अन्तर्राष्ट्रीय ऐल्बिनिज़म जागरूकता दिवस

सुशील मेहता
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2 days ago
विश्व विधवा दिवस दरअसल, सभी उम्र, क्षेत्र और संस्कृति की विधावाओं की स्थिति को विशेष पहचान दिलाने के लिए 23 जून 2011 को पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस मनाने की घोषणा की, और तब से हर साल इस दिन को 23 जून को मनाया जाता है। यहां आपको बताते चले कि ब्रिटेन की लूंबा फाउंडेशन पूरे विश्व की विधवा महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार पर विगत सात सालों से संयुक्त राष्ट्र संघ में अभियान चला रही है। अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के दिन को मनाने के पीछे का उद्देश्य ये है कि पूरी दुनिया में विधवा महिलाओं की स्थिति में सुधार हो सके, ताकि वे भी बाकी लोगों की तरह समान्य जीवन जी सके और बराबरी का अधिकार प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही हम कितनी भी तरक्की कर चुके हों, लेकिन विधवा को आज भी बराबरी की नजर से नहीं देखा जाता है। दुनिया की लाखों विधवाओं को गरीबी, हिंसा, बहिष्कार, बेघर, बीमार, स्वास्थ्य जैसी समस्याएं और कानून व समाज में भेदभाव सहना करना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक कहा जाता है कि, लगभग 115 मिलियन विधवाएं गरीबी में रहने को मजबूर हैं, जबकि 81 मिलियन महिलाएं ऐसी हैं जो शारिरिक शोषण का सामना करती हैं।विश्व विधवा दिवस दरअसल, सभी उम्र, क्षेत्र और संस्कृति की विधावाओं की स्थिति को विशेष पहचान दिलाने के लिए 23 जून 2011 को पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस मनाने की घोषणा की, और तब से हर साल इस दिन को 23 जून को मनाया जाता है। यहां आपको बताते चले कि ब्रिटेन की लूंबा फाउंडेशन पूरे विश्व की विधवा महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार पर विगत सात सालों से संयुक्त राष्ट्र संघ में अभियान चला रही है। अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के दिन को मनाने के पीछे का उद्देश्य ये है कि पूरी दुनिया में विधवा महिलाओं की स्थिति में सुधार हो सके, ताकि वे भी बाकी लोगों की तरह समान्य जीवन जी सके और बराबरी का अधिकार प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही हम कितनी भी तरक्की कर चुके हों, लेकिन विधवा को आज भी बराबरी की नजर से नहीं देखा जाता है। दुनिया की लाखों विधवाओं को गरीबी, हिंसा, बहिष्कार, बेघर, बीमार, स्वास्थ्य जैसी समस्याएं और कानून व समाज में भेदभाव सहना करना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक कहा जाता है कि, लगभग 115 मिलियन विधवाएं गरीबी में रहने को मजबूर हैं, जबकि 81 मिलियन महिलाएं ऐसी हैं जो शारिरिक शोषण का सामना करती हैं। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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3 days ago
, ऊंट राजस्थान का राज्य पशु है. इसे रेगिस्तान का जहाज भी कहा जाता है. हर साल ऊंटों के संरक्षण को लेकर 22 जून को अंतरराष्ट्रीय ऊंट दिवस मनाया जाता है. इस बार साल 2024 को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय कैमलिड्स वर्ष घोषित किया है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से वर्ष 2024 को अंतररार्ष्ट्रीय कैमलिड्स वर्ष घोषित किया गया है. दरअसल, इसका उद्देश्य यही है कि दुनिया भर में ऊंट का संरक्षण हो. दुनिया के 90 से अधिक देशों में पाए जाने वाला ऊंट से सिर्फ आजीवीकोपार्जन का ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में बहुत काम आता है. बात करें दुनिया भर में ऊंट की जनसंख्या की तो भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है. भारत में सबसे ज्यादा ऊंट राजस्थान में और खासतौर से पश्चिमी राजस्थान में पाए जाते हैं. सड़कों के बिछते जाल और कम होते रेगिस्तान के चलते ऊंट की जनसंख्या में काफी गिरावट आई है. ऊंट के संरक्षण को लेकर 2014 में राजस्थान सरकार ने इसे राज्य पशु घोषित किया