ramcharit manas

sn vyas
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1 days ago
रामायण तथा रामचरितमानस में उन्नति की सातों सोपान पर समीक्षा : -------------------------------------------------------------- महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित जीवनधर्मी महाकाव्य रामायण के मूल सातों काण्ड, मानव जीवन की उन्नति के सातों सोपान माना जाता है और यह मान्यता, वार्त्ता के रूप में रामायण की अन्तःस्वर भी है।। 1. बालकाण्ड : ------------------ बालक प्रभु को प्रिय है। क्योंकि उस में छल, कपट नहीं होता है। विद्या, धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो बालक बड़ा होकर, अपना हृदय को निर्दोष- निर्विकारी बनाये रखता है, उसी को भगवान प्राप्त होते है। इसलिए कोई भी बालक जैसा निर्दोष- निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकता है। जीवन में सरलता का आगमन, संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है। एक बालक की भांति अपने मान- अपमान को भूलने से जीवन में सरलता आती है। बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बन जाता है। जंहा युद्ध, वैर, ईर्ष्या नहीं होती, वही स्थान ही अयोध्या है।। 2. अयोध्याकाण्ड : ----------------------- यह काण्ड मनुष्य को निर्विकार बनाता है। जीव जब भक्ति अर्थात प्रेमरुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है, तभी निर्विकारी बनता है। अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है। राम का भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम आदि सब इसी काण्ड में है। राम की निर्विकारिता इसी में दिखाई देती है। अयोध्याकाण्ड का पाठ करने से परिवार में प्रेम बढता है और उसके घर में लडाई झगडे नहीं होते। उसका घर अयोध्या बनता है। कलह का मूल कारण धन एवं प्रतिष्ठा है। अयोध्या- काण्ड का फल निर्वैरता है। सब से पहले अपने घर की ही सभी प्राणियों में भगवद् भाव रखना चाहिए।। 3. अरण्यकाण्ड : --------------------- यह कांड निर्वासन को सूचित करता है। इसका मनन करने से वासना नष्ट होगी। बिना अरण्यवास (जंगल) के जीवन में दिव्यता नहीं आती। रामचन्द्र राजा होकर भी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास किया। वनवास मनुष्य हृदय को कोमल बनाता है। तप द्वारा ही कामरुपी रावण का बध होगा । इस में सूपर्णखा (मोह ) एवं शबरी (भक्ति) दोनो ही है। भगवान राम सन्देश देते हैं कि मोह को त्यागकर भक्ति को अपनाओ।। 4. किष्किन्धाकाण्ड : -------------------------- जब मनुष्य निर्विकार एवं निर्वैर होगा, तभी उनकी ईश्वर से मैत्री होगी। इसमे सुग्रीव और राम अर्थात् जीव और ईश्वर की मैत्री का वर्णन है। जब जीव सुग्रीव की भांति हनुमान अर्थात् ब्रह्मचर्य का आश्रय लेगा, तभी उसे राम मिलेंगे। जिसका कण्ठ सुन्दर है, वही सुग्रीव है।कण्ठ की शोभा आभूषण से नहीं, बल्कि राम- नाम का जप करने से है। जिसका कण्ठ सुन्दर है, उसी की मित्रता राम से होती है किन्तु उसे हनुमान यानी ब्रह्मचर्य की सहायता लेनी पडेगी।। 5. सुन्दरकाण्ड : -------------------- जब जीव की मैत्री राम से हो जाती है, तब वह सुन्दर हो जाता है। इस काण्ड में हनुमान को सीता के दर्शन होते है। सीता जी पराभक्ति है। जिसका जीवन सुन्दर होता है, उसे ही पराभक्ति के दर्शन होते है। संसार समुद्र पार करने वाले को पराभक्ति सीता के दर्शन होते है। ब्रह्मचर्य एवं राम- नाम का आश्रय लेने वाला संसार सागर को पार करता है। संसार सागर को पार करते समय मार्ग में सुरसा बाधा डालने आ जाती है। ऐसे अच्छे रस ही सुरसा हो जाती है। नये- नये रस की वासना रखने वाली जीभ ही सुरसा है। संसार सागर पार करने की कामना रखने वाले को जीभ को वश में रखना होगा। जंहा पराभक्ति सीता है, वंहा शोक नही रहता। जंहा सीता है, वंहा शोक रहित अशोकवन है।। 