mahabharata

sn vyas
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1 days ago
"महाभारत की कथा लाक्षाग्रह षड्यंत्र" #महाभारत "दैवयोग तथा शकुनि के छल कपट से कौरवों और पाण्डवों में वैर की आग प्रज्वलित हो उठी। दुर्योधन बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था। उसने शकुनि के कहने पर पाण्ड्वो को बचपन मे कई बार मारने का प्रयत्न किया। युवावस्था मे आकर जब गुणों मे उससे अधिक श्रेष्ठ युधिष्ठर को युवराज बना दिया गया तो शकुनि ने लाक्ष के बने हुए घर में पाण्डवों को रखकर आग लगाकर उन्हें जलाने का प्रयत्न किया किन्तु विदुर की सहायता से पाँचों पाण्डव अपनी माता के साथ उस जलते हुए घर से बाहर निकल गये। अपने उत्तम गुणों के कारण युधिष्ठिर हस्तिनापुर के प्रजाजनों में अत्यन्त लोकप्रिय हो गये। उनके गुणों तथा लोकप्रियता को देखते हुये भीष्म पितामह ने धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर के राज्याभिषेक कर देने के लिये कहा। दुर्योधन नहीं चाहता था कि युधिष्ठिर राजा बने अतः उसने अपने पिता धृतराष्ट्र से कहा, “पिताजी! यदि एक बार युधिष्ठिर को राजसिंहासन प्राप्त हो गया तो यह राज्य सदा के लिये पाण्डवों के वंश का हो जायेगा और हम कौरवों को उनका सेवक बन कर रहना पड़ेगा।” इस पर धृतराष्ट्र बोले, “वत्स दुर्योधन! युधिष्ठिर हमारे कुल के सन्तानों में सबसे बड़ा है इसलिये इस राज्य पर उसी का अधिकार है। फिर भीष्म तथा प्रजाजन भी उसी को राजा बनाना चाहते हैं। हम इस विषय में कुछ भी नहीं कर सकते।” धृतराष्ट्र के वचनों को सुन कर दुर्योधन ने कहा, “पिताजी! मैंने इसका प्रबन्ध कर लिया है। बस आप किसी तरह पाण्डवों को वारणावत भेज दें।” दुर्योधन ने वारणावत में पाण्डवों के निवास के लिये पुरोचन नामक शिल्पी से एक भवन का निर्माण करवाया था जो कि लाख, चर्बी, सूखी घास, मूंज जैसे अत्यन्त ज्वलनशील पदार्थों से बना था। दुर्योधन ने पाण्डवों को उस भवन में जला डालने का षड़यन्त्र रचा था। धृतराष्ट्र के कहने पर युधिष्ठिर अपनी माता तथा भाइयों के साथ वारणावत जाने के लिये निकल पड़े। दुर्योधन के षड़यन्त्र के विषय में विदुर को पता चल गया। अतः वे वारणावत जाते हुये पाण्डवों से मार्ग मे मिले तथा उनसे बोले, “देखो, दुर्योधन ने तुम लोगों के रहने के लिये वारणावत नगर में एक ज्वलनशील पदार्थों एक भवन बनवाया है जो आग लगते ही भड़क उठेगा। इसलिये तुम लोग भवन के अन्दर से वन तक पहुँचने के लिये एक सुरंग अवश्य बनवा लेना जिससे कि आग लगने पर तुम लोग अपनी रक्षा कर सको। मैं सुरंग बनाने वाला कारीगर चुपके से तुम लोगों के पास भेज दूँगा। तुम लोग उस लाक्षागृह में अत्यन्त सावधानी के साथ रहना।” वारणावत में युधिष्ठिर ने अपने चाचा विदुर के भेजे गये कारीगर की सहायता से गुप्त सुरंग बनवा ली। पांडव नित्य आखेट के लिये वन जाने के बहाने अपने छिपने के लिये स्थान की खोज करने लगे। कुछ दिन इसी तरह बिताने के बाद एक दिन यधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा, “भीम! अब दुष्ट पुरोचन को इसी लाक्षागृह में जला कर हमें भाग निकलना चाहिये।” भीम ने उसी रात्रि पुरोचन को किसी बहाने बुलवाया और उसे उस भवन के एक कक्ष में बन्दी बना दिया। उसके पश्चात् भवन में आग लगा दिया और अपनी माता कुन्ती एवं भाइयों के साथ सुरंग के रास्ते वन में भाग निकले। लाक्षागृह के भस्म होने का समाचार जब हस्तिनापुर पहुँचा तो पाण्डवों को मरा समझ कर वहाँ की प्रजा अत्यन्त दुःखी हुई। दुर्योधन और धृतराष्ट्र सहित सभी कौरवों ने भी शोक मनाने का दिखावा किया और अन्त में उन्होंने पाण्डवों की अन्त्येष्टि करवा दी।"
sn vyas
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8 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का अनुताप, संन्यास लेने का निश्चय तथा पत्नियों के अनुरोध से वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश...(दिन 351) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ निशम्य वचनं भर्तुर्वनवासे धृतात्मनः । तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम् ।। २६ ।। वनवास के लिये दृढ़ निश्चय करने वाले पतिदेव का यह वचन सुनकर कुन्ती और माद्री ने उनके योग्य बात कही- ।। २६ ।। अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ । आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत् ।। २७ ।। 'भरतश्रेष्ठ ! संन्यासके सिवा और भी तो आश्रम हैं, जिनमें आप हम धर्मपत्नियोंके साथ रहकर भारी तपस्या कर सकते हैं ।। २७ ।। शरीरस्यापि मोक्षाय स्वर्यं प्राप्य महाफलम् । त्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः ।। २८ ।। 'आपकी वह तपस्या स्वर्गदायक महान् फलकी प्राप्ति कराकर इस शरीरसे भी मुक्ति दिलानेमें समर्थ हो सकती है। इसमें संदेह नहीं कि उस तपके प्रभावसे आप ही स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी हो सकते हैं ।। २८ ।। प्रणिधायेन्द्रियग्रामं भर्तृलोकपरायणे । त्यक्तकामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ।। २९ ।। 'हम दोनों कामसुखका परित्याग करके पतिलोककी प्राप्तिका ही परम लक्ष्य लेकर अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई भारी तपस्या करेंगी ।। २९ ।। यदि चावां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशाम्पते । अद्यद्यैवावां प्रहास्यावो जीवितं नात्र संशयः ।। ३० ।। 'महाप्राज्ञ नरेश्वर! यदि आप हम दोनों को त्याग देंगे तो आज ही हम अपने प्राणों का परित्याग कर देंगी, इसमें संशय नहीं है' ।। ३० ।। पाण्डुरुवाच यदि व्यवसितं ह्येतद् युवयोर्धर्मसंहितम् । स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ।। ३१ ।। पाण्डु ने कहा- देवियो! यदि तुम दोनों का यही धर्मयुक्त निश्चय है तो (ठीक है, मैं संन्यास न लेकर वानप्रस्थाश्रम में ही रहूँगा तथा) आज से अपने पिता वेदव्यासजी की अक्षय फल वाली जीवनचर्या का अनुसरण करूँगा ।। ३१ ।। त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत् तपः । वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने ।। ३२ ।। भोगियोंके सुख और आहारका परित्याग करके भारी तपस्यामें लग जाऊँगा। वल्कल पहनकर फल-मूलका भोजन करते हुए महान् वनमें विचरूँगा ।। ३२ ।। अग्नौ जुह्वन्नुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन् । कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः ।। ३३ ।। दोनों समय स्नान-संध्या और अग्निहोत्र करूँगा। चिथड़े, मृगचर्म और जटा धारण करूँगा। बहुत थोड़ा आहार ग्रहण करके शरीर से दुर्बल हो जाऊँगा ।। ३३ ।। शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासानवेक्षकः । तपसा दुश्चरेणेदं शरीरमुपशोषयन् ।। ३४ ।। एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितृत् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ।। ३५ ।। सर्दी, गरमी और आँधीका वेग सहूँगा। भूख-प्यासकी परवा नहीं करूँगा तथा दुष्कर तपस्या करके इस शरीरको सुखा डालूँगा। एकान्तमें रहकर आत्म-चिन्तन करूँगा। कच्चे (कन्द-मूल आदि) और पके (फल आदि) से जीवन-निर्वाह करूँगा। देवताओं और पितरोंको जंगली फल-मूल, जल तथा मन्त्रपाठ द्वारा तृप्त करूँगा ।। ३४-३५ ।। वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्यामवासिनाम् ।। ३६ ।। मैं वानप्रस्थ आश्रममें रहनेवालोंका तथा कुटुम्बी-जनोंका भी दर्शन और अप्रिय नहीं करूंगा; फिर ग्रामवासियोंकी तो बात ही क्या है? ।। ३६ ।। एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । काङ्क्षमाणोऽहमास्थास्ये देहस्यास्या समापनात् ।। ३७ ।। इस प्रकार मैं वानप्रस्थ आश्रमसम्बन्धी शास्त्रोंकी कठोर-से-कठोर विधियोंके पालनकी आकांक्षा करता हुआ तबतक वानप्रस्थ आश्रममें स्थित रहूँगा जबतक कि शरीरका अन्त न हो जाय ।। ३७ ।। वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दनः । ततश्रूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च ।। ३८ ।। वासांसि च महार्हाणि स्त्रीणामाभरणानि च । प्रदाय सर्वं विप्रेभ्यः पाण्डुः पुनरभाषत ।। ३९ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले राजा पाण्डुने अपनी दोनों पत्नियोंसे यों कहकर अपने सिरपेंच, निष्क (वक्षःस्थलके आभूषण), बाजूबंद, कुण्डल और बहुमूल्य वस्त्र तथा माद्री और कुन्तीके भी शरीरके गहने उतारकर सब ब्राह्मणोंको दे दिये। फिर सेवकोंसे इस प्रकार कहा- ।। ३८-३९ ।। गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् । अर्थ कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् ।। ४० ।। प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुनन्दनः । 