था. पिछले कुछ सालों में देश-विदेश में ऊंट की जनसंख्या में काफी गिरावट देखने को मिली है। : पश्चिमी राजस्थान की अगर बात करें तो यहां की लोगों की दैनिक जीवनचार्य में ऊंट पूरी तरह से शामिल रहा है. रियासत काल के समय ऊंट को विशेष दर्जा हासिल था. अभिलेखागार के निदेशक डॉ नितिन गोयल कहते हैं कि करीब डेढ़ सौ साल पहले रियासत काल के पुराने दस्तावेजों को देखने से मालूम चलता है कि उस वक्त ऊंट का कितना महत्व था. उन्होंने बताया कि एक अभिलेख में उल्लेख है कि किसी गांव में व्यक्ति ने ऊंट को मार दिया. उस वक्त रियासत की ओर से उस व्यक्ति से ₹70 जुर्माना वसूल किया गया. इसके लिए बाकायदा रियासत की ओर से वसूली के लिए सिपाही को भेजा गया और जुर्माना वसूल किया गया। रियासत की ओर से फसल का एक हिस्सा ऊंट के लिए सुरक्षित रखा जाता था. गवार की फसल का एक हिस्सा केवल ऊंट के खाने के काम आता था. इसके लिए भी बाकायदा आदेश है, जिसकी प्रति आज भी अभिलेखागार में सुरक्षित है. वह कहते हैं कि इसके अलावा रियासत के हर गांव में ऊंट के पीने की पानी की व्यवस्था के लिए भी आदेश थे और किसी भी युद्ध और आपात स्थिति में ऊंट महत्वपूर्ण भूमिका में होती थी. आपात स्थिति के लिए वह हर समय तैयार रहें इसको लेकर भी उनको चलवाया जाता था. साथ ही ऊंट के बीमार होने पर उसकी तीमारदारी की पूरी व्यवस्था की जाती थी। रेगिस्तान के जहाज से जुड़ा ऊंट महोत्सव (Camel festival in Hindi) राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। ऊँट राजस्थान का आधिकारिक राज्य पशु है। रेगिस्तान का जहाज़ ऊँट एक सुन्दर और राजसी जानवर है। यह कैमलस प्रजाति से संबंधित है। यह साहसी जानवर स्थानीय लोगों को रेगिस्तान में जीवित रहने में मदद करता है और इस "रेगिस्तान के जहाज" के सम्मान में बीकानेर हर साल ऊंट महोत्सव (Camel festival in Hindi) की मेजबानी करता है। राजस्थान सरकार के पर्यटन विभाग की एक पहल, ऊंट महोत्सव (Camel Festival in Hindi) का उत्सव अन्य उत्सवों के समान है जिनकी राजस्थान मेजबानी करता है। बीकानेर में ऊंट महोत्सव (Bikaner Camel Festival in Hindi) की शुरुआत जूनागढ़ किले के परिसर में ऊंटों के एक रंगीन जुलूस के साथ होती है। स्थानीय भाषा में गोरबंध कहे जाने वाले लगाम और विस्तृत हार पहनकर लुभावने प्रदर्शन किए जाते हैं। विभिन्न प्रकार के ऊँट खेलों और गतिविधियों का भी बड़े जोर-शोर से आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक शामिल होते हैं। ऊंट महोत्सव (Camel Festival in Hindi) कार्यक्रम के दौरान सदस्यों द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जैसे रस्साकशी, पगड़ी बांधना और कुश्ती कबड्डी। इस कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोग कई चीजों के साथ अपनी लालसा को संतुष्ट करना पसंद करते हैं, ऊंट उत्सव के समय विशेष रूप से उपलब्ध कराई जाने वाली ऐसी ही एक डिश है ऊंट चाय। यह ऊँट महोत्सव कालबेलिया, घूमर आदि जैसे जीवंत प्रदर्शनों के साथ समाप्त होता है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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5 days ago
विश्व शरणार्थी दिवस विश्व शरणार्थी दिवस, प्रत्येक वर्ष 20 जून को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय पर्व है। यह दिवस दुनिया भर में शरणार्थियों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। 4 दिसंबर 2000 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निर्णय लिया कि 2000 से, 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सभी शरणार्थियों को सम्मानित करने, जागरूकता बढ़ाने और समर्थन करने के लिए यह स्मरण किया जाता है।