6. लंकाकाण्ड : ------------------- जीवन भक्तिपूर्ण होने पर राक्षसों का संहार होता है। काम, क्रोधादि ही राक्षस है। जो इन्हें मार सकता है ,वही काल को भी मार सकता है। जिसे काम मारता है, उसे काल भी मारता है। लंका शब्द के अक्षरों को इधर- उधर करने पर होगा कालं। काल सभी को मारता है किन्तु हनुमान जी काल को भी मार देते हैं। क्योंकि वे ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले और इस कारण से पराभक्ति का दर्शन करते है।। 7. उत्तरकाण्ड : ------------------- इस काण्ड में काकभुसुण्डि एवं गरुड- संवाद को बार- बार पढना चाहिए। इस में सब कुछ है। जब तक राक्षस रूपी काल का विनाश नहीं होगा, तब तक उत्तरकाण्ड में प्रवेश नही मिलेगा। इस में भक्ति की कथा है। भक्त वही है, जो भगवान से एक क्षण भी अलग नही हो सकता। पूर्वार्ध में जो काम रुपी रावण को मारता है, उसी का उत्तरकाण्ड सुन्दर बनता है। वृद्धावस्था में वही राज्य करता है। जब जीवन के पूर्वार्ध अर्थात युवावस्था में काम को मारने का प्रयत्न होगा, तभी उत्तरार्ध तथा उत्तरकाण्ड सुधर पायेगा। अतः जीवन को सुधारने का प्रयत्न युवावस्था से ही करना चाहिए ।। #रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 #श्री रामचरितमानस पाठ 🕉️ #रामचरितमानस चौपाई
sn vyas
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1 days ago
रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास जी ने भगवान् राम की स्तुति करते हुए कहा है --- "चिदानन्दमय देह तुम्हारी । विगत विकार जान अधिकारी ।।" आपका यह शरीर पंच-महाभूतों का विकार नहीं है , किन्तु सच्चिदानन्द-स्वरूप है । अर्थात् आपका स्थूल शरीर सत् , सूक्ष्म शरीर चित् तथा कारण शरीर आनन्द तत्त्व से बना है । जिसका आपकी अन्तरङ्ग लीला में प्रवेश हो चुका है , वह अधिकारी पुरुष ही आपके सच्चिदानन्द-स्वरूप विकार रहित शरीर के सम्बन्ध में जान सकता है । भागवत के दशम स्कन्ध के चौदहवें अध्याय में ब्रह्मा जी भी भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति कहते हैं -- "आपका यह शरीर पंच-भौतिक नहीं है , किन्तु दिव्यातिदिव्य है , चिन्मय-अविनाशी है।" वैशेषिक-दर्शन में कणाद जी ने छः प्रकार के स्थूल शरीरों का वर्णन किया है --- १ . सर्वसाधारण प्राणियों के पार्थिव शरीर। २. वरुण लोक के जल तत्त्व प्रधान जलीय शरीर । ३. इन्द्र तथा ब्रह्मादि लोकों के अग्नि तत्त्व प्रधान दिव्य शरीर । ४. वायु तत्त्व की प्रधानता वाले भूत - प्रेत - बेताल - कूष्माण्ड - ब्रह्मराक्षस आदिकों के स्थूल नेत्रों से न दिखाई देने वाले वायु तत्त्व प्रधान वायवीय शरीर । ५. युक्त-योगियों की सत्य-संकल्पता से युक्त यौगिक शरीर अर्थात् योगी जब अपने प्रतिबिम्ब में धारणा-ध्यान-समाधि का संयम करते हैं , तब अनेक रूप धारण कर लेते हैं । जैसे भगवान् कृष्ण ने रास-क्रीड़ा में अनेक रूप धारण किये । भगवान् राम ने दण्डक वन में खर-दूषण-त्रिशिरा से युद्ध करते समय सबको राम रूप दे दिया । ६. दिव्यातिदिव्य शरीर -- महाविष्णु , परम शिव, परम स्वरूपा दुर्गा , महागणपति एवं राम-कृषणादि अवतारों के शरीर दिव्यातिदिव्य कहलाते हैं । देवताओं के शरीर दिव्य है , उनके शरीरों से पसीना