mahabharata

sn vyas
714 views
19 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 448) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच प्रबुद्धास्ते हिडिम्बाया रूपं दृष्ट्वातिमानुषम् । विस्मिताः पुरुषव्याघ्रा बभूवुः पृथया सह ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! जागनेपर हिडिम्बाका अलौकिक रूप देख वे पुरुषसिंह पाण्डव माता कुन्ती के साथ बड़े विस्मयमें पड़े ।। १ ।। ततः कुन्ती समीक्ष्यैनां विस्मिता रूपसम्पदा । उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वपूर्वमिदं शनैः ।। २ ।। कस्य त्वं सुरगर्भाभे का वासि वरवर्णिनी । केन कार्येण सम्प्राप्ता कुतश्चागमनं तव ।। ३ ।। तदनन्तर कुन्ती ने उसकी रूप-सम्पत्ति से चकित हो उसकी ओर देखकर उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें इस प्रकार धीरे-धीरे पूछा- 'देवकन्याओंकी-सी कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो और किसकी कन्या हो? तुम किस कामसे यहाँ आयी हो और कहाँसे तुम्हारा शुभागमन हुआ है? ।। २-३ ।। यदि वास्य वनस्य त्वं देवता यदि वाप्सराः । आचक्ष्व मम तत् सर्व किमर्थं चेह तिष्ठसि ।। ४ ।। 'यदि तुम इस वनकी देवी अथवा अप्सरा हो तो वह सब मुझे ठीक-ठीक बता दो; साथ ही यह भी कहो कि किस कामके लिये यहाँ खड़ी हो?' ।। ४ ।। हिडिम्बोवाच यदेतत् पश्यसि वनं नीलमेघनिभं महत् । निवासो राक्षसस्यैष हिडिम्बस्य ममैव च ।। ५ ।। हिडिम्बा बोली- देवि! यह जो नील मेघके समान विशाल वन आप देख रही हैं, यह राक्षस हिडिम्बका और मेरा निवासस्थान है ।। ५ ।। तस्य मां राक्षसेन्द्रस्य भगिनीं विद्धि भाविनि । भ्रात्रा सम्प्रेषितामार्ये त्वां सपुत्रां जिघांसता ।। ६ ।। महाभागे! आप मुझे उस राक्षसराज हिडिम्बकी बहिन समझें। आर्ये! मेरे भाईने मुझे आपकी और आपके पुत्रोंकी हत्या करनेकी इच्छासे भेजा था ।। ६ ।। क्रूरबुद्धेरहं तस्य वचनादागता त्विह । अद्राक्षं नवहेमाभं तव पुत्रं महाबलम् ।। ७ ।। उसकी बुद्धि बड़ी क्रूरतापूर्ण है। उसके कहनेसे में यहाँ आयी और नूतन सुवर्णकी-सी आभावाले आपके महाबली पुत्रपर मेरी दृष्टि पड़ी ।। ७ ।। ततोऽहं सर्वभूतानां भावे विचरता शुभे । चोदिता तव पुत्रस्य मन्मथेन वशानुगा ।। ८ ।। शुभे ! उन्हें देखते ही समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विचरनेवाले कामदेवसे प्रेरित होकर मैं आपके पुत्रकी वशवर्तिनी हो गयी ।। ८ ।। ततो वृतो मया भर्ता तव पुत्रो महाबलः । अपनेतुं च यतितो न चैव शकितो मया ।। ९ ।। तदनन्तर मैंने आपके महाबली पुत्रको पतिरूपमें वरण कर लिया और इस बातके लिये प्रयत्न किया कि उन्हें (तथा आप सब लोगोंको) लेकर यहाँसे अन्यत्र भाग चलूँ, परंतु आपके पुत्रकी स्वीकृति न मिलनेसे मैं इस कार्यमें सफल न हो सकी ।। ९ ।। चिरायमाणां मां ज्ञात्वा ततः स पुरुषादकः । स्वयमेवागतो हन्तुमिमान् सर्वास्तवात्मजान् ।। १० ।। मेरे लौटनेमें देर होती जान वह मनुष्यभक्षी राक्षस स्वयं ही आपके इन सब पुत्रोंको मार डालनेके लिये आया ।। १० ।। स तेन मम कान्तेन तव पुत्रेण धीमता । बलादितो विनिष्पिष्य व्यपनीतो महात्मना ।। ११ ।। परंतु मेरे प्राणवल्लभ तथा आपके बुद्धिमान् पुत्र महात्मा भीम उसे बलपूर्वक यहाँसे रगड़ते हुए दूर हटा ले गये हैं ।। ११ ।। विकर्षन्तौ महावेगौ गर्जमानौ परस्परम् । पश्यैवं