महाभारत

sn vyas
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11 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रों की बालक्रीड़ा, दुर्योधन का भीमसेन को विष खिलाना तथा गंगा में ढकेलना और भीम का नागलोक में पहुँचकर आठ कुण्डों के दिव्य रस का पान करना...(दिन 376) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ फलानि वृक्षमारुह्य विचिन्वन्ति च ते तदा । तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पयते द्रुमान् ।। २१ ।। जब कौरव वृक्षपर चढ़कर फल तोड़ने लगते, तब भीमसेन पैरसे ठोकर मारकर उन पेड़ोंको हिला देते थे ।। २१ ।। प्रहारवेगाभिहता द्रुमा व्याघूर्णितास्ततः । सफलाः प्रपतन्ति स्म द्रुतं त्रस्ताः कुमारकाः ।। २२ ।। उनके वेगपूर्वक प्रहारसे आहत हो वे वृक्ष हिलने लगते और उनपर चढ़े हुए धृतराष्ट्रकुमार भयभीत हो फलोंसहित नीचे गिर पड़ते थे ।। २२ ।। न ते नियुद्धे न जवे न योग्यासु कदाचन । कुमारा उत्तरं चक्क्रुः स्पर्धमाना वृकोदरम् ।। २३ ।। कुश्तीमें, दौड़ लगानेमें तथा शिक्षाके अभ्यासमें धृतराष्ट्रकुमार सदा लाग-डॉट रखते हुए भी कभी भीमसेनकी बराबरी नहीं कर पाते थे ।। २३ ।। एवं स धार्तराष्ट्रांश्च स्पर्धमानो वृकोदरः । अप्रियेऽतिष्ठदत्यन्तं बाल्यान्न द्रोहचेतसा ।। २४ ।। इसी प्रकार भीमसेन भी धृतराष्ट्रपुत्रोंसे स्पर्धा रखते हुए उनके अत्यन्त अप्रिय कार्योंमें ही लगे रहते थे। परंतु उनके मनमें कौरवोंके प्रति द्वेष नहीं था, वे बाल-स्वभावके कारण ही वैसा करते थे ।। २४ ।। ततो बलमतिख्यातं धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् । भीमसेनस्य तज्ज्ञात्वा दुष्टभावमदर्शयत् ।। २५ ।। तब धृतराष्ट्रका प्रतापी पुत्र दुर्योधन यह जानकर कि भीमसेनमें अत्यन्त विख्यात बल है, उनके प्रति दुष्टभाव प्रदर्शित करने लगा ।। २५ ।। तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः । मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ।। २६ ।। वह सदा धर्मसे दूर रहता और पापकर्मोंपर ही दृष्टि रखता था। मोह और ऐश्वर्यके लोभसे उसके मनमें पापपूर्ण विचार भर गये थे ।। २६ ।। अयं बलवतां श्रेष्ठः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । मध्यमः पाण्डुपुत्राणां निकृत्या संनिगृह्यताम् ।। २७ ।। वह अपने भाइयोंके साथ विचार करने लगा कि 'यह मध्यम पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन भीम बलवानोंमें सबसे बढ़कर है। इसे धोखा देकर कैद कर लेना चाहिये ।। २७ ।। प्राणवान् विक्रमी चैव शौर्येण महतान्वितः । स्पर्धते चापि सहितानस्मानेको वृकोदरः ।। २८ ।। 'यह बलवान् और पराक्रमी तो है ही, महान् शौर्यसे भी सम्पन्न है। भीमसेन अकेला ही हम सब लोगोंसे होड बद लेता है ।। २८ ।। तं तु सुप्तं पुरोद्याने गङ्गायां प्रक्षिपामहे । अथ तस्मादवरजं श्रेष्ठं चैव युधिष्ठिरम् ।। २९ ।। प्रसह्य बन्धने बद्ध्वा प्रशासिष्ये वसुंधराम् । एवं स निश्चयं पापः कृत्वा दुर्योधनस्तदा । नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यासीन्महात्मनः ।। ३० ।। 