'तुमलोग हस्तिनापुर में जाकर कह देना कि कुरुनन्दन राजा पाण्डु अर्थ, काम, विषयसुख और स्त्रीविषयक रति आदि सब कुछ छोड़कर अपनी पत्नियोंके साथ वानप्रस्थ हो गये हैं' ।। ४० ।। ततस्तस्यानुयातारस्ते चैव परिचारकाः ।। ४१ ।। श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधाः करुणा गिरः । भीममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुक्रुशुः ।। ४२ ।। भरतसिंह पाण्डुकी यह करुणायुक्त चित्र-विचित्र वाणी सुनकर उनके अनुचर और सेवक सभी हाय-हाय करके भयंकर आर्तनाद करने लगे ।। ४१-४२ ।। उष्णमश्रु विमुञ्चन्तस्तं विहाय महीपतिम् । ययुर्नागपुरं तूर्णं सर्वमादाय तद् धनम् ।। ४३ ।। उस समय नेत्रोंसे गरम-गरम आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे सेवक राजा पाण्डुको छोड़कर और बचा हुआ सारा धन लेकर तुरंत हस्तिनापुरको चले गये ।। ४३ ।। ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः । कथयाञ्चक्रिरे राज्ञस्तद् धनं विविधं ददुः ।। ४४ ।। उन्होंने हस्तिनापुरमें जाकर महात्मा राजा पाण्डुका सारा समाचार राजा धृतराष्ट्रसे ज्यों-का-त्यों कह सुनाया और वह नाना प्रकारका धन धृतराष्ट्रको ही सौंप दिया ।। ४४ ।। श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्वं यथावृत्तं महावने । धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत ।। ४५ ।। फिर उन सेवकोंसे उस महान् वनमें पाण्डुके साथ घटित हुई सारी घटनाओंको यथावत् सुनकर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र सदा पाण्डुकी ही चिन्तामें दुःखी रहने लगे ।। ४५ ।। न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् । भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थं विचिन्तयन् ।। ४६ ।। शय्या, आसन और नाना प्रकारके भोगोंमें कभी उनकी रुचि नहीं होती थी। वे भाईके शोकमें मग्न हो सदा उन्हींकी बात सोचते रहते थे ।। ४६ ।। राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशनः । जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम् ।। ४७ ।। जनमेजय! राजकुमार पाण्डु फल-मूलका आहार करते हुए अपनी दोनों पत्नियोंके साथ वहाँसे नागशत नामक पर्वतपर चले गये ।। ४७ ।। स चैत्ररथमासाद्य कालकूटमतीत्य च । हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम् ।। ४८ ।। तत्पश्चात् चैत्ररथ नामक वन में जाकर कालकूट और हिमालय पर्वत को लाँघते हुए वे गन्धमादन पर चले गये ।। ४८ ।। रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धेश्च परमर्षिभिः । उवास स महाराज समेषु विषमेषु च ।। ४९ ।। इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च । शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत ।। ५० ।। महाराज! उस समय महाभूत, सिद्ध और महर्षिगण उनकी रक्षा करते थे। वे ऊँची-नीची जमीनपर सो लेते थे। इन्द्रद्युम्न सरोवरपर पहुँचकर तथा उसके बाद हंसकूटको लाँघते हुए वे शतशृंग पर्वतपर जा पहुँचे। जनमेजय ! वहाँ वे तपस्वी जीवन बिताते हुए भारी तपस्यामें संलग्न हो गये ।। ४९-५० ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुचरितेऽष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुचरितविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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10 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का अनुताप, संन्यास लेने का निश्चय तथा पत्नियों के अनुरोध से वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश...(दिन 349) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तं व्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम् । सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उन मृगरूपधारी मुनिको मरा हुआ छोड़कर राजा पाण्डु जब आगे बढ़े, तब पत्नीसहित शोक और दुःखसे आतुर हो अपने सगे भाई-बन्धुकी भाँति उनके लिये विलाप करने लगे तथा अपनी भूलपर पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे ।। १ ।। पाण्डुरुवाच सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम् । प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ।। २ ।। पाण्डु बोले-खेदकी बात है कि श्रेष्ठ पुरुषोंके उत्तम कुलमें उत्पन्न मनुष्य भी अपने अन्तःकरणपर वश न होनेके कारण कामके फंदेमें फँसकर विवेक खो बैठते हैं और अनुचित कर्म करके उसके द्वारा भारी दुर्गतिमें पड़ जाते हैं ।। २ ।। शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम । जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ।। ३ ।। हमने सुना है, सदा धर्ममें मन लगाये रहनेवाले महाराज शन्तनुसे जिनका जन्म हुआ था, वे मेरे पिता विचित्रवीर्य भी कामभोगमें आसक्तचित्त होनेके कारण ही छोटी अवस्थामें ही मृत्युको प्राप्त हुए थे ।। ३ ।। तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषिः । कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् भगवान् मामजीजनत् ।। ४ ।। उन्हीं कामासक्त नरेश की पत्नी से वाणी पर संयम रखने वाले ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन ने मुझे उत्पन्न किया ।। ४ ।। तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा । त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ।। ५ ।। मैं शिकारके पीछे दौड़ता रहता हूँ; मेरी इसी अनीतिके कारण जान पड़ता है देवताओंने मुझे त्याग दिया है। इसीलिये तो ऐसे विशुद्ध वंशमें उत्पन्न होनेपर भी आज व्यसनमें फँसकर मेरी यह बुद्धि इतनी नीच हो गयी ।। ५ ।। मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत् । सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ।। ६ ।। अतः अब मैं इस निश्चयपर पहुँच रहा हूँ कि मोक्षके मार्गपर चलनेसे ही अपना कल्याण है। स्त्री-पुत्र आदिका बन्धन ही सबसे महान् दुःख है। आजसे मैं अपने पिता वेदव्यासजीकी उस उत्तम वृत्तिका आश्रय लूँगा, जिससे पुण्यका कभी नाश नहीं होता ।। ६ ।। अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् । तस्मादेकोऽहमेकाकी एकैकस्मिन् वनस्पतौ ।। ७ ।। चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् । पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ।। ८ ।। मैं अपने शरीर और मनको निःसंदेह अत्यन्त कठोर तपस्यामें लगाऊँगा। इसलिये अब अकेला (स्त्रीरहित) और एकाकी (सेवक आदिसे भी अलग) रहकर एक-एक वृक्षके नीचे फलकी भिक्षा माँगूँगा। सिर मुँड़ाकर मौनी संन्यासी हो इन वानप्रस्थियोंके आश्रमोंमें विचरूँगा। उस समय मेरा शरीर धूलसे भरा होगा और निर्जन एकान्त स्थानमें मेरा निवास होगा ।। ७-८ ।। वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः । न शोचन् न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।। ९ ।। अथवा वृक्षोंका तल ही मेरा निवासगृह होगा। मैं प्रिय एवं अप्रिय सब प्रकारकी वस्तुओंको त्याग दूँगा। न मुझे किसीके वियोगका शोक होगा और न किसीकी प्राप्ति या संयोगसे हर्ष ही होगा। निन्दा और स्तुति दोनों मेरे लिये समान होंगी ।। ९ ।। निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः। न चाप्यवहसन् कच्चिन्न कुर्वन् भुकुटीं क्वचित् ।। १० ।। न मुझे आशीर्वादकी इच्छा होगी न नमस्कारकी। मैं सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित और संग्रह-परिग्रहसे दूर रहूँगा। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न क्रोधसे किसीपर भौंहें टेढ़ी करूँगा ।। १० ।। प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः । जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम् ।। ११ ।। मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी तथा सदा सब भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहूँगा। (स्वेदज, उद्भिज्ज, अण्डज, जरायुज) चार प्रकारके जो चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे किसीकी भी मैं हिंसा नहीं करूँगा ।। ११ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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11 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः राजा पाण्डु के द्वारा मृगरूपधारी मुनि का वध तथा उनसे शाप की प्राप्ति...(दिन 348) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ त्वया नृशंसकर्तारः पापाचाराश्च मानवाः । निग्राह्याः पार्थिवश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिवर्जिताः ।। २४ ।। नृपशिरोमणे ! तुम्हारा कर्तव्य तो यह है कि धर्म, अर्थ और कामसे हीन जो पापाचारी मनुष्य कठोरतापूर्ण कर्म करनेवाले हों, उन्हें दण्ड दो ।। २४ ।। किं कृतं ते नरश्रेष्ठ मामिहानागसं घ्नता । मुनिं मूलफलाहारं मृगवेषधरं नृप ।। २५ ।। वसमानमरण्येषु नित्यं शमपरायणम् । त्वयाहं हिंसितो यस्मात् तस्मात् त्वामप्यहं शपे ।। २६ ।। नरश्रेष्ठ ! मैं तो फल-मूलका आहार करनेवाला एक मुनि हूँ और मृग का रूप धारण करके शम-दमके पालन में तत्पर हो सदा जंगलों में ही निवास करता हूँ। मुझ निरपराध को मारकर यहाँ तुमने क्या लाभ उठाया? तुमने मेरी हत्या की है, इसलिये बदले में मैं भी तुम्हें शाप देता हूँ ।। २५-२६ ।। द्वयोर्नृशंसकर्तारमवशं काममोहितम् । जीवितान्तकरो भाव एवमेवागमिष्यति ।। २७ ।। तुमने मैथुन-धर्ममें आसक्त दो स्त्री-पुरुषोंका निष्ठुरता पूर्वक वध किया है। तुम अजितेन्द्रिय एवं कामसे मोहित हो; अतः इसी प्रकार मैथुनमें आसक्त होनेपर जीवनका अन्त करनेवाली मृत्यु निश्चय ही तुमपर आक्रमण करेगी ।। २७ ।। अहं हि किंदमो नाम तपसा भावितो मुनिः । व्यपत्रपन्मनुष्याणां मृग्यां मैथुनमाचरम् ।। २८ ।। मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने । न तु ते ब्रह्महत्येयं भविष्यत्यविजानतः ।। २९ ।। मेरा नाम किंदम है। मैं तपस्यामें संलग्न रहनेवाला मुनि हूँ, अतः मनुष्योंमें- मानव-शरीरसे यह काम करनेमें मुझे लज्जाका अनुभव हो रहा था। इसीलिये मृग बनकर अपनी मृगीके साथ मैथुन कर रहा था। मैं प्रायः इसी रूपमें मृगोंके साथ घने वनमें विचरता रहता हूँ। तुम्हें मुझे मारनेसे ब्रह्महत्या तो नहीं लगेगी; क्योंकि तुम यह बात नहीं जानते थे (कि यह मुनि है) ।। २८-२९ ।। मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् । अस्य तु त्वं फलं मूढ प्राप्स्यसीदृशमेव हि ।। ३० ।। परंतु जब मैं मृगरूप धारण करके कामसे मोहित था, उस अवस्थामें तुमने अत्यन्त क्रूरताके साथ मुझे मारा है; अतः मूढ़! तुम्हें अपने इस कर्मका ऐसा ही फल अवश्य मिलेगा ।। ३० ।। प्रियया सह संवासं प्राप्य कामविमोहितः । त्वमप्यस्यामवस्थायां प्रेतलोकं गमिष्यसि ।। ३१ ।। तुम भी जब कामसे सर्वथा मोहित होकर अपनी प्यारी पत्नीके साथ समागम करने लगोगे, तब इस मेरी अवस्थामें ही यमलोक सिधारोगे ।। ३१ ।। अन्तकाले हि संवासं यया गन्तासि कान्तया । प्रेतराजपुरं प्राप्तं सर्वभूतदुरत्ययम् । भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वानुगमिष्यति ।। ३२ ।। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाराज ! अन्तकाल आने पर तुम जिस प्यारी पत्नी के साथ समागम करोगे, वही समस्त प्राणियों के लिये दुर्गम यमलोक में जाने पर भक्तिभाव से तुम्हारा अनुसरण करेगी ।। ३२ ।। वर्तमानः सुखे दुःखं यथाहं प्रापितस्त्वया। तथा त्वां च सुखं प्राप्तं दुःखमभ्यागमिष्यति ।। ३३ ।। मैं सुखमें मग्न था, तथापि तुमने जिस प्रकार मुझे दुःखमें डाल दिया, उसी प्रकार तुम भी जब प्रेयसी पत्नीके संयोग-सुखका अनुभव करोगे, उसी समय तुम्हारे ऊपर दुःख टूट पड़ेगा ।। ३३ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो जीवितात् स व्यमुच्यत । मृगः पाण्डुश्च दुःखार्तः क्षणेन समपद्यत ।। ३४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-यों