#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏|| श्री हरि: ||🙏
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‼️वासुदेव: सर्वम ‼️अगर भक्ति कि दृष्टि से देखें तो सब रूपों में परमात्मा ही हमारे सामने आते हैं | हमें भूख लगती है तो अन्नरूप से वे ही आते हैं, हमें प्यास लगती है तो जलरूप से वे ही आते हैं, हम रोगी होते हैं तो ओषधिरूप से वे वे ही आते हैं, हम भोगी होते हैं तो भोग्यरूप से वे ही आते हैं, हमें गरमी लगती है तो छायारूप से वे ही आते हैं, हमें सरदी लगती है तो वस्त्ररूप से वे ही आते हैं | तात्पर्य है कि सब रूपों से परमात्मा ही हमें प्राप्त होते हैं | परन्तु हम उन रूपों में आये परमात्मा का भोग करने लग जाते हैं तो परमात्मा दुःखरूप से, नरकरूप से आते हैं |
प्रश्न - परमात्मा अन्न, जल आदि नाशवान वस्तुओं के रूप में क्यों आते हैं ?
उतर - हम अपने को शरीर मानकर अपने लिये वस्तुओं कि आवश्यकता मानते हैं और उनकी इच्छा करते तो परमात्मा भी वैसे ही बनकर हमारे सामने आते हैं | हम असत में स्थित होकर देखते हैं तो परमात्मा भी असत रूप से ही दीखते हैं | हम परमात्मा को जैसा देखना चाहते हैं, वे वैसे ही दीखते हैं - 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भाजाभ्यम' (गीता ४/११) | जैसे बालक खिलौना चाहता है तो माँ रूपये खर्च करके भी उसको खिलौना लाकर देती है , ऐसे ही हम जो चाहते हैं, परम दयालु परमात्मा उसी रूप से हमारे सामने आते हैं | अगर हम भोगों को न चाहें तो भगवान् को को भोगरूप से क्यों आना पड़े ? बनावटी रूप क्यों धारण करना पड़े ?