युधि विक्रान्तावेतौ च नरराक्षसौ ।। १२ ।। देखिये, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले वे दोनों मनुष्य और राक्षस जोर-जोरसे गर्ज रहे हैं और बड़े वेगसे गुत्थम-गुत्थ होकर एक-दूसरेको अपनी ओर खींच रहे हैं ।। १२ ।। वैशम्पायन उवाच तस्याः श्रुत्वैव वचनमुत्पपात युधिष्ठिरः । अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवश्च वीर्यवान् ।। १३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! हिडिम्बाकी यह बात सुनते ही युधिष्ठिर उछलकर खड़े हो गये। अर्जुन, नकुल और पराक्रमी सहदेवने भी ऐसा ही किया ।। १३ ।। तौ ते ददृशुरासक्ती विकर्षन्ती परस्परम् । काङ्क्षमाणौ जयं चैव सिंहाविव बलोत्कटौ ।। १४ ।। तदनन्तर उन्होंने देखा कि वे दोनों प्रचण्ड बलशाली सिंहोंकी भाँति आपसमें गुथ गये हैं और अपनी-अपनी विजय चाहते हुए एक-दूसरेको घसीट रहे हैं ।। १४ ।। अथान्योन्यं समाश्लिष्य विकर्षन्तौ पुनः पुनः । दावाग्निधूमसदृशं चक्रतुः पार्थिवं रजः ।। १५ ।। एक-दूसरेको भुजाओंमें भरकर बार-बार खींचते हुए उन दोनों योद्धाओं ने धरतीकी धूल को दावानल के धूएँ के समान बना दिया ।। १५ ।। वसुधारेणुसंवीतौ वसुधाधरसंनिभौ । बभ्राजतुर्यथा शैलौ नीहारेणाभिसंवृतौ ।। १६ ।। दोनोंका शरीर पृथ्वीकी धूलमें सना हुआ था। दोनों ही पर्वतोंके समान विशालकाय थे। उस समय वे दोनों कुहरेसे ढके हुए दो पहाड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे ।। १६ ।। राक्षसेन तदा भीमं क्लिश्यमानं निरीक्ष्य च । उवाचेदं वचः पार्थः प्रहसञ्छनकैरिव ।। १७ ।। भीमसेनको राक्षसद्वारा पीड़ित देख अर्जुन धीरे-धीरे हँसते हुए-से बोले- ।। १७ ।। भीम मा भैर्महाबाहो न त्वां बुध्यामहे वयम् । समेतं भीमरूपेण रक्षसा श्रमकर्शितम् ।। १८ ।। 'महाबाहु भैया भीमसेन! डरना मत; अबतक हमलोग नहीं जानते थे कि तुम भयंकर राक्षससे भिड़कर अत्यन्त परिश्रमके कारण कष्ट पा रहे हो ।। १८ ।। साहाय्येऽस्मि स्थितः पार्थ पातयिष्यामि राक्षसम् । नकुलः सहदेवश्च मातरं गोपयिष्यतः ।। १९ ।। 'कुन्तीनन्दन ! अब मैं तुम्हारी सहायताके लिये उपस्थित हूँ। इस राक्षसको अवश्य मार गिराऊँगा। नकुल और सहदेव माताजीकी रक्षा करेंगे' ।। १९ ।। भीम उवाच उदासीनो निरीक्षस्व न कार्यः सम्भ्रमस्त्वया । न जात्वयं पुनर्जीवेन्मद्वाह्वन्तरमागतः ।। २० ।। भीमसेनने कहा-अर्जुन ! तटस्थ होकर चुपचाप देखते रहो। तुम्हें घबरानेकी आवश्यकता नहीं। मेरी दोनों भुजाओंके बीचमें आकर अब यह राक्षस कदापि जीवित नहीं रह सकता ।। २० ।। अर्जुन उवाच किमनेन चिरं भीम जीवता पापरक्षसा । गन्तव्ये न चिरं स्थातुमिह शक्यमरिंदम ।। २१ ।। अर्जुनने कहा- शत्रुओंका दमन करनेवाले भीम! इस पापी राक्षसको देरतक जीवित रखनेसे क्या लाभ? हमलोगोंको आगे चलना है, अतः यहाँ अधिक समयतक ठहरना सम्भव नहीं है ।। २१ ।। पुरा संरज्यते प्राची पुरा संध्या प्रवर्तते । रौद्रे मुहूर्ते रक्षांसि प्रबलानि भवन्त्युत ।। २२ ।। उधर सामने पूर्वदिशामें अरुणोदयकी लालिमा फैल रही है। प्रातः संध्याका समय होनेवाला है। इस रौद्र मुहूर्तमें राक्षस प्रबल हो जाते हैं ।। २२ ।। त्वरस्व भीम मा क्रीड जहि रक्षो बिभीषणम् । पुरा विकुरुते मायां भुजयोः सारमर्पय ।। २३ ।। अतः भीमसेन ! जल्दी करो। इसके साथ खिलवाड़ न करो। इस भयानक राक्षसको मार डालो। यह अपनी माया फैलाये, इसके पहले ही इसपर अपनी भुजाओंकी शक्तिका प्रयोग करो ।। २३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
Saurabh Bhatia
961 views
22 days ago
AI indicator
🙏 जय श्री कृष्ण! पूरा एपिसोड YouTube पर 👉 youtube.com/@ShreeKrishnaLeela-Pushti 🎮 श्री कृष्ण लीला रनर गेम खेलें 👉 krishna-leela.expo.app #श्रीकृष्ण #कृष्णलीला #भक्ति #बालकृष्ण #radhekrishna #krishna #महाभारत #👏भगवान विष्णु😇 #🚩जय श्री खाटूश्याम 🙏
JEKH11
749 views
27 days ago
महाभारत का एक अनसुना तथ्य पार्ट 1 #महाभारत #श्रीकृष्ण #sharchat
Sangram Jadhav
1.2K views
29 days ago
🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता | अध्याय 1 | श्लोक 11 इस श्लोक में दुर्योधन अपनी सेना को आदेश देता है कि सभी योद्धा अपने-अपने मोर्चों पर दृढ़ता से डटे रहें और चारों ओर से भीष्म पितामह की रक्षा करें। भीष्म पितामह कौरव सेना के प्रधान सेनापति थे, इसलिए उनकी सुरक्षा पूरे युद्ध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। यह श्लोक हमें अनुशासन, एकता, नेतृत्व और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण का संदेश देता है। 🙏 यदि यह वीडियो आपको पसंद आए, तो Like करें, Share करें और चैनल को Subscribe करें। 🕉️ जय श्री कृष्ण #BhagavadGita #Mahabharat #Krishna #SanatanDharma #Dharmakshetra108 #BhagavadGita #Mahabharat #Krishna #LordKrishna #SanatanDharma #Gita #Spirituality #Hinduism #BhagavadGitaQuotes #IndianCulture #DailyWisdom #ReelsIndia #InstaReels #ExplorePage #Dharmakshetra108 #🙏🦚जय श्री कृष्णा🙏🦚 #mahabharat
sn vyas
764 views
1 months ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣2️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः माता कुन्ती के लिये भीमसेन का जल ले आना, माता और भाइयों को भूमि पर सोये देखकर भीम का विषाद एवं दुर्योधन के प्रति क्रोध...(दिन 442) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ज्ञातयो यस्य नैव स्युर्विषमाः कुलपांसनाः। स जीवेत सुखं लोके ग्रामद्रुम इवैकजः ।। ३२ ।। 'जिसके कुटुम्बी पक्षपातयुक्त और कुलको कलंक लगानेवाले नहीं होते, वह पुरुष गाँवके अकेले वृक्षकी भाँति संसारमें सुखपूर्वक जीवन धारण करता है ।। ३२ ।। एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत् पर्णफलान्वितः । चैत्यो भवति निर्जातिरर्चनीयः सुपूजितः ।। ३३ ।। 'गाँवमें यदि एक ही वृक्ष पत्र और फल-फूलोंसे सम्पन्न हो तो वह दूसरे सजातीय वृक्षोंसे रहित होनेपर भी चैत्य (देववृक्ष) माना जाता है तथा उसे पूज्य मानकर उसकी खूब पूजा की जाती है ।। ३३ ।। येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः । ते जीवन्ति सुखं लोके भवन्ति च निरामयाः ।। ३४ ।। 'जिनके बहुत-से शूरवीर भाई-बन्धु धर्म-परायण होते हैं, वे भी संसारमें नीरोग रहते और सुखसे जीते हैं ।। ३४ ।। बलवन्तः समृद्धार्था मित्रबान्धवनन्दनाः । जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव ।। ३५ ।। 'जो बलवान्, धनसम्पन्न तथा मित्रों और भाई-बन्धुओंको आनन्दित करनेवाले हैं, वे जंगलके वृक्षोंकी भाँति एक-दूसरेके सहारे जीवन धारण करते हैं ।। ३५ ।। वयं तु धृतराष्ट्रण सपुत्रेण दुरात्म दुरात्मना । विवासिता न दग्धाश्च न दग्धाश्च कथंचिद् दैवसंश्रयात दैवसंश्रयात् ।। ३६ ।। 