाद बोला, "माँ, मैं धर्म के लिए लड़ूंगा।"
"तो पहले धर्म जान, धर्म वह नहीं जो पिता कहें, धर्म वह है जो वेद कहें।"
शूर्पणखा की नाक कटी, वह रोती हुई लंका आई, रावण ने प्रतिशोध लिया। सीता का हरण कर लिया।
अशोक वाटिका में सीता को रखा, लंका में खबर फैली मंदोदरी के पास दासियाँ दौड़ीं। "महारानी, राजा किसी स्त्री को उठा लाए हैं। बहुत सुंदर है।"
मंदोदरी का कलेजा बैठ गया, वह रावण के पास गई, पहली बार क्रोधित हुई।
"यह क्या किया स्वामी? पराई स्त्री को हर लाए? आप ब्राह्मण हैं, ज्ञानी हैं, यह पाप है।"
रावण हँसा, "पाप मैं रावण हूँ।, मैं जिसे चाहूँ, ले आऊँ, सीता मेरी रानी बनेगी।"
"कभी नहीं बनेगी, वह पतिव्रता है राम साधारण मानव नहीं, विष्णु के अवतार हैं। आप काल को न्योता दे रहे हैं।"
रावण ने कहा, "तू स्त्री है, युद्ध की बातें मत कर महल में रह।"
मंदोदरी बोली, "मैं स्त्री हूँ, इसलिए कह रही हूँ। स्त्री का दुख स्त्री जानती है, सीता को लौटा दीजिए, अभी भी समय है।"
रावण ने नहीं सुना मंदोदरी लौट आई रात भर रोती रही।
मंदोदरी सीता से मिलने गईं, अशोक वाटिका में सीता शिंशपा वृक्ष के नीचे बैठी थीं, पीली साड़ी, खुले बाल, आँखों में आँसू।
मंदोदरी ने पैर छुए, "दीदी, मैं लंका की महारानी मंदोदरी, मुझे क्षमा कर दो मेरे पति ने अपराध किया है।"
सीता ने सिर उठाया "तुम क्यों क्षमा माँगती हो? अपराध तुमने नहीं किया,
"पर मैं रोक नहीं पाई मैं पत्नी हूँ, मेरा धर्म था रोकना।"
सीता जी बोलीं, "हर पत्नी रावण को नहीं रोक सकती तुमने प्रयास किया, यही बहुत है।"
मंदोदरी ने कहा, "दीदी, आप लौट जाओ। मैं रावण को समझाऊँगी आप कहो तो मैं अग्नि में प्रवेश कर लूँगी।"
सीता ने हाथ पकड़ा, "नहीं बहन अग्नि परीक्षा मेरी है तू अपनी मर्यादा न तोड़ तू पति के साथ है, यह तेरा धर्म है पर पाप के साथ मत होना।"
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दोनों रोईं एक पतिव्रता, एक लाचार उस दिन लंका की महारानी और अयोध्या की महारानी एक हो गईं।
राम लंका आए अंगद दूत बनकर आए रावण नहीं माना युद्ध शुरू हुआ।
मेघनाद निकला मंदोदरी ने आरती उतारी "पुत्र, विजयी भव पर अधर्म के लिए मत लड़ना।"
मेघनाद बोला, "माँ, पिता की आज्ञा है।"
"पिता की आज्ञा धर्म से बड़ी नहीं होती,
मेघनाद गया लक्ष्मण से युद्ध हुआ। मेघनाद मरा।
समाचार आया, मंदोदरी छाती पीटकर रोई "हाय मेरा बेटा मैंने मना किया था। तूने क्यों नहीं सुना?"
रावण आया "रोती क्यों है? क्षत्राणी का पुत्र वीरगति पाया है।"
मंदोदरी चिल्लाई, "क्षत्राणी नहीं, माँ हूँ। मेरा बेटा धर्म के लिए नहीं, अहंकार के लिए मरा, तुमने मार डाला उसे तुमने!"