कहकर वे मृगरूप-धारी मुनि अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो गये और उनका देहान्त हो गया तथा राजा पाण्डु भी क्षणभरमें दुःखसे आतुर हो उठे ।। ३४ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुमृगशापे सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुको मृगका शाप नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११७ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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1 months ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः माद्री के साथ पाण्डु का विवाह तथा राजा पाण्डु की दिग्विजय...(दिन 338) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः । विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान् मतिम् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर शान्तनुनन्दन परम बुद्धिमान् भीष्मजीने यशस्वी राजा पाण्डुके द्वितीय विवाहके लिये विचार किया ।। १ ।। सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्थ ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः । बलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम ।। २ ।। वे बूढ़े मन्त्रियों, ब्राह्मणों, महर्षियों तथा चतुरंगिणी सेनाके साथ मद्रराजकी राजधानीमें गये ।। २ ।। तमागतमभिश्रुत्य भीष्मं बाह्लीकपुङ्गवः । प्रत्युद्गम्यार्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः ।। ३ ।। बाह्लीकशिरोमणि राजा शल्य भीष्मजीका आगमन सुनकर उनकी अगवानीके लिये नगरसे बाहर आये और यथोचित स्वागत सत्कार करके उन्हें राजधानीके भीतर ले गये ।। ३ ।। दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमर्घ्य तथैव च । मधुपर्क च महेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ।। ४ ।। वहाँ उनके लिये सुन्दर आसन, पाद्य, अर्घ्य तथा मधुपर्क अर्पण करके मद्रराज ने भीष्मजी से उनके आगमन का प्रयोजन पूछा ।। ४ ।। तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः । आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिन्दम ।। ५ ।। तब कुरुकुलका भार वहन करनेवाले भीष्मजीने मद्रराजसे इस प्रकार कहा - 'शत्रुदमन ! तुम मुझे कन्या के लिये आया हुआ समझो ।। ५ ।। श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी । तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम् ।। ६ ।। 'सुना है, तुम्हारी एक यशस्विनी बहिन है, जो बड़े साधु स्वभावकी है; उसका नाम माद्री है। मैं उस यशस्विनी माद्रीका अपने पाण्डुके लिये वरण करता हूँ ।। ६ ।। युक्तरूपो हि सम्बन्धे त्वं नो राजन् वयं तव । एतत् संचिन्त्य मद्रेश गृहाणास्मान् यथाविधि ।। ७ ।। 'राजन्! तुम हमारे यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा योग्य हो और हम भी तुम्हारे योग्य हैं। मद्रेश्वर ! यों विचारकर तुम हमें विधिपूर्वक अपनाओ' ।। ७ ।। तमेवंवादिनं भीष्मं प्रत्यभाषत मद्रपः । न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिर्मम ।। ८ ।। भीष्मजीके यों कहनेपर मद्रराजने उत्तर दिया- 'मेरा विश्वास है कि आपलोगोंसे श्रेष्ठ वर मुझे ढूँढ़नेसे भी नहीं मिलेगा' ।। ८ ।। पूर्वैः प्रवर्तितं किंचित् कुलेऽस्मिन् नृपसत्तमैः । साधु वा यदि वासाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे ।। ९ ।। 'परंतु इस कुलमें पहलेके श्रेष्ठ राजाओंने कुछ शुल्क लेनेका नियम चला दिया है। वह अच्छा हो या बुरा, मैं उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ।। ९ ।। व्यक्तं तद् भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः । न च युक्तं तथा वक्तुं भवान् देहीति सत्तम ।। १० ।। 'यह बात सबपर प्रकट है, निःसंदेह आप भी इसे जानते होंगे। साधुशिरोमणे ! इस दशामें आपके लिये यह कहना उचित नहीं है कि मुझे कन्या दे दो' ।। १० ।। कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत् । तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन् ।। ११ ।। 