'इसलिये नगरोद्यानमें जब वह सो जाय, तब उसे उठाकर हमलोग गंगाजीमें फेंक दें। इसके बाद उसके छोटे भाई अर्जुन और बड़े भाई युधिष्ठिरको बलपूर्वक कैदमें डालकर मैं अकेला ही सारी पृथ्वीका शासन करूँगा।' ऐसा निश्चय करके पापी दुर्योधन महात्मा भीमसेन का अनिष्ट करने के लिये सदा मौका ढूँढ़ता रहता था ।। २९-३० ।। ततो जलविहारार्थ कारयामास भारत । चैलकम्बलवेश्मानि विचित्राणि महान्ति च ।। ३१ ।। जनमेजय ! तदनन्तर दुर्योधन ने गंगातट पर जल-विहार के लिये ऊनी और सूती कपड़ों के विचित्र एवं विशाल गृह तैयार कराये ।। ३१ ।। सर्वकामैः सुपूर्णानि पताकोच्छ्रायवन्ति च। तत्र संजनयामास नानागाराण्यनेकशः ।। ३२ ।। वे गृह सब प्रकारकी अभीष्ट सामग्रियोंसे भरे-पूरे थे। उनके ऊपर ऊँची-ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। उनमें उसने अलग-अलग अनेक प्रकार के बहुत-से कमरे बनवाये थे ।। ३२ ।। उदकक्रीडनं नाम कारयामास भारत । प्रमाणकोट्यां तं देशं स्थलं किंचिदुपेत्य ह ।। ३३ ।। भारत ! गंगातटवर्ती प्रमाणकोटि तीर्थमें किसी स्थानपर जाकर दुर्योधनने यह सारा आयोजन करवाया था। उसने उस स्थानका नाम रखा था उदकक्रीडन ।। ३३ ।। भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यमथापि च । उपपादितं नरैस्तत्र कुशलैः सूदकर्मणि ।। ३४ ।। वहाँ रसोईके काममें कुशल कितने ही मनुष्योंने जुटकर खाने-पीनेके बहुत-से भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य पदार्थ तैयार किये ।। ३४ ।। न्यवेदयंस्तत् पुरुषा धार्तराष्ट्राय वै तदा । ततो दुर्योधनस्तत्र पाण्डवानाह दुर्मतिः ।। ३५ ।। तदनन्तर राजपुरुषोंने दुर्योधनको सूचना दी कि 'सब तैयारी पूरी हो गयी है।' तब खोटी बुद्धिवाले दुर्योधन ने पाण्डवों से कहा- ।। ३५ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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13 days ago
#महाभारत श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु और माद्री की अस्थियों का दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओं द्वारा उनके लिये जलांजलिदान...(दिन 374) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अयमस्मानपाहाय दुःखे चाधाय शाश्वते । कृत्वा चास्माननाथांश्च क्व यास्यति नराधिपः ।। १५ ।। वे कहते जाते थे- 'हाय! ये महाराज हमलोगोंको छोड़कर, हमें सदाके लिये भारी दुःखमें डालकर और हम सबको अनाथ करके कहाँ जा रहे हैं' ।। १५ ।। क्रोशन्तः पाण्डवाः सर्वे भीष्मो विदुर एव च । रमणीये वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे ।। १६ ।। न्यासयामासुरथ तां शिबिकां सत्यवादिनः । सभार्यस्य नृसिंहस्य पाण्डोरक्लिष्टकर्मणः ।। १७ ।। समस्त पाण्डव, भीष्म तथा विदुरजी क्रन्दन करते हुए जा रहे थे। वनके रमणीय प्रदेशमें गंगाजीके शुभ एवं समतल तटपर उन लोगोंने, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डु और उनकी पत्नी माद्रीकी उस शिबिकाको रखा ।। १६-१७ ।। ततस्तस्य शरीरं तु सर्वगन्धाधिवासितम् । शुचिकालीयकादिग्धं दिव्यचन्दनरूषितम् ।। १८ ।। पर्यषिञ्चञ्जलेनाशु शातकुम्भमयैर्घटैः । चन्दनेन च शुक्लेन सर्वतः समलेपयन् ।। १९ ।। कालागुरुविमिश्रण तथा तुङ्गरसेन च । अथैनं देशजैः शुक्लैर्वासोभिः समयोजयन् ।। २० ।। तदनन्तर राजा पाण्डुकी अस्थियोंको सब प्रकारकी सुगन्धोंसे सुवासित करके उनपर पवित्र काले अगरका लेप किया गया। फिर उन्हें दिव्य चन्दनसे चर्चित करके सोनेके कलशोंद्वारा लाये हुए गंगाजलसे भाई-बन्धुओंने उसका अभिषेक किया। तत्पश्चात् उनपर सब ओरसे काले अगरसे मिश्रित