नहीं निकलता , बुढापा नहीं आता । परन्तु देवता आंख से देखते व कान से सुनते हैं अर्थात् उनकी प्रत्येक इन्द्रिय एक प्रकार का कर्म तथा ज्ञानेन्द्रिय द्वारा एक प्रकार का ज्ञान होता है । किन्तु दिव्यातिदिव्य राम-कृषणादि के शरीरों में यह विशेषता है कि उनकी प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय में पांचों प्रकार की ज्ञान शक्तियां रहती हैं , यह विशेषता देवताओं में नहीं होता । अतः मनुष्य तो क्या ब्रह्मवेत्ता महर्षि तथा देवता भी उनका नित्य वैकुण्ठ तथा गोलोक धाम और भगवान् का श्रीविग्रह अविनाशी-अमृत रूप कैसे है , नहीं समझ सकते । किन्तु भगवान् की विशेष कृपा तथा सद्गुरुओं की महती कृपा से प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं । यतिधर्म में कहा है -- दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरो: करुणां विना ।। #रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺
sn vyas
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1 days ago
#रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 तुलसीकृत रामायण - अश्रुओं से लिखी गई करुणा🙏 गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण नहीं लिखी... उन्होंने अपना हृदय खोलकर रख दिया। तुलसीदास जी काशी की गलियों में भटक रहे थे। दर-दर की ठोकरें, समाज का तिरस्कार, और अंदर एक ही प्यास - "प्रभु के दर्शन"। जब संसार ने दरवाजे बंद कर दिए, तब उन्होंने राम का दरवाजा खटखटाया। हर चौपाई के पीछे एक आँसू है। हर दोहे में एक सिसकी है। "*सिया राम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी*" ये शब्द नहीं हैं मित्रों... ये एक टूटे हुए इंसान की प्रार्थना है। तुलसीदास जी ने राम को राजा नहीं बनाया। उन्होंने राम को अपना भाई, अपना बेटा, अपना सखा बना लिया। जब राम वनवास जाते हैं तो तुलसी रोते हैं। जब सीता का हरण होता है तो तुलसी की छाती फटती है। जब लक्ष्मण मूर्छित होते हैं तो लगता है तुलसी का अपना भाई गिर पड़ा। इसीलिए पढ़ते समय लगता है कोई अपना ही दुख सुना रहा है। *वनवास वाला दृश्य:* "*पिता बचनु भयउ बन गमनू, तजि राजु रामु गए कननू*" एक पंक्ति में पिता का वचन, राज का त्याग, और वन की राह... आँखें भर आती हैं। चौदह साल तक खड़ाऊं रखकर राज्य चलाने वाला भाई... जब राम से मिलता है तो दोनों एक दूसरे के गले लगकर इतना रोते हैं कि अयोध्या की मिट्टी भी भीग जाती है। तुलसी यहाँ सबसे ज्यादा रोए होंगे। एक पत्नी का अपमान... और राम का मौन। उस मौन में हजारों स्त्रियों का दर्द है। क्योंकि ये कहानी नहीं है। ये आईना है। इसमें रावण हमारा अहंकार है। इसमें मंथरा हमारी कुटिलता है। इसमें कैकेयी हमारा स्वार्थ है। और राम... राम हमारी वो उम्मीद हैं जो सबसे बुरे समय में भी हाथ नहीं छोड़ते। तुलसीदास जी ने हमें दोषी नहीं ठहराया। बस राम का चरित्र सामने रख दिया और कहा - "*देख लो, ऐसे जिया जाता है*"। तुलसीकृत रामायण को पढ़कर कोई सूखी आँखों से नहीं उठ सकता। क्योंकि ये ग्रंथ नहीं है... ये एक माँ की लोरी है, एक पिता का उपदेश है, एक मित्र का कंधा है। जब दुनिया बहुत कठोर लगने लगे, जब मन का श्मशान जलने लगे... तब तुलसी की एक चौपाई सब घाव भर देती है: *"राम नाम सुमिरत सब काजा। होत न मन में कछु पाजा॥"* *जय सिया राम* 🌸
sn vyas
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9 days ago
#रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 प्रस्तुत पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस से हैं। इनमें जीवन का एक गहन नैतिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा हुआ है। "जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥ धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥" 🌺 भावार्थ: जिस व्यक्ति या वस्तु से किसी नीच अथवा अधम को प्रतिष्ठा और बड़ाई प्राप्त होती है, वह उसी को सबसे पहले नष्ट कर देता है। जैसे — धुआँ अग्नि से उत्पन्न होता है, लेकिन वही धुआँ बादलों का रूप धारण कर वर्षा बनकर अंततः अग्नि को बुझा देता है। 🔥 गूढ़ संदेश: तुलसीदास जी समझाते हैं कि अयोग्य व्यक्ति को दिया गया अनुचित महत्व या शक्ति कभी-कभी उसी शक्ति के स्रोत के लिए विनाशकारी बन जाती है। जिस प्रकार: अग्नि से उत्पन्न धुआँ ही आगे चलकर बादल बनता है और जल बरसाकर अग्नि को शांत कर देता है। उसी प्रकार कोई व्यक्ति जब अपनी योग्यता से अधिक सम्मान, पद या अधिकार पा जाता है, तो अहंकारवश वही व्यक्ति अपने उपकारकर्ता या व्यवस्था को हानि पहुँचा सकता है। 🌿 जीवन में शिक्षा: सम्मान हमेशा पात्रता देखकर देना चाहिए। शक्ति और अधिकार के साथ विनम्रता और विवेक आवश्यक हैं। अहंकार मनुष्य को अपने ही मूल से दूर कर देता है। सच्ची महानता पद या प्रशंसा में नहीं, बल्कि चरित्र और सदाचार में होती है। 🕉️ आध्यात्मिक दृष्टि: भगवान श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि मर्यादा, विनम्रता और धर्म ही स्थायी प्रतिष्ठा के आधार हैं। जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर सत्य और सेवा के मार्ग पर चलता है, वही वास्तव में "बड़ाई" का अधिकारी होता है। "बड़प्पन ऊँचे आसन से नहीं, ऊँचे आचरण से मिलता है।" 🙏 प्रभु श्रीराम आपके जीवन में मर्यादा, शांति और मंगल का प्रकाश फैलाएँ। 🌺 आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो। 🌺
sn vyas
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1 months ago
#रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 #श्री रामचरितमानस पाठ 🕉️ #रामचरितमानस चौपाई “सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुण गान । सादर सुनहि ते तरहि भव सिंधु बिना जलजान ।।“ मानस-महिमा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा ईश्वरीय प्रेरणा से रचित “श्रीरामचरितमानस” एक दिव्य महाकाव्य है | इसके श्रवणमात्र से जीव का परम कल्याण निश्चित है | इस महाकाव्य में कुछ दस बीस चौपाइयों को छोड़कर सम्पूर्ण ग्रन्थ में प्रत्येक पंक्ति में अखिल ब्रह्माण्डनायक भगवान् श्रीराम के नाम के बीजाक्षर “र” और “म” का समावेश है | इसी लिए ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही लिखा है कि इसमें श्रीराम जी का उदार नाम “राम” है – “एहि महँ रघुपति नाम उदारा | अति पावन पुरान उदारा ||”....... (१.९.१) इस प्रकार से श्रीराम नाममय होने के कारण “श्रीरामचरितमानस” श्रीराम जी का ठीक उसी तरह ग्रन्थावतार है, जैसे श्रीमद्भागवत भगवान् श्रीकृष्ण का ग्रन्थावतार माना जाता है | मन लगाकर श्रीरामचरितमानस के श्रवणमात्र से संसृति-क्लेश दूर होता है, ऐसा सन्तों का दृढ विश्वास है | सुनने का विशेष महत्त्व है | यह प्राकृतिक नियम है कि जो कुछ हम कानों से ग्रहण करते हैं, वह मुख से निकलता है | कानों से भगवान् का गुणगान सुनने से जब मुख से वहीं निकालेंगे तो जीवन धन्य हो जाएगा | “श्रीरामचरितमानस” के चार वक्ता-श्रोता हैं—गोस्वामी तुलसीदास जी अपने मन को सुनाते हैं, याज्ञवल्क्य मुनि भारद्वाज को, शिवजी पार्वती जी को और काकभुशुंडि जी पक्षिराज गरुड़ जी को यह कथा सुनाते हुए कथा-श्रवण पर विशेष जोर देते हैं | “श्रीरामचरितमानस” में यह वर्णन क्रमश: इस प्रकार से है :- १. गोस्वामी जी अपने मन से कहते हैं :- “सुख भवन संसय समन दवन विषाद रघुपति गुन गना || तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि सन्तत सठ मना ||”.....