वह लोग बहुत ही भाग्यशाली हैं जिनके पास अपनी एक पहचान है, जो देश के निवासी हैं और जिन्हें मुख्यधारा में शामिल करके शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधा दी जा रही है. सबसे अहम बात तो उन्हें राजनीतिक अधिकार प्राप्त है लेकिन आपने कभी यह सोचा है कि अगर किसी व्यक्ति को यह सुविधा और अधिकार न मिले तो उसका जीवन कैसा होगा। जिन कारणों से शरणार्थियों की संख्या बढ़ रही है उनमें युद्ध, प्राकृतिक आपदा और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं. लगातार हो रहे युद्ध, प्राकृतिक आपदा की वजह से आज मानव अस्थाई रूप से रहने के लिए विवश हो रहा है तथा अपना जीवनयापन करने के लिए मजदूरी कर रहा है. कहने को तो इनके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार बने हुए हैं लेकिन इनकी कोई सुनवाई नहीं है. सरकार और राजनीतिक पार्टियों से लेकर आम लोगों तक कोई इनकी बातें सुनने के लिए तैयार ही नहीं है। संयुक्त राष्ट्र 1951 शरणार्थी सम्मेलन के अनुसार, शरणार्थी वह व्यक्ति होता है जो अपनी जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्यता या राजनीतिक राय के कारण उत्पीड़न के एक ठोस डर के कारण अपने घर और देश से भाग गया हो। कई शरणार्थी प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं के प्रभावों से बचने के लिए निर्वासन में हैं। शरणार्थियों का कहना है कि वे शरणार्थी हैं और शरणार्थियों की तरह हीशरणार्थियों का कहना है कि वे शरणार्थी हैं और शरणार्थियों की तरह ही अपने घरों से भागे हैं, लेकिन जिस देश में वे भागे हैं, वहां शरणार्थी स्थिति के उनके दावे का अभी तक निर्णायक रूप से मूल्यांकन नहीं किया गया है। राज्यविहीन व्यक्तियों की कोई मान्यता प्राप्त राष्ट्रीयता नहीं होती तथा वे किसी भी देश के निवासी नहीं होते। राज्यविहीनता की स्थिति आमतौर पर कुछ समूहों के खिलाफ भेदभाव के कारण होती है। उनकी पहचान की कमी - नागरिकता प्रमाण पत्र - उन्हें स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा या रोजगार सहित महत्वपूर्ण सरकारी सेवाओं तक पहुंच से वंचित कर सकती है। अपने घरों से भागे हैं, लेकिन जिस देश में वे भागे हैं, वहां शरणार्थी स्थिति के उनके दावे का अभी तक निर्णायक रूप से मूल्यांकन नहीं किया गया है। वापस आने वाले लोग पूर्व शरणार्थी होते हैं जो निर्वासन में समय बिताने के बाद अपने देश या मूल क्षेत्र में लौटते हैं। वापस आने वाले लोगों को निरंतर समर्थन और पुनः एकीकरण सहायता की आवश्यकता होती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे अपने घर पर अपना जीवन फिर से शुरू कर सकें। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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6 days ago
विश्व सिकल सेल दिवस विश्व सिकल सेल दिवस 19 जून को मनाया जाता है। जैसा कि नाम से पता चलता है कि यह दिन सिकल सेल रोग के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए है। यह रोग एक प्रकार का रक्त विकार है जो माता-पिता से बच्चों में फैलता है। यह मुख्य रूप से विकारों का एक समूह है जो लाल रक्त कोशिकाओं और हीमोग्लोबिन में अणु को प्रभावित करता है। सिकल रोग से पीड़ित लोगों में हीमोग्लोबिन एस होता है। यह एक असामान्य हीमोग्लोबिन अणु है जिसमें लाल रक्त कोशिकाओं को सिकल में विकृत करने की प्रवृत्ति होती है। 2008 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) द्वारा सिकल सेल रोग को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में स्वीकार करने के बाद यह दिन अस्तित्व में आया। UNGA ने सिकल रोग को पहली आनुवंशिक बीमारियों में से एक के रूप में भी मान्यता दी। रोग के लक्षण आम तौर पर पांच महीने की उम्र में प्रकट होते हैं और समय के साथ बदलते हैं। भले ही लक्षण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न होते हैं और समय-समय पर बदल सकते हैं। सिकल सेल रोग के कुछ सामान्य लक्षणों में एनीमिया, हाथों और पैरों में सूजन, आंखों की समस्या, दर्द, विकास में देरी और नियमित संक्रमण शामिल हैं। नवजात शिशु की जांच प्रक्रिया के दौरान इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। यदि सिकल सेल रोग का पारिवारिक इतिहास है, तो गर्भावस्था के समय भी इसका निदान किया जा सकता है। इस बीमारी का एकमात्र इलाज या तो स्टेम सेल ट्रांसप्लांट या बोन मैरो है। यदि प्रारंभिक अवस्था