तुंगरस नामक ग्रन्ध-द्रव्यका एवं श्वेत चन्दनका लेप किया गया। इसके बाद उन्हें सफेद स्वदेशी वस्त्रों से ढक दिया गया ।। १८-२० ।। संछन्नः स तु वासोभिर्जीवन्निव नराधिपः । शुशुभे स नरव्याघ्रो महार्हशयनोचितः ।। २१ ।। इस प्रकार बहुमूल्य शय्यापर शयन करनेयोग्य नरश्रेष्ठ राजा पाण्डुकी अस्थियाँ वस्त्रोंसे आच्छादित हो जीवित मनुष्यकी भाँति शोभा पाने लगीं ।। २१ ।। (हयमेधाग्निना सर्वे याजकाः सपुरोहिताः । वेदोक्तेन विधानेन क्रियाश्चक्रुः समन्त्रकम् ।।) याजकैरभ्यनुज्ञाते प्रेतकर्मण्यनुष्ठिते । घृतावसिक्तं राजानं सह माद्र्या स्वलंकृतम् ।। २२ ।। समस्त याजकों और पुरोहितोंने अश्वमेधकी अग्निसे वेदोक्त विधिके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी क्रियाएँ सम्पन्न कीं। याजकोंकी आज्ञा लेकर प्रेतकर्म आरम्भ करते समय माद्रीसहित अलंकारयुक्त राजाका घृतसे अभिषेक किया गया ।। २२ ।। तुङ्गपद्मकमिश्रेण चन्दनेन सुगन्धिना । अन्यैश्च विविधैर्गन्धैर्विधिना समदाहयन् ।। २३ ।। फिर तुंग और पद्मकमिश्रित सुगन्धित चन्दन तथा अन्य विविध प्रकार के गन्ध-द्रव्यों से भाई-बन्धुओं ने युधिष्ठिर द्वारा विधिपूर्वक उन दोनों का दाह-संस्कार कराया ।। २३ ।। ततस्तयोः शरीरे द्वे दृष्ट्वा मोहवशं गता । हा हा पुत्रेति कौसल्या पपात सहसा भुवि ।। २४ ।। उस समय उन दोनोंकी अस्थियोंको देखकर माता कौसल्या (अम्बालिका) 'हा पुत्र ! हा पुत्र !' कहती हुई सहसा मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी ।। २४ ।। तां प्रेक्ष्य पतितामार्ता पौरजानपदो जनः । रुरोद दुःखसंतप्तो राजभक्त्या कृपान्वितः ।। २५ ।। उसे इस प्रकार शोकातुर हो भूमिपर पड़ी देख नगर और जनपदके लोग राजभक्ति तथा दयासे द्रवित एवं दुःखसे संतप्त हो फूट-फूटकर रोने लगे ।। २५ ।। कुन्त्याश्चैवार्तनादेन सर्वाणि च विचुक्रुशुः । मानुषैः सह भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ।। २६ ।। कुन्ती के आर्तनाद से मनुष्यों सहित समस्त पशु और पक्षी आदि प्राणी भी करुण क्रन्दन करने लगे ।। २६ ।। तथा भीष्मः शान्तनवो विदुरश्च महामतिः । सर्वशः कौरवाश्चैव प्राणदन् भृशदुःखिताः ।। २७ ।। शन्तनुनन्दन भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर तथा सम्पूर्ण कौरव भी अत्यन्त दुःखमें निमग्न हो रोने लगे ।। २७ ।। ततो भीष्मोऽथ विदुरो राजा च सह पाण्डवैः । उदकं चक्रिरे तस्य सर्वाश्च कुरुयोषितः ।। २८ ।। तदनन्तर भीष्म, विदुर, राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डवोंके सहित कुरुकुलकी सभी स्त्रियोंने राजा पाण्डुके लिये जलांजलि दी ।। २८ ।। चुक्क्रुशुः पाण्डवाः सर्वे भीष्मः शान्तनवस्तथा । विदुरो ज्ञातयश्चैव चक्क्रुश्चाप्युदकक्रियाः ।। २९ ।। उस समय सभी पाण्डव पिताके लिये रो रहे थे। शन्तनुनन्दन भीष्म, विदुर तथा अन्य भाई-बन्धुओं की भी यही दशा थी। सबने जलांजलि देने की क्रिया पूरी की ।। २९ ।। कृतोदकांस्तानादाय पाण्डवाञ्छोककर्शितान् । सर्वाः प्रकृतयो राजन् शोचमाना न्यवारयन् ।। ३० ।। जलांजलिदान करके शोकसे दुर्बल हुए पाण्डवोंको साथ ले मन्त्री आदि सब लोग स्वयं भी दुःखी हो उन सबको समझा-बुझाकर शोक करनेसे रोकने लगे ।। ३० ।। यथैव पाण्डवा भूमौ सुषुपुः सह बान्धवैः । तथैव नागरा राजन् शिश्यिरे ब्राह्मणादयः ।। ३१ ।। तद्गतानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत् । बभूव पाण्डवैः सार्धं नगरं द्वादश क्षपाः ।। ३२ ।। राजन् ! बारह रात्रियोंतक जिस प्रकार बन्धु-बान्धवों सहित पाण्डव भूमिपर सोये, उसी प्रकार ब्राह्मण आदि नागरिक भी धरतीपर ही सोते रहे। उतने दिनोंतक हस्तिनापुर नगर पाण्डवोंके साथ आनन्द और हर्षोल्लाससे शून्य रहा। बूढ़ोंसे लेकर बच्चेतक सभी वहाँ दुःखमें डूबे रहे। सारा नगर ही अस्वस्थचित्त हो गया था ।। ३१-३२ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदाहे षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके दाहसंस्कारसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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17 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा पाण्डु की मृत्यु और माद्री का उनके साथ चितारोहण...(दिन 370) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ माद्युवाच कुन्ती समर्था पुत्राणां योगक्षेमस्य धारणे । अस्या हि न समा बुद्ध्या यद्यपि स्यादरुन्धती ।। कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । नाहं त्वमिव पुत्राणां समर्था धारणे तथा ।। साहं भर्तारमन्वेष्ये अतृप्ता नन्वहं तथा । भर्तृलोकस्य तु ज्येष्ठा देवी मामनुमन्यताम् ।। धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य सत्यधर्मस्य धीमतः । पादौ परिचरिष्यामि तदायें ह्यनुमन्यताम् ।। माद्रीने कहा-कुन्तीदेवी सभी पुत्रोंके योग-क्षेमके निर्वाहमें- पालन-पोषणमें समर्थ हैं। कोई भी स्त्री, चाहे वह अरुन्धती ही क्यों न हो, बुद्धिमें इनकी समानता नहीं कर सकती। वृष्णिवंशके लोग तथा महाराज कुन्तिभोज भी कुन्तीके रक्षक एवं सहायक हैं। बहिन ! पुत्रोंके पालन-पोषणकी शक्ति जैसी आपमें है, वैसी मुझमें नहीं है। अतः मैं पतिका ही अनुगमन करना चाहती हूँ। पतिके संयोग-सुखसे मेरी तृप्ति भी नहीं हुई है। अतः आप बड़ी महारानीसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे पतिलोकमें जानेकी आज्ञा दें। मैं वहीं धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और बुद्धिमान् पतिके चरणोंकी सेवा करूँगी। आर्ये! आप मेरी इस इच्छाका अनुमोदन करें। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा महाराज मद्रराजसुता शुभा । ददौ कुन्त्यै यमौ माद्री शिरसाभिप्रणम्य च ।। अभिवाद्य ऋषीन् सर्वान् परिष्वज्य च पाण्डवान् । मूर्युपाघ्राय बहुशः पार्थानात्मसुतौ तथा ।। हस्ते युधिष्ठिरं गृह्य माद्री वाक्यमभाषत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- महाराज ! यों कहकर मद्रदेशकी राजकुमारी सती-साध्वी माद्रीने कुन्तीको प्रणाम करके अपने दोनों जुड़वें पुत्र उन्हींको सौंप दिये। तत्पश्चात् उसने महर्षियोंको मस्तक नवाकर पाण्डवोंको हृदयसे लगा लिया और बारंबार कुन्तीके तथा अपने पुत्रोंके मस्तक सूंघकर युधिष्ठिरका हाथ पकड़कर कहा। माद्युवाच कुन्ती माता अहं धात्री युष्माकं तु पिता मृतः । युधिष्ठिरः पिता ज्येष्ठश्चतुर्णां धर्मतः सदा ।। वृद्धानुशासने सक्ताः सत्यधर्मपरायणाः । तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ।। तस्मात् सर्वे कुरुध्वं वै गुरुवृत्तिमतन्द्रिताः ।। माद्री बोली-बच्चो ! कुन्तीदेवी ही तुम सबोंकी असली माता हैं, मैं तो केवल दूध पिलानेवाली धाय