(५.६० छंद) २. याज्ञवल्क्यजी, भारद्वाज मुनि से कहते हैं :- “ तात सुनहु सादर मनु लाई | कहउँ राम कै कथा सुहाई ||”.....(१.४७.५) ३. भगवान् शंकर,माता पार्वती जी से कहते हैं:- “ सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल | कहा भुसुंडी बखानि सुना बिहग नायक गरुड़ ||”......(१.१२०-ख) ४. काकभुशुंडि जी पक्षिराज गरुड़ जी से कहते हैं :- “ सुनु खगपति यह कथा पावनी | त्रिविध ताप भव भय दाविनी ||”.....(७.१५.१)
sn vyas
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1 months ago
#रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 #रामायण #रामायण ज्ञान गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं‒सुग्रीव और विभीषण दोनों भगवान्‌ के मित्र रहे । श्रीरामजी ने इन दोनों को अपनी शरण में रखा, यह सब कोई जानते हैं । भगवान्‌ ने इनको ‘सखा’ कहा है । खल मंडली बसहु दिनु राती । सखा धरम निबहइ केहि भाँती ॥ विभीषण से भगवान गले मिलकर पूछते हैं कि ‘दिन-रात दुष्टों की मण्डली में बसते हो, ऐसी दशा में, हे सखे ! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है ?’ ऐसे सुग्रीव को भी अपना सखा मानते हैं । जब विभीषण मिलने आया तो ‘कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा’ भगवान्‌ ने सुग्रीव से कहा‒बोलो, सखा ! तुम्हारी क्या सम्मति है ? ऐसे दोनों ही सखा थे । इनको भगवान्‌ ने अपने शरण में रखा । ये दोनों ही भयभीत थे ! सुग्रीव बाली से डरता था और विभीषण को भी रावण ने जोर से धमकाया, लात भी मारी और कह दिया कि ‘मेरे नगर में रहता है और प्रीति तपस्वी (राम) से करता है । निकल जा यहाँ से ।’ ऐसे रावण ने उसे निकाल दिया तो वह भगवान्‌ के शरण आ गया । इन दोनों को भगवान्‌ ने अपने मित्र बना लिया । एक बात याद आ गयी‒रामायण में भगवान्‌ के तीन सखा हैं । (१) निषादराज गुह, (२) सुग्रीव और (३) विभीषण । इन तीनों को सखा बनाने का तात्पर्य क्या है ? भगवान् कहते हैं‒‘मैं सबको सखा बनानेके लिये तैयार हूँ ।’ तीन तरह के भक्त होते हैं । (१) साधक भक्त होता है, (२) सिद्ध भक्त होता है और (३) विषयी भक्त होता है । सांसारिक विषयी मनुष्य को भी भगवान् सखा बना लेते हैं, साधक भक्त को भी सखा बना लेते हैं और सिद्ध भक्त को भी सखा बना लेते हैं । इनमें निषादराज गुह सिद्ध भक्त था, जैसे ज्ञानी भक्त होते हैं, परमात्मा के प्यारे होते हैं, पूर्णता को प्राप्त‒ऐसे सिद्ध भक्त हैं निषादराज गुह । विभीषण साधक भक्त है, भगवत् प्राप्ति की साधना करने वाला है और सुग्रीव विषयी भक्त है । भगवान्‌ की भक्ति करता है, पर करता है विपत्ति आने पर, दुःख होने पर और जब दुःख मिट जाता है तो फिर जै रामजी की ! फिर कोई भक्ति नहीं । सुग्रीव के विषय में भगवान् राम ने लक्ष्मणजी से कहा‒ सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी । पावा राज कोस पुर नारी ॥ सुग्रीव भी मेरी सुध भूल गया; क्योंकि उसको राज्य मिल गया, मकान मिल गया, नगर मिल गया, खजाना मिल गया, स्त्री मिल गयी । अब भजन कौन करे ? जब विपत्ति थी, डर था, तब भजन करता था । अब भय मिट गया, मौज से राज्य करता है, इसलिये सुग्रीव मेरे को भी भूल गया । ---:: ॐ :: ---