पहली बार उसने रावण को तुम कहकर बुलाया रावण स्तब्ध रह गया।
रावण अकेला पड़ गया कुंभकर्ण मरा मेघनाद मरा सेना हारी विभीषण राम के पास चला गए।
रात को मंदोदरी रावण के पास गई आखिरी बार।
"स्वामी, अभी भी समय है सीता को लौटा दो राम के चरण पकड़ लो, वे करुणामय हैं। क्षमा कर देंगे विभीषण को राजा बना देंगे। आप वन में तप करो।"
रावण हँसा फीकी हँसी "मंदोदरी, तू नहीं समझेगी। मैं रावण हूँ झुकना नहीं जानता। राम मुझे मारेंगे, तो मोक्ष मिलेगा शरण गया तो कलंक मिलेगा इतिहास मुझे कायर कहेगा।"
मंदोदरी रोई "इतिहास आपको अहंकारी कह रहा है मेरे बेटे को खा गया आपका अहंकार अब आपको खाएगा।"
रावण ने मंदोदरी का हाथ पकड़ा "तू सती है। मेरे मरने के बाद सती मत होना जीना क्योंकि तू जिएगी तो दुनिया जानेगी कि रावण की पत्नी कैसी थी।"
मंदोदरी कुछ न बोली बस रोती रही।😭
अगले दिन युद्ध हुआ राम जी ने रावण को मारा लंका में हाहाकार मचा।
मंदोदरी दौड़ी, युद्धभूमि में रावण का शव पड़ा था, बीस भुजाएँ, दस सिर, सब कटे हुए, पर चेहरे पर तेज था।
मंदोदरी गिर पड़ी। विलाप करने लगी। वाल्मीकि जी ने उस विलाप को लिखा है।
"हा आर्यपुत्र! हा महाबाहो! हा दशग्रीव! तुमने मेरी नहीं सुनी। तुमने काल को जीता, पर काल से हार गए तुमने देवताओं को हराया, पर एक मानव से हार गए। क्यों? क्योंकि तुमने धर्म को हराया।"
"तुम ब्राह्मण थे, वेदज्ञ थे, वीणापाणि थे। पर काम ने तुम्हें राक्षस बना दिया हाय, मेरा सुहाग उजड़ गया मेरा बेटा चला गया मेरा घर उजड़ गया।"
राम वहाँ आए मंदोदरी को रोता देखकर धनुष रख दिया हाथ जोड़ दिए "माते, मुझे क्षमा करो मैं विवश था।"
मंदोदरी ने आँसू पोंछे "पुत्र राम, तुमने पति धर्म निभाया मैंने पत्नी धर्म निभाया दोष किसी का नहीं दोष अहंकार का है।
रावण के बाद विभीषण राजा बने, राम ने कहा, "मंदोदरी को माता मानकर रक्षा करना।"
पर राक्षस कुल की मर्यादा थी भाई की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी से छोटा भाई विवाह करे, ताकि कुल नष्ट न हो।
विभीषण ने मंदोदरी से विवाह किया। मंदोदरी ने विरोध नहीं किया क्यों?
क्योंकि वह जानती थी, लंका को माँ चाहिए, अगर वह सती हो जाती तो लंका अनाथ हो जाती, उसने रावण से वादा किया था, जीऊंगी।
लोग कहते हैं मंदोदरी अपवित्र हो गई पर तुलसीदास जी लिखते हैं, "मंदोदरी सती सिरोमनि" सती शिरोमणि।
क्योंकि सती वह नहीं जो पति के साथ जले सती वह है जो पति के बाद भी धर्म से जिए।
*अनकहा जीवन: जो रामायण में नहीं लिखा।
मंदोदरी फिर लंका में रही विभीषण को धर्म सिखाया प्रजा को माँ की तरह पाला
पर रात को वह छत पर जाती आकाश में रावण का पुष्पक विमान खोजती वीणा के तार छेड़ती रावण वीणा बजाता था,उसी धुन में रोती।
कभी अशोक वाटिका जाती जहाँ सीता जी बैठी थीं, वहाँ फूल चढ़ाती कहती "दीदी, मुझे माफ करना मैं आपको बचा न सकी।"
एक दिन उसने अपनी कथा लिखी ताड़पत्र पर 'मंदोदरी गीता', उसमें लिखा "स्त्री चाहे तो रावण को राम बना दे पर रावण सुनना चाहे तब।
"हर घर में एक रावण है, एक मंदोदरी है अगर मंदोदरी की सुन लो, तो लंका नहीं जलेगी।"
वह ग्रंथ लुप्त हो गया क्योंकि दुनिया को रावण की कथा चाहिए, मंदोदरी की नहीं।
मंदोदरी का जीवन वैराग्य था, सोने की लंका में रहकर भी सादगी में रही राक्षस की पत्नी होकर भी ऋषि की बेटी बनी रही।
उसने पति को समझाया, पुत्र को समझाया, देवर को समझाया कोई नहीं समझा फिर भी वह कड़वी नहीं हुई।
अंत में पति मरा, पुत्र मरा, नगर जला। फिर भी वह जली नहीं, जीती रही क्योंकि किसी को तो बताना था कि रावण सिर्फ खलनायक नहीं था वह एक पति भी था, एक पिता भी था, एक वीणावादक भी था।
मंदोदरी ने रावण को माफ कर दिया पर दुनिया ने नहीं किया।
इसलिए जब भी रामायण पढ़ो, रावण को गाली देने से पहले मंदोदरी को याद करो। जिसने उस रावण से प्रेम किया, क्योंकि प्रेम ही बता सकता है कि हर रावण के अंदर एक ब्राह्मण सोया है। बस उसे जगाने की देर है। 🙏 जय श्रीराम 🙏 🔥