थी। तुम्हारे पिता तो मर गये। अब बड़े भैया युधिष्ठिर ही धर्मतः तुम चारों भाइयोंके पिता हैं। तुम सब बड़े-बूढ़ों-गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना और सत्य एवं धर्मके पालनसे कभी मुँह न मोड़ना। ऐसा करनेवाले लोग कभी नष्ट नहीं होते और न कभी उनकी पराजय ही होती है। अतः तुम सब भाई आलस्य छोड़कर गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहना। वैशम्पायन उवाच ऋषीणां च पृथायाश्च नमस्कृत्य पुनः पुनः । आयासकृपणा माद्री प्रत्युवाच पृथां तथा ।। धन्या त्वमसि वाष्र्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया । वीर्य तेजश्च योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ।। कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पञ्चानाममितौजसाम् । ऋषीणां संनिधावेषां मया वागभ्युदीरिता ।। स्वर्ग दिदृक्षमाणाया ममैषा न वृथा भवेत् । आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ।। ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणैः शुभैः । अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ।। धर्म स्वर्गं च कीर्ति च त्वत्कृतेऽहमवाप्नुयाम् । यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीर्विचारणाम् ।। वैशम्पायनजीने कहा- राजन् ! तत्पश्चात् माद्रीने ऋषियों तथा कुन्तीको बारंबार नमस्कार करके, क्लेशसे क्लान्त होकर कुन्तीदेवीसे दीनतापूर्वक कहा - 'वृष्णिकुलनन्दिनि! आप धन्य हैं। आपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है; क्योंकि आपको इन अमिततेजस्वी तथा यशस्वी पाँचों पुत्रोंके बल, पराक्रम, तेज, योगबल तथा माहात्म्य देखनेका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैंने स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा रखकर इन महर्षियोंके समीप जो यह बात कही है, वह कदापि मिथ्या न हो। देवि! आप मेरी गुरु, वन्दनीया तथा पूजनीया हैं; अवस्थामें बड़ी तथा गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं। समस्त नैसर्गिक सद्गुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। यादवनन्दिनि! अब मैं आपकी आज्ञा चाहती हूँ। आपके प्रयत्नद्वारा जैसे भी मुझे धर्म, स्वर्ग तथा कीर्तिकी प्राप्ति हो, वैसा सहयोग आप इस अवसरपर करें। मनमें किसी दूसरे विचारको स्थान न दें'। बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी ।। अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमोऽस्तु ते । भर्चा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि ।। संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथाः शाश्वतीः समाः ।।) राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् । दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदायें प्रियं कुरु ।। २९ ।। तब यशस्विनी कुन्तीने बाष्पगद्‌गद वाणीमें कहा- 'कल्याणि! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी। विशाललोचने ! तुम्हें आज ही स्वर्गलोकमें पतिका समागम प्राप्त हो। भामिनि ! तुम स्वर्गमें पतिसे मिलकर अनन्त वर्षांतक प्रसन्न रहो।' माद्री बोली-'मेरे इस शरीरको महाराजके शरीरके साथ ही अच्छी प्रकार ढँककर दग्ध कर देना चाहिये। बड़ी बहिन ! आप मेरा यह प्रिय कार्य कर दें ।। २९ ।। दारकेष्वप्रमत्ता च भवेथाश्च हिता मम । अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन ।। ३० ।। 