कर्मा

sn vyas
3K views
8 days ago
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३१/२ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 ज्ञानाग्नि कैसे प्रकट होती है ? 🦚 गतांक से आगे गोस्वामी जी इस बात को रामायण में लिखते हैं कि--- *ईश्वर अंस जीव अविनासी।* *चेतन अमल सहज सुखरासी॥* *सो मायाबस भयउ गोसाई।* *बंध्यो कीर मरकट की नाई ॥* *अरे ! तू शेर का बच्चा है । तू भेड़ नहीं है । तू सत्- चित- आनंद स्वरूप है । यह देह तेरा स्वरूप नहीं है । जब कोई समर्थ गुरु यह ज्ञान देगे, तब ही जीव का बेड़ा पार होगा। स्वरूप का ज्ञान होते ही संचित कर्म तत्काल भस्म हो जाते हैं। यह बात हम सब के अनुभवों में से भी सिद्ध होती है।* *एक संत का भाव है---* *ईश्वर का अंश जीव तो शुद्ध स्वरूप है , जिसको भूलकर यह अपने को किसी का पुत्र,, किसी का पिता ,, किसी की प्रजा ,, किसी का राजा ,, किसी कुल का ,, किसी वर्ण का ,, किसी आश्रम का ,,, मान रहा था ।उस भ्रम की निवृत्ति इतने साधनों के बाद हो जाने पर जीव यह निश्चित करता है,, कि मैं तो शुद्ध स्वरूप ,, ईश्वर का अंश ,, चेतन अमल हूं ।* *यह माया कृत संसारी नाते झूठे थे , और उसने अपने को ईश्वर का अंश मान लिया , तब वह संसार संबंध को मिथ्या मांग कर उससे अलग हो जाता है ,, यही ग्रन्थि का निरुआना या छोड़ना है । जब निश्चित रूप से संसारी नाते छूट जाते हैं , और केवल प्रभु की ही प्रसन्नता जीव स्वीकार कर लेता है ,, तब वह कृतार्थ हो जाता है।* अस्तु: (लेकिन भैया यह बड़ा मुश्किल है) *एक व्यक्ति रात को बारह बजे तक अपनी पत्नी से बात कर रहा था और इसके बाद उसकी आंखें बंद हो गई, (उसे नींद आ गई ) । निद्रा में वह एक स्वप्न देखने लगा । सपने में उसने एक व्यक्ति की हत्या कर दी ।उस पर तीन साल का मुकदमा चला । (रात को बारह और साढे बारह के बीच ) फिर इस व्यक्ति को दस साल की कैद की सजा हो गई और उसे कैद में डाल दिया गया ।* *(वास्तव में वह अपने बिस्तर पर पड़ा सो रहा था ) जेलर उसे पीठ पर चाबुक मारता था। इससे उसकी पीठ प्रतिदिन खून से लथपथ हो जाती थी। इस तरह उसने तीन साल की सजा तो भोग ली।* *(रात को बारह और साढे बारह के बीच)* *>>>>> एक दिन जेलर ने गुस्से में उसकी पीठ पर जोर से चाबुक मारा और वह व्यक्ति "बाप रे बाप " करके चिल्ला उठा और निंद्रा से जाग गया। उसकी पत्नी ने घबराकर उससे पूछा कि क्या हुआ ? तो उसने बताया कि " मेरी पीठ देखो ,, खून से कैसी लथपथ हो गई है "।* *उसकी पत्नी ने कहा-- आप तो बिस्तर पर सो रहे हैं और आपकी पीठ भी बिल्कुल चिकनी और कोमल है ,, आपकी पीठ पर कुछ भी नहीं हुआ है ।* *तब वह व्यक्ति सपना अवस्था से जागृत अवस्था में आया और उसे अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हुआ, कि वह हत्यारा नहीं है ,, बल्कि वास्तव में वह निर्दोष है । फिर उसने अपनी पत्नी को सपने की बात बताई और कैसे उसके विरूद्ध तीन साल तक हत्या का मुकदमा चला । और उसे दस साल की सख्त कैद की सजा हुई । उसमें से उसने तीन साल की सजा भोग ली।* *तब उसकी पत्नी ने कहा कि "रात को बारह बजे तक तो हम दोनों बातें कर रहे थे , और इस समय घड़ी में साढे बारह बजे हैं ,, इस आधे घंटे में आप छह साल के लिए कहां जा और आए ? ।* *उसे दस साल की सजा हुई थी , उसमें से तीन साल की सजा भोग चुका था ,, अब बाकी सात साल की सजा कौन भोगेगा । सपना अवस्था से जागृत अवस्था में आते ही उसकी सात साल की जेल की सजा का संचित कर्म भस्म सात् हो गया । क्योंकि उसे अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो गया था ।* *ज्ञानाग्नि सर्व कर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।* *जैसे सपना अवस्था के सुख दुख सपना अवस्था में सत्य आभासित होते हैं , किंतु जागृत अवस्था में मिथ्या हो जाते हैं, वैसे ही जागृत अवस्था में सुख-दुख आदि जागृत अवस्था में सत्य है , किंतु ज्ञान अवस्था में मिथ्या हो जाते हैं।* ( इस पर ध्यान दीजिए प्रभु जी) क्रमश इसके बाद अब कल आगे पढ़ेंगे ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ
sn vyas
1.3K views
9 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३१/१ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 ज्ञानाग्नि कैसे प्रकट होती है ? 🦚* जीव अपने असली स्वरूप को भूल गया है , जीव ब्रह्म का ही अंश है । ब्रह्म- सत , चित्त, आनंद स्वरूप है , इसलिए जीव भी सत , चित्त , आनंद स्वरूप ही है । किंतु जीव को इसका ज्ञान नहीं है , इसलिए जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। *भगवान गीता में कहते हैं कि--* *ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।* *जीव ब्रह्म का अंश होने के बावजूद, मुक्त होने के बावजूद, माया के वशीभूत होकर बद्ध हो गया है , अर्थात बंधनों में पड़ गया है।* *जीव को अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाए, इसी का नाम "ज्ञान" है । ज्ञान होते ही उसके सभी संचित कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं। जीव को स्वरूप का ज्ञान होना बहुत कठिन है । कोई बहुत ही समर्थ गुरु मिले , तो ही यह ज्ञान प्राप्त होता है।* *एक शेर का बच्चा जन्म लेते ही उसकी मां से अलग हो गया, और भेड़ों के मालिक ने इस नवजात शिशु को भेड़ों के साथ पाल - पोस कर बड़ा किया । यह शेर का बच्चा हमेशा भेड़ों के झुंड में ही रहता था , घूमता फिरता था, और अज्ञानता बस स्वयं को भी भेड़ ही समझता था।* *"मैं भी भेड़ ही हूं " ऐसी उसकी दृढ मान्यता हो गई थी। एक बार एक शेर घूमता -फिरता भेड़ों के झुंड के पास आया , जिसमें यह शेर का बच्चा भी था । शेर को देखकर भेड़ों का झुंड भाग खड़ा हुआ। साथ में वह शेर का बच्चा भी भाग खड़ा हुआ । यह देखकर उस शेर को आश्चर्य हुआ कि भेडो के साथ यह शेर का बच्चा क्यों भयभीत होकर भाग रहा है । शेर ने उन भेड़ों को जाने दिया और शेर के बच्चे को ही पकड़ा , तो वह बच्चा ,,, शेर के हाथ जोड़ने लगा कि " मुझे छोड़ दीजिए, मुझे मारना नहीं "।* *तब शेर ने उससे कहा : अरे भाई ,, तू भेड़ नहीं है । तू तो मेरी ही जाति का शेर है । तुझे मुझसे नहीं डरना चाहिए, मैं तुझे मार कर नहीं खाऊंगा।* *लेकिन ,,, शेर के बच्चे को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ ,, वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं और मुझे मारना नहीं"।* 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 *(वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं मुझे मारना नहीं"।)* *फिर वह शेर उसे एक तालाब के किनारे ले गया और कहा कि इस तालाब के पानी में अपना मुख देखो , तेरा और मेरा मुख समान ही है या नहीं ? मैं गर्जना करूंगा, वैसे ही तू भी गर्जना करना ।* *उस शेर के बच्चे ने उस शेर की तरह ही गर्जना की । तो उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हुआ और उसी समय वह भयमुक्त होकर शेर के साथ चला गया। मानव जीवन की भी ठीक ऐसी ही स्थिति है।* *जैसे सूर्य से किरण अलग होकर पूरे जगत में फैल जाती है, वैसे ही जीव भी अनादि काल से ब्रह्म से अलग हो गया है । बादल का पानी बिल्कुल साफ होता है ,, बादलों में क्षोभ होने से बूंद अलग होकर पृथ्वी पर गिरती है । आकाश से पृथ्वी पर आने तक उसमें (बीच में) ऑक्सीजन - नाइट्रोजन आदि तत्त्व मिल जाते हैं । पृथ्वी को छूते ही यह बूदे मिट्टी में मिलकर मलीन हो जाती है।* *फिर दोबारा सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से बाष्पी भवन होता है । तो उसकी उर्ध्व गति होती है और बादल के रूप में वह जल पुनः अपने असली स्थान पर पहुंचकर शुद्ध और पवित्र हो जाता है । इसी तरह जीव ब्रह्म से अलग हो गया है, वह जगत की माया के संपर्क में आकर अविद्या वस मलीन हो गया है ।* *गोस्वामी तुलसीदास जी रामायण में यह बात एक ही पंक्ति में समझाते हैं* *भूमि परत भा डाबर पानी।* *जिमि जीवहि माया लपटानी ॥* *पृथ्वी पर पडते ही पानी गदला हो गया , जैसे शुद्ध जीव को माया लिपट गई हो।* *शेर की तरह ही शेर के बच्चे रूपी जीव को यह समर्थ गुरु मिलता है, तब ही उसे सच्चे स्वरूप का ज्ञान होता है और वह कर्मों के भय से मुक्त हो जाता है।* *गोस्वामी जी इस बात को रामायण में लिखते हैं कि--* क्रमश: इसके बाद अब कल आगे पढेगे ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
Dilip Giri
1.9K views
9 days ago
आपके कर्म की सजा से भगवान भी नहीं बचा सकते #कर्म
sn vyas
3.3K views
15 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२८/३ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 भगवान प्रारब्ध भोगने में क्या मदद करते है ? 🦚 गतांक से आगे श्री भगवान राम स्वयं कहते हैं ---- मैं जिस दिन चक्रवर्ती राजा होने वाला था ,और सिंहासन पर बैठने वाला था, उसी दिन सुबह मुझे कर्म के कायदे को मान देकर , जटाधारी तपस्वी के वेश में बन में जाना पड़ा है ,,, *भगवान राम उनके पिता दशरथ को ,, पुत्र के वियोग से होने वाले मृत्यु रूपी प्रारब्ध भोगने में मदद न कर सके। उनको कम से कम चौदह वर्ष भी पुन: जीवन दे सके नहीं।* *जिस राम के चरण रज के स्पर्श मात्र से शल्या की अहिल्या हो सकी ,,, पत्थर को भी जो जीवन दान दे सकें,,, वे भगवान खुद अपने पिता को जीवनदान दे सके नहीं ,,,, क्योंकि अहिल्या के पाप पूर्ण हो गए थे । उसका प्रारब्ध जीवन दान देने को तैयार हो गया था । जबकि राजा दशरथ ने श्रवण का वध किया था । वह पाप प्रारब्ध बनकर दशरथ को फल देने के लिए सामने खड़ा था । उसमें खुद भगवान भी हस्तक्षेप नहीं करते।* *गवर्नर ने कायदा किया हो कि वाहन बायी ओर से चलाना ,,, फिर खुद गवर्नर ही अपनी मोटर दाहिनी ओर से चलाएं तो छोटे से छोटा पुलिस भी उनकी मोटर को रोक सकता है। उसमें गवर्नर का कुछ भी नहीं चलेगा।* *भगवान के बनाए हुए कर्म के कायदे का सख्त पालन हो ऐसा भगवान चाहते हैं । तो मानव को उनकी आज्ञा अनुसार भक्ति योग के द्वारा अपने प्रारब्ध कर्म को भोग लेना चाहिए।* क्रमश: अब आगे कल नया भाग ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
841 views
26 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२० 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🥰अबुध और अभान अवस्था में किए हुए कर्म🥰 *(1) (2) बाल्य अवस्था में किए हुए कर्म और अभान अवस्था में, पागल-पन में शराब पी हुई हालत में, या नशे की अवस्था में किए कर्म में , राग द्वेष की प्रेरणा होती नहीं । इसलिए राग द्वेष से प्रेरित हुए बिना के कर्म ,, संचित कर्म में जमा होते नहीं।* *कोई छोटा बालक अग्नि में हाथ डाले तो वह जल जाएगा और कर्म तत्कालिक फल देगा। किन्तु वही कर्म फिर दुबारा संचित में जमा होकर दूसरे समय फल देता नहीं।* *तीन साल का छोटा बालक खेल में खटिया में कूदता हो और उसी खटिया में सोए हुए तीन मास के बालक के गले पर पैर पड़ने पर , वह तीन मास के बालक की मृत्यु हो जाए , तो उस 3 साल के बालक पर इंडियन पीनल कोर्ट की कलम 302 के मुताबिक उनका केस चलेगा नहीं । उस कर्म में राग द्वेष होता नहीं। उसी तरह यह कर्म संचित में जमा होता नहीं । छोटी उम्र के बालक ने बिक्री दस्तावेज जैसा कुछ किया हो तो वह कोर्ट मान्य रखती नहीं।* *छोटी उम्र के बालक को मतदान का भी अधिकार नहीं है । उसी तरह नशे की अवस्था में , अभान अवस्था में, पागलपन में कोई आदमी गंदी गाली बोलता है अगर उत्पाद करता है तो , उसके विरुद्ध ई॰ पी॰ कोर्ट की कलम 323, 504 के अनुसार कोर्ट में केस चल नहीं सकता ।* *ज्यादा से ज्यादा लोग इकट्ठे होकर उसको ठीक तरह से मारपीट करेंगे और उस तरह उसको अपने कर्मों का तत्काल फल मिलेगा या तो उस पर दया करके उसको रिहा करें, किन्तु ऐसे आदमी के कर्म में राग द्वेष नहीं होने से, संचित करने जमा होते नहीं।* क्रमश,,,, ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