जय श्री राधा

sn vyas
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2 days ago
#जय जय श्री राधे #जय श्री राधे विनु देखें नाहिं चैन , मेरी तौ जीवन राधे l ऐसी कहा भूल भई है, कहा चूकि भई है ? जो मोते ऐसी रूठी जाय l मेरी तौ जीवन ... हेरी मैं ऋणियां तिहारौ , मैं चाकर तिहारौ , मोहि लेहु अपनाय l मेरी तौ जीवन राधे l विनु देखें नाहिं चैंन, मेरी तौ जीवन राधे l ।। राधे राधे राधे राधे राधे।। ...
sn vyas
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23 days ago
.🙏श्रीकृष्ण प्राणवल्लभा–‘राधा’🙏 श्रीराधाजी भगवान् श्रीकृष्ण की परम प्रिया हैं तथा उनकी अभिन्न मूर्ति भी। राधाजी भगवान् श्रीकृष्ण के प्राणों की अघिष्ठात्री देवी हैं, अत: भगवान् इनके अधीन रहते हैं। श्रीराधाजी का एक नाम कृष्णवल्लभा भी है क्योंकि वे श्रीकृष्ण को आनन्द प्रदान करने वाली हैं। भगवान् श्रीकृष्ण दो रूपों में प्रकट हैं–द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज रूप में वे बैकुण्ठ में देवी लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और तुलसी के साथ वास करते हैं परन्तु द्विभुज रूप में वे गौलोक धाम में राधाजी के साथ वास करते हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम इतना गहरा था कि एक को कष्ट होता तो उसकी पीड़ा दूसरे को अनुभव होती। राधाजी श्रीकृष्ण का अभिन्न भाग हैं। इस तथ्य को इस कथा से समझा जा सकता है कि वृन्दावन में श्रीकृष्ण को जब दिव्य आनन्द की अनुभूति हुई तब वह दिव्यानन्द ही साकार होकर बालिका के रूप में प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण की यह प्राण शक्ति ही राधाजी हैं। राधाजी का नाम कृष्ण से भी पहले लिया जाता है। राधा नाम के जाप से श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर दया करते हैं। राधाजी का श्रीकृष्ण के लिए प्रेम नि:स्वार्थ था तथा उसके लिए वे किसी भी तरह का त्याग करने को तैयार थीं। राधाजी ने यह कहकर अपनी चरण धूलि दी कि भले ही मुझे 100 नरकों का पाप भोगना पडे तो भी मैं अपने प्रिय के स्वास्थ्य लाभ के लिए चरण धूलि अवश्य दूँगी। श्रीकृष्ण का राधा से इतना प्रेम था कि कमल के फूल में राधाजी की छवि की कल्पना मात्र से वो बेहोश हो गये तभी तो विद्ववत जनों ने कहा राधा तू बडभागिनी, कौन पुण्य तुम कीन। तीन लोक तारन तरन सो तोरे आधीन॥ जय जय श्री राधे॥ #जय श्री राधे
sn vyas
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1 months ago
#जय श्री राधे श्रीकृष्ण द्वारा यज्ञ पत्नियों पर कृपा ... एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने सखा ग्वालों और बलराम जी के साथ वृंदावन से दूर वन में गौएँ चराने गए। चलते-चलते दोपहर हो गई और सभी ग्वाल-बाल भूख से व्याकुल होने लगे। उन्होंने श्रीकृष्ण से भोजन की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि पास ही के क्षेत्र में कुछ ब्राह्मण 'अंगिरस' नामक महान यज्ञ कर रहे हैं। उन्होंने ग्वालों से कहा "तुम उन ब्राह्मणों के पास जाओ और मेरा व बलराम का नाम लेकर भोजन मांगो।" ग्वाल-बाल यज्ञशाला में पहुँचे और अत्यंत विनम्रता से ब्राह्मणों को प्रणाम कर भोजन की याचना की। लेकिन वे ब्राह्मण कर्मकांड के अहंकार में डूबे हुए थे। उन्होंने ग्वालों की बातों पर ध्यान ही नहीं दिया। वे सोचने लगे कि अभी यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ है, तो बीच में भोजन कैसे दिया जा सकता है? वे साक्षात परमेश्वर (श्रीकृष्ण) को भूलकर जड़ क्रियाओं में व्यस्त रहे और ग्वालों को खाली हाथ लौटा दिया। जब ग्वाल-बालों ने लौटकर यह बात कृष्ण को बताई, तो भगवान मुस्कुराए और बोले— "अब तुम उनकी पत्नियों के पास जाओ।" ग्वाल-बाल जब ब्राह्मणों की पत्नियों के पास पहुँचे और बताया कि कृष्ण और बलराम पास के वन में भूखे हैं, तो उनके हर्ष का ठिकाना न रहा। वे स्त्रियाँ चिरकाल से श्रीकृष्ण के गुणों को सुनती आई थीं और उनके दर्शन के लिए लालायित थीं। जैसे ही उन्होंने सुना, वे बड़े-बड़े बर्तनों में अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन (भोजन) भरकर निकल पड़ीं। उनके पति, पुत्र और संबंधियों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं रुकीं। उनके लिए लोक-लाज और सामाजिक मर्यादा से ऊपर भगवान की प्रीति थी। जब यज्ञ पत्नियाँ वन में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण एक हाथ सखा के कंधे पर रखे और दूसरे हाथ में कमल का फूल लिए खड़े हैं। उनके गले में वनमाला और कानों में मकर-कुंडल थे। भगवान ने उनकी भक्ति देखकर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की और कहा .. "हे महाभागों! आप सबका स्वागत है। आप लोग केवल मेरे प्रेम के वश होकर यहाँ आई हैं। बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो बिना किसी फल की इच्छा के मुझसे प्रेम करता है।" श्रीकृष्ण ने उन पत्नियों द्वारा लाया गया भोजन बड़े चाव से ग्रहण किया और उन्हें आशीर्वाद देकर वापस घर जाने को कहा। जब यज्ञ पत्नियाँ वापस लौटीं, तो उनके पति (ब्राह्मणों) को अपनी भूल का आभास हुआ। उन्होंने देखा कि उनकी पत्नियों ने बिना किसी वेद-पाठ या दीक्षा के साक्षात ईश्वर को प्राप्त कर लिया, जबकि वे दिन-भर मंत्र पढ़ते रहकर भी खाली रहे। ब्राह्मणों ने स्वीकार किया: "धिक्कार है हमारे कुल को, हमारे ज्ञान को और हमारे इस यज्ञ को, यदि हमारे हृदय में भगवान के लिए प्रेम ही नहीं है।" यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान 'भाव' के भूखे हैं। केवल मंत्रों के उच्चारण या कठिन तपस्या से ईश्वर नहीं मिलते। जो सरल हृदय से सब कुछ ईश्वर को अर्पित कर देता है, भगवान स्वयं उसकी प्रतीक्षा करते हैं। इस कथा में स्त्रियों की सहज भक्ति को शास्त्रज्ञों के ज्ञान से ऊपर स्थान दिया गया है। जय श्रीकृष्ण.... ...