'वीर! वह हमारा कुलधर्म है और हमारे लिये वही परम प्रमाण है। शत्रुदमन ! इसीलिये मैं आपसे निश्चितरूपसे यह नहीं कह पाता कि कन्या दे दूँगा' ।। ११ ।। तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः । धर्म एष परो राजन् स्वयमुक्तः स्वयम्भुवा ।। १२ ।। यह सुनकर जनेश्वर भीष्मजीने मद्रराजको इस प्रकार उत्तर दिया- 'राजन् ! यह उत्तम धर्म है। स्वयं स्वयम्भू ब्रह्माजीने इसे धर्म कहा है' ।। १२ ।। नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वैधिरयं कृतः । विदितेय च ते शल्य मर्यादा साधुसम्मता ।। १३ ।। 'यदि तुम्हारे पूर्वजोंने इस विधिको स्वीकार कर लिया है तो इसमें कोई दोष नहीं है। शल्य ! साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तुम्हारी यह कुलमर्यादा हम सबको विदित है' ।। १३ ।। इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम् । रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात् सहस्रशः ।। १४ ।। गजानश्वान् रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च। मणिमुक्ताप्रवालं च गाङ्गेयो व्यसृञ्जच्छूभम् ।। १५ ।। यह कहकर महातेजस्वी भीष्मजीने राजा शल्यको सोना और उसके बने हुए आभूषण तथा सहस्रों विचित्र प्रकारके रत्न भेंट किये। बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्र, अलंकार तथा मणि-मोती और मूँगे भी दिये ।। १४-१५ ।। तत् प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः सम्प्रीतमानसः। ददौ तां समलंकृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ।। १६ ।। वह सारा धन लेकर शल्य का चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपनी बहिन को वस्त्राभूषणों से विभूषित करके राजा पाण्डुके लिये कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी को सौंप दिया ।। १६ ।। स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः। आजगाम पुरीं धीमान् प्रविष्टो गजसाह्वयम् ।। १७ ।। परम बुद्धिमान् गंगानन्दन भीष्म माद्री को लेकर हस्तिनापुर में आये ।। १७ ।। तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसम्मते । जग्राह विधिवत् पाणिं माद्रयाः पाण्डुर्नराधिपः ।। १८ ।। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के द्वारा अनुमोदित शुभ दिन और सुन्दर मुहूर्त आने पर राजा पाण्डुने माद्री का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ।। १८ ।। ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा कुरुनन्दनः । स्थापयामास तां भार्या शुभे वेश्मनि भाविनीम् ।। १९ ।। इस प्रकार विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर कुरुनन्दन राजा पाण्डुने अपनी कल्याणमयी भार्याको सुन्दर महलमें ठहराया ।। १९ ।। स ताभ्यां व्यचरत् सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः । कुन्त्या माद्रया च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम् ।। २० ।। राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती और माद्रीके साथ आनन्दपूर्वक यथेष्ट विहार करने लगे ।। २० ।। ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः । जिगीषया महीं पाण्डुर्निरक्रामत् पुरात् प्रभो ।। २१ ।। जनमेजय ! कुरुवंशी राजा पाण्डु तीस रात्रियोंतक विहार करके समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा लेकर राजधानीसे बाहर निकले ।। २१ ।। स भीष्मप्रमुखान् वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च । धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान् कुरुसत्तमान् । आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः ।। २२ ।। मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः । गजवाजिरथीघेन बलेन महतागमत् ।। २३ ।। उन्होंने भीष्म आदि बड़े-बूढ़ों के चरणों में मस्तक झुकाया। कुशनन्दन धृतराष्ट्र तथा अन्य मिलने पर मंगलाचारयुत्ह आशीर्वादों से अभिनन्दित हो हाथी, घोड़ों तथा रथसमुदाय से युक्त विशाल सेना के साथ प्रस्थान किया ।। २२-२३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️