में ही इसकी पहचान कर ली जाती है, तो समय पर उपचार लक्षणों से निपटने में मदद कर सकता है। स्टेम सेल प्रत्यारोपण के अलावा, एंटीबायोटिक दवाओं, दर्द निवारक, समय-समय पर रक्त आधान और टीकाकरण की मदद से भी लक्षणों से निपटा जा सकता है। एचबीएस बीटा थैलेसीमिया: यह प्रकार तब होता है जब सिकल सेल जीन एक माता-पिता से पारित होता है, जबकि बीटा-थैलेसीमिया दूसरे से पारित होता है। एचबीएसएस: यह एक गंभीर प्रकार का सिकल सेल रोग है जो तब होता है जब बच्चे को माता-पिता दोनों से सिकल सेल जीन विरासत में मिलता है। एचबीएससी: यह तब होता है जब एक माता-पिता में सिकल सेल जीन होता है और दूसरे में असामान्य हीमोग्लोबिन से जीन होता है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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8 days ago
अंतरराष्ट्रीय मरूस्थलीकरण व सूखा रोकथाम दिवस मरुस्थलीकरण से निपटने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के बारे में जन जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष 17 जून को विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस मनाया जाता है। विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस का विषय है "भूमि के लिए एकजुट। हमारी विरासत। हमारा भविष्य", जो दुनिया भर के अरबों लोगों की स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करने में भूमि प्रबंधन की भविष्य की भूमिका पर प्रकाश डालता है। मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा हमारे समय की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से हैं, तथा विश्व भर में 40 प्रतिशत भूमि क्षेत्र पहले से ही क्षरित माना जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित और चरम मौसम पैटर्न के कारण मरुस्थलीकरण और सूखे की समस्या और भी बदतर हो रही है, जिससे हर साल करोड़ों लोगों को विस्थापन का खतरा पैदा हो रहा है। अनिश्चित भविष्य से निपटने के लिए, निर्णयकर्ताओं को भूमि प्रबंधन के लिए अधिक टिकाऊ दृष्टिकोण के भाग के रूप में लचीली जल प्रबंधन तकनीकों और प्रौद्योगिकियों को अपनाने की आवश्यकता होगी। भूमि हमारी खाद्य प्रणालियों का आधार है, दुनिया का 95% भोजन कृषि भूमि पर उत्पादित होता है। हालाँकि, इनमें से एक तिहाई भूमि वर्तमान में क्षरित हो चुकी है। यह क्षरित दुनिया भर में 3.2 बिलियन लोगों को प्रभावित करती है, विशेष रूप से ग्रामीण समुदायों और छोटे किसानों को जो अपनी आजीविका के लिए भूमि पर निर्भर हैं, जिससे भूख, गरीबी, बेरोजगारी और जबरन पलायन में वृद्धि होती है। जलवायु परिवर्तन इन मुद्दों को और भी गंभीर बना देता है, जिससे टिकाऊ भूमि प्रबंधन और कृषि के लिए गंभीर चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, तथा पारिस्थितिकी तंत्र की लचीलापन कमज़ोर हो जाता है। गरीबी और भुखमरी को समाप्त करने, खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने और लाखों लोगों की आजीविका में सुधार लाने के लिए, विशेष रूप से विकासशील देशों में, बंजर भूमि की रक्षा करना और उसका पुनरुद्धार करना आवश्यक है। भूमि, मृदा और जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन खाद्य उत्पादन बढ़ाने, पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने, भूमि, मृदा और जल की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा चरम मौसम की घटनाओं के प्रति ग्रामीण समुदायों की तन्यकता को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। समग्र, भूदृश्य दृष्टिकोण के माध्यम से भूमि क्षरण को संबोधित करना खाद्य सुरक्षा और लचीली आजीविका सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। एकीकृत भूमि उपयोग योजना, भूमि प्रशासन और पट्टेदारी सुरक्षा भूमि क्षरण तटस्थता प्राप्त करने के लिए मौलिक हैं। पिछले दशक में, संयुक्त राष्ट्र का खाद्य एवं कृषि संगठन इन पहलों को समर्थन देने वाले तकनीकी कार्यक्रमों और गतिविधियों में अग्रणी रहा है। पारिस्थितिकी तंत्र की लचीलापन और उत्पादकता