'दुरात्मा धृतराष्ट्र और उसके पुत्रोंने तो हमें घरसे निकाल दिया और जलानेकी भी चेष्टा की, परंतु किसी तरह भाग्यके भरोसे हम बच गये हैं ।। ३६ ।। तस्मान्मुक्ता वयं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः । कां दिशं प्रतिपत्स्यमः प्राप्ताः क्लेशमनुत्तमम् ।। ३७ ।। 'आज उस अग्निदाहसे मुक्त हो हम इस वृक्षके नीचे आश्रय ले रहे हैं। हमें किस दिशामें जाना है, इसका भी पता नहीं है। हम भारी-से-भारी कष्ट उठा रहे हैं ।। ३७ ।। सकामो भव दुर्बुद्धे धार्तराष्ट्राल्पदर्शन । नूनं देवाः प्रसन्नास्ते नानुज्ञां मे युधिष्ठिरः ।। ३८ ।। प्रयच्छति वधे तुभ्यं तेन जीवसि दुर्मते । नन्वद्य त्वां सहामात्यं सकर्णानुजसौबलम् ।। ३९ ।। गत्वा क्रोधसमाविष्टः प्रेषयिष्ये यमक्षयम् । किं नु शक्यं मया कर्तुं यत् ते न क्रुध्यते नृपः ।। ४० ।। धर्मात्मा पाण्डवश्रेष्ठः पापाचार युधिष्ठिरः। एवमुक्त्वा महाबाहुः क्रोधसंदीप्तमानसः ।। ४१ ।। करं करेण निष्पिष्य निःश्वसन् दीनमानसः । पुनर्दीनमना भूत्वा शान्तार्चिरिव पावकः ।। ४२ ।। भ्रातृन् महीतले सुप्तानवैक्षत वृकोदरः । विश्वस्तानिव संविष्टान् पृथग्जनसमानिव ।। ४३ ।। 'ओ दुर्बुद्धि अल्पदर्शी धृतराष्ट्रकुमार दुर्योधन! आज तेरी कामना पूरी हुई। निश्चय ही देवता तुझपर प्रसन्न हैं। तभी तो राजा युधिष्ठिर मुझे तेरा वध करनेकी आज्ञा नहीं दे रहे हैं। दुर्मते ! यही कारण है कि तू अबतक जी रहा है। रे पापाचारी! मैं आज ही जाकर कुपित हो मन्त्रियों, कर्ण, छोटे भाई और शकुनिसहित तुझे यमलोक भेज सकता हूँ। किंतु क्या करूँ, पाण्डवश्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिर तुझपर कोप नहीं कर रहे हैं'। यों कहकर महाबाहु भीम मन-ही-मन क्रोधसे जलते और हाथ-से-हाथ मलते हुए दीनभावसे लंबी साँसें खींचने लगे। बुझी हुई लपटोंवाली अग्निकी भाँति दीनहृदय होकर वे पुनः धरतीपर सोये हुए भाइयोंकी ओर देखने लगे। उनके वे सभी भाई साधारण लोगोंकी भाँति भूमिधर ही निश्चिन्ततापूर्वक सो रहे थे ।। ३८-४३ ।। नातिदूरेण नगरं वनादस्माद्धि लक्षये । जागर्तव्ये स्वपन्तीमे हन्त जागर्म्यहं स्वयम् ।। ४४ ।। पास्यन्तीमे जलं पश्चात् प्रतिबुद्धा जितक्लमाः । इति भीमो व्यवस्यैव जजागार स्वयं तदा ।। ४५ ।। उस समय भीम इस प्रकार विचार करने लगे- 'अहो! इस वनसे थोड़ी ही दूरीपर कोई नगर दिखायी देता है। जबकि जागना चाहिये, ऐसे समय भी ये मेरे भाई सो रहे हैं। अच्छा, मैं स्वयं ही जागरण करूँ। थकावट दूर होनेपर जब ये नींदसे उठेंगे, तभी पानी पियेंगे।' ऐसा निश्चय करके भीमसेन स्वयं उस समय जागरण करने लगे ।। ४४-४५ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमजलाहरणे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें भीमसेनके जल ले आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५० ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
794 views