'मेरे पुत्रोंका हित चाहती हुई सावधान रहकर उनका पालन-पोषण करें। इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे आपसे कहनेयोग्य नहीं जान पड़ती' ।। ३० ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् । मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी ।। ३१ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुन्तीसे यह कहकर पाण्डुकी यशस्विनी धर्मपत्नी माद्री चिताकी आगपर रखे हुए नरश्रेष्ठ पाण्डुके शवके साथ स्वयं भी चितापर जा बैठी ।। ३१ ।। (ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः । हिरण्यशकलान्याज्यं तिलान् दधि च तण्डुलान् ।। उदकुम्भं सपरशुं समानीय तपस्विभिः । अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः ।। काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम् ।। तदनन्तर प्रेतकर्मके पारंगत विद्वान् पुरोहित काश्यपने स्नान करके सुवर्णखण्ड, घृत, तिल, दही, चावल, जलसे भरा घड़ा और फरसा आदि वस्तुओंको एकत्र करके तपस्वी मुनियोंद्वारा अश्वमेधकी अग्नि मँगवायी और उसे चारों ओरसे चितासे छुलाकर यथायोग्य शास्त्रीय विधिसे पाण्डुका दाह-संस्कार करवाया। अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः ।। अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः । तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणा ऋषिभिः सह ।।) भाइयोंसहित निष्पाप युधिष्ठिरने नूतन वस्त्र धारण करके पुरोहितकी आज्ञाके अनुसार जलांजलि देनेका कार्य पूरा किया। शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों और चारणोंने आदरणीय राजा पाण्डुके परलोक-सम्बन्धी सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किये। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डूपरमे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके परलोकगमनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का अनुताप, संन्यास लेने का निश्चय तथा पत्नियों के अनुरोध से वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश...(दिन 349) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तं व्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम् । सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उन मृगरूपधारी मुनिको मरा हुआ छोड़कर राजा पाण्डु जब आगे बढ़े, तब पत्नीसहित शोक और दुःखसे आतुर हो अपने सगे भाई-बन्धुकी भाँति उनके लिये विलाप करने लगे तथा अपनी भूलपर पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे ।। १ ।। पाण्डुरुवाच सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम् । प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ।। २ ।। पाण्डु बोले-खेदकी बात है कि श्रेष्ठ पुरुषोंके उत्तम कुलमें उत्पन्न मनुष्य भी अपने अन्तःकरणपर वश न होनेके कारण कामके फंदेमें फँसकर विवेक खो बैठते हैं और अनुचित कर्म करके उसके द्वारा भारी दुर्गतिमें पड़ जाते हैं ।। २ ।। शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम । जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ।। ३ ।। हमने सुना है, सदा धर्ममें मन लगाये रहनेवाले महाराज शन्तनुसे जिनका जन्म हुआ था, वे मेरे पिता विचित्रवीर्य भी कामभोगमें आसक्तचित्त होनेके कारण ही छोटी अवस्थामें ही मृत्युको प्राप्त हुए थे ।। ३ ।। तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषिः । कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् भगवान् मामजीजनत् ।। ४ ।। उन्हीं कामासक्त नरेश की पत्नी से वाणी पर संयम रखने वाले ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन ने मुझे उत्पन्न किया ।। ४ ।। तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा । त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ।। ५ ।। मैं शिकारके पीछे दौड़ता रहता हूँ; मेरी इसी अनीतिके कारण जान पड़ता है देवताओंने मुझे त्याग दिया है। इसीलिये तो ऐसे विशुद्ध वंशमें उत्पन्न होनेपर भी आज व्यसनमें फँसकर मेरी यह बुद्धि इतनी नीच हो गयी ।। ५ ।। मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत् । सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ।। ६ ।। अतः अब मैं इस निश्चयपर पहुँच रहा हूँ कि मोक्षके मार्गपर चलनेसे ही अपना कल्याण है। स्त्री-पुत्र आदिका बन्धन ही सबसे महान् दुःख है। आजसे मैं अपने पिता वेदव्यासजीकी उस उत्तम वृत्तिका आश्रय लूँगा, जिससे पुण्यका कभी नाश नहीं होता ।। ६ ।। अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् । तस्मादेकोऽहमेकाकी एकैकस्मिन् वनस्पतौ ।। ७ ।। चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् । पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ।। ८ ।। मैं अपने शरीर और मनको निःसंदेह अत्यन्त कठोर तपस्यामें लगाऊँगा। इसलिये अब अकेला (स्त्रीरहित) और एकाकी (सेवक आदिसे भी अलग) रहकर एक-एक वृक्षके नीचे फलकी भिक्षा माँगूँगा। सिर मुँड़ाकर मौनी संन्यासी हो इन वानप्रस्थियोंके आश्रमोंमें विचरूँगा। उस समय मेरा शरीर धूलसे भरा होगा और निर्जन एकान्त स्थानमें मेरा निवास होगा ।। ७-८ ।। वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः । न शोचन् न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।। ९ ।। अथवा वृक्षोंका तल ही मेरा निवासगृह होगा। मैं प्रिय एवं अप्रिय सब प्रकारकी वस्तुओंको त्याग दूँगा। न मुझे किसीके वियोगका शोक होगा और न किसीकी प्राप्ति या संयोगसे हर्ष ही होगा। निन्दा और स्तुति दोनों मेरे लिये समान होंगी ।। ९ ।। निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः। न चाप्यवहसन् कच्चिन्न कुर्वन् भुकुटीं क्वचित् ।। १० ।। न मुझे आशीर्वादकी इच्छा होगी न नमस्कारकी। मैं सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित और संग्रह-परिग्रहसे दूर रहूँगा। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न क्रोधसे किसीपर भौंहें टेढ़ी करूँगा ।। १० ।। प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः । जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम् ।। ११ ।। मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी तथा सदा सब भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहूँगा। (स्वेदज, उद्भिज्ज, अण्डज, जरायुज) चार प्रकारके जो चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे किसीकी भी मैं हिंसा नहीं करूँगा ।। ११ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️