को बहाल करने और बढ़ाने के हमारे प्रयासों में, निम्नलिखित सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए: हमें महिलाओं और युवाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो भूमि स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण हितधारक हैं और भूमि क्षरण से सबसे अधिक पीड़ित हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विज्ञान आधारित और जन-केंद्रित भूमि पुनरुद्धार हमारी भावी पीढ़ियों के लिए विरासत बने। हम क्षरित भूमि और शुष्क भूमि की आर्थिक क्षमता को विकसित किए बिना तथा अधिक लचीली कृषि खाद्य प्रणालियों का निर्माण किए बिना भूमि क्षरण की समस्या से नहीं निपट सकते। भूमि क्षरण से निपटने के लिए छोटे पैमाने पर खेती के लिए बड़े पैमाने पर भूमि पुनर्स्थापन अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें भूमि क्षरण तटस्थता प्राप्त करने की दिशा में प्रगति को मापने के लिए नवीन निगरानी और मूल्यांकन प्रणालियों का उपयोग करने की आवश्यकता है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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10 days ago
वैश्विक पवन उर्जा पवन ऊर्जा, पवन ऊर्जा के विभिन्न उपयोगों और पवन ऊर्जा दुनिया को बदलने में कैसे मदद कर सकती है, इसके तरीके और संभावनाओं के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 15 जून को दुनिया भर में वैश्विक पवन दिवस (Global Wind Day) मनाया जाता है. वैश्विक पवन दिवस को पहली बार 2007 में पवन दिवस (Wind Day) के रूप में मनाया गया था. बाद में, 2009 में इसका नाम बदलकर वैश्विक पवन दिवस (Global Wind Day) कर दिया गया. वैश्विक पवन दिवस का आयोजन विंडयूरोप (WindEurope) और ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल (Global Wind Energy Council - GWEC) द्वारा किया जाता है। (International Renewable Energy Agency - IRENA) के अनुसार, पवन ऊर्जा दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते अक्षय ऊर्जा स्रोतों में से एक है. भारत 2021-25 में 20GW पवन क्षमता स्थापित करेगा. पवन ऊर्जा स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है और यह अक्षय है. वर्तमान में, भारत की कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 38.789 GW है. भारत के पास दुनिया की चौथी सबसे बड़ी स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता है।। हवा एक ऐसा स्रोत है जो इसमें नौकरियों और अर्थव्यवस्था के विकास को बढ़ावा देने की क्षमता है. पवन ऊर्जा में कई मायनों में क्रांतिकारी(revolutionary) रही है और एक मुख्यधारा की तकनीक में बदल गई है. कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों के लिए परियोजनाओं में अरबों डॉलर के वित्तपोषण के साथ पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकी में निवेश करने वाले बहुत सारे औद्योगिक क्षेत्र हैं. यूरोपीय संघ इस मामले में सबसे आगे रहा है और गैस की तुलना में पवन ऊर्जा की अधिक स्थापना की है, जो पूरे क्षेत्र की बिजली की खपत को 11.4% p.a. में नीचे लाता है, लगभग 87 मिलियन से अधिक घर ऐसे हैं जो पवन ऊर्जा का उपयोग करते हैं। । #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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10 days ago
विश्व बुजुर्ग दुर्व्‍यवहार जागरूकता दिवस विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस (World Elder Abuse Awareness Day) हर साल 15 जून को विश्व स्तर पर मनाया जाता है. यह दिन बुजुर्ग लोगों के साथ दुर्व्यवहार और पीड़ा के विरोध में आवाज उठाने के लिए मनाया जाता है. इस दिन का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के समुदायों को बुजुर्गों के दुर्व्यवहार और उपेक्षा को प्रभावित करने वाली सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रक्रियाओं के बारे में जागरूकता पैदा करके दुर्व्यवहार और उपेक्षा की बेहतर समझ को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान करना है।. इंटरनेशनल नेटवर्क फॉर द प्रिवेंशन ऑफ एल्डर एब्यूज (INPEA) के अनुरोध के बाद संयुक्त राष्ट्र के संकल्प 66/127 को दरकिनार करते हुए दिसंबर 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आधिकारिक तौर पर इस दिन को मान्यता दी है। हमारे समाज में तेजी से हो रहे बदलावों के कारण बुजुर्गों को अकेलापन और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। डिजिटल क्रांति, औद्योगीकरण, शहरीकरण और वैश्वीकरण हमारे सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों को बदल रहे हैं। मौजूदा फैमिली सिस्टम और दिन-प्रतिदिन हर गतिविधियों का डिजिटल होना वृद्ध वयस्कों को हाशिए पर डाल रहा है। इसलिए उनकी सुरक्षा करना अब पहले से कहीं अधिक ज्यादा जरूरी हो गया है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका दुरुपयोग और शोषण न हो। उनकी देखभाल करना हमारा सभ्यतागत कर्तव्य है। बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार शारीरिक, यौन, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और वित्तीय हो सकता है और इसमें उपेक्षा भी शामिल हो सकता है। बड़े पैमाने पर बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं होती हैं लेकिन आमतौर पर इसके मामले कम दर्ज किए जाते हैं। क्योंकि ज़्यादातर मामलों में दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति उनके परिजन विशेषकर उनके बच्चे होतें है। हेल्पएज इंडिया की शोध के अनुसार बुजुर्गों को जिस तरह के दुर्व्यवहार का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ता है वह है- तिरस्कार 56 प्रतिशत, गाली-गलौज 49 प्रतिशत, अनदेखी 33 प्रतिशत। ज्यादातर लोगों को लगता है कि बहुएं सास-ससुर के साथ बुरा बर्ताव करती हैं। लेकिन इस हेल्पएज की स्टडी की मानें तो सास-ससुर के साथ दुर्व्यवहार करने वाली बहुओं की संख्या तो 38 प्रतिशत है जबकि अपने ही मां-बाप का शोषण करने वाले बेटों की संख्या 57 प्रतिशत। बुजुर्गों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को 6 वर्गों में वर्गीकृत किए जा सकता है। #जागरूकता दिवस
सुशील मेहता
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11 days ago
विश्व रक्त दान दिवस शरीर विज्ञान में नोबल पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टाईन की याद में पूरे विश्व में यह दिवस मनाया जाता है। 14 जून 1868 को ही महान वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टाईन का जन्‍म हुआ था, उन्होंने मानव रक्‍त में उपस्थित एग्‍ल्‍युटिनि‍न की मौजूदगी के आधार पर रक्‍तकणों का ए, बी और ओ समूह में वर्गीकरण किया। इस वर्गीकरण ने चिकित्‍सा विज्ञान में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया। इस महत्‍वपूर्ण खोज के लिए ही कार्ल लैंडस्‍टाईन को सन् 1930 में नोबल पुरस्कार दिया गया। सन् 1997 में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने सौ फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान की शुरुआत की, जिसमें 124 प्रमुख देशों को शामिल कर सभी देशों से स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने की अपील की गई। इस पहल का मुख्य उद्देश्य था, कि किसी भी नागरिक को रक्त की आवश्यकता पड़ने पर उसे पैसे देकर रक्त न खरीदना पड़े और इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अब तक 49 देशों ने स्वैच्छिक रक्तदान को अमलीजामा पहनाया है। हालांकि कई देशों में अब भी रक्तदान के लिए पैसों का लेनदेन होता है, जिसमें भारत भी शामिल है। लेकिन फिर भी रक्तदान को लेकर विभिन्न संस्थाओं व व्यक्तिगत स्तर पर उठाए गए कदम भारत में स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने में कारगर साबित हुए हैं। चिकित्सा विज्ञान रक्तदान के संबंध में कहता है. कि कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जो 45 किलोग्राम से अधिक वजन का हो और जिसे जो एचआईवी, हेपाटिटिस बी या हेपाटिटिस सी जैसी बीमारी न हुई हो, वह रक्तदान कर सकता है। #जागरूकता दिवस