1 months ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः वारणावत में पाण्डवों का स्वागत, पुरोचन का सत्कार पूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृह में निवास की व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेन की बातचीत...(दिन 430) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच ततः सर्वाः प्रकृतयो नगराद् वारणावतात् । सर्वमङ्गलसंयुक्ता यथाशास्त्रमतन्द्रिताः ।। १ ।। श्रुत्वाऽऽगतान् पाण्डुपुत्रान् नानायानैः सहस्रशः । अभिजग्मुर्नरश्रेष्ठान् क्षुत्वैव परया मुदा ।। २ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके शुभागमनका समाचार सुनकर वारणावत नगरसे वहाँके समस्त प्रजाजन अत्यन्त प्रसन्न हो आलस्य छोड़कर शास्त्रविधिके अनुसार सब तरहकी मांगलिक वस्तुओंकी भेंट लेकर हजारोंकी संख्यामें नाना प्रकारकी सवारियोंके द्वारा उनकी अगवानीके लिये आये ।। १-२ ।। ते समासाद्य कौन्तेयान् वारणावतका जनाः । कृत्वा जयाशिषः सर्वे परिवार्यावतस्थिरे ।। ३ ।। कुन्तीकुमारोंके निकट पहुँचकर वारणावतके सब लोग उनकी जय-जयकार करते और आशीर्वाद देते हुए उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। ३ ।। तैर्वृतः पुरुषव्याघ्रो धर्मराजो युधिष्ठिरः । विबभौ देवसंकाशो वज्रपाणिरिवामरैः ।। ४ ।। उनसे घिरे हुए पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर, जो देवताओंके समान तेजस्वी थे, इस प्रकार शोभा पा रहे थे मानो देवमण्डलीके बीच साक्षात् वज्रपाणि इन्द्र हों ।। ४ ।। सत्कृताश्चैव पौरैस्ते पौरान् सत्कृत्य चानघ । अलंकृतं जनाकीर्णं विविशुर्वारणावतम् ।। ५ ।। निष्पाप जनमेजय ! पुरवासियों ने पाण्डवों का बड़ा स्वागत सत्कार किया। फिर पाण्डवों ने भी नागरिकों को आदरपूर्वक अपनाकर जनसमुदायसे भरे हुए सजे-सजाये वारणावत नगरमें प्रवेश किया ।। ५ ।। ते प्रविश्य पुरीं वीरास्तूर्ण जग्मुरथो गृहान् । ब्राह्मणानां महीपाल रतानां स्वेषु कर्मसु ।। ६ ।। राजन् ! नगरमें प्रवेश करके वीर पाण्डव सबसे पहले शीघ्रतापूर्वक स्वधर्मपरायण ब्राह्मणों के घरों में गये ।। ६ ।। नगराधिकृतानां च गृहाणि रथिनां तदा । उपतस्थुर्नरश्रेष्ठा वैश्यशूद्रगृहाण्यपि ।। ७ ।। तत्पश्चात् वे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार नगर के अधिकारी क्षत्रियोंके यहाँ गये। इसी प्रकार वे क्रमशः वैश्यों और शूद्रों के घरोंपर भी उपस्थित हुए ।। ७ ।। अर्चिताश्च नरैः पौरैः पाण्डवा भरतर्षभ । जग्मुरावसथं पश्चात् पुरोचनपुरस्सराः ।। ८ ।। भरतश्रेष्ठ! नगरनिवासी मनुष्योंद्वारा पूजित एवं सम्मानित हो पाण्डवलोग पुरोचन को आगे करके डेरे पर गये ।। ८ ।। तेभ्यो भक्ष्याणि पानानि शयनानि शुभानि च । आसनानि च मुख्यानि प्रददौ स पुरोचनः ।। ९ ।। वहाँ पुरोचनने उनके लिये खाने-पीनेकी उत्तम वस्तुएँ, सुन्दर शय्याएँ और श्रेष्ठ आसन प्रस्तुत किये ।। ९ ।। तत्र ते सत्कृतास्तेन सुमहार्हपरिच्छदाः । उपास्यमानाः पुरुषैरूषुः पुरनिवासिभिः ।। १० ।। उस भवनमें पुरोचनद्वारा उनका बड़ा सत्कार हुआ। वे अत्यन्त बहुमूल्य सामग्रियोंका उपयोग करते थे और बहुत-से नगरनिवासी श्रेष्ठ पुरुष उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। इस प्रकार वे (बड़े आनन्दसे) वहाँ रहने लगे ।। १० ।। दशरात्रोषितानां तु तत्र तेषां पुरोचनः । निवेदयामास गृहं शिवाख्यमशिवं तदा ।। ११ ।। दस दिनों तक वहाँ रह लेनेके पश्चात् पुरोचनने पाण्डवोंसे उस नूतन गृहके सम्बन्धमें चर्चा की, जो कहनेको तो 'शिवभवन' था, परंतु वास्तवमें अशिव (अमंगलकारी) था ।। ११।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️