भक्ति भावना ❤✨🙏

sn vyas
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15 hours ago
#भक्ति #भक्ति भावना #जय श्री कृष्ण ' भक्त शिरोमणि संत जनाबाई और भगवान विट्ठल की अद्भुत भक्ति कथा.. ' महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में संत जनाबाई का नाम अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से लिया जाता है। वे भगवान विट्ठल की ऐसी अनन्य भक्त थीं, जिनके लिए भगवान केवल मंदिर में विराजमान देवता नहीं थे, बल्कि उनके जीवन के हर क्षण के साथी थे। उनकी भक्ति में कोई दिखावा नहीं था। वे घर के साधारण से साधारण काम को भी भगवान की सेवा मानकर करती थीं। कहा जाता है कि उनकी इसी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विट्ठल स्वयं उनके काम में हाथ बंटाने लगे। बाल्यकाल और कठिन जीवन.. संत जनाबाई का जन्म महाराष्ट्र के गंगाखेड़ में एक साधारण परिवार में हुआ माना जाता है। बचपन से ही उनका जीवन कठिनाइयों से भरा था। छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया उनके सिर से उठ गया। उनका जीवन उन्हें पंढरपुर की विट्ठल-भक्ति की परंपरा से जुड़े संत नामदेव के परिवार तक ले आया। वे नामदेव जी के घर रहने लगीं और घर के काम-काज में सहायता करने लगीं। जनाबाई स्वयं को दासी मानती थीं, लेकिन उनके हृदय में भगवान विट्ठल के प्रति ऐसा प्रेम था कि उनके लिए हर काम भगवान की पूजा बन गया। काम करते हुए भी भगवान का स्मरण.. जनाबाई सुबह बहुत जल्दी उठ जाती थीं। घर की सफाई करना, पानी भरना, बर्तन साफ करना, कपड़े धोना और अनाज पीसना—ये सब उनके दैनिक कार्य थे। लेकिन उनके हाथ काम करते रहते और उनका मन विट्ठल के चरणों में लगा रहता। चक्की चलाते समय भी वे भगवान विट्ठल का नाम लेतीं और भक्ति से अभंग गातीं। कभी-कभी वे इतनी गहराई से भगवान के ध्यान में डूब जातीं कि उन्हें अपने आसपास की सुध तक नहीं रहती। उनके लिए चक्की केवल अनाज पीसने का साधन नहीं थी। चक्की के घूमते हुए पाटों में भी उन्हें भगवान की लीला दिखाई देती थी। वे मानो कहती थीं— “हे विट्ठल! मेरे हाथों से होने वाला प्रत्येक काम आपके चरणों में समर्पित है।” " भक्त के प्रेम में बंधे भगवान.. '' भक्ति परंपरा में जनाबाई से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा चक्की की है। एक दिन जनाबाई चक्की पीसते-पीसते भगवान विट्ठल के प्रेम में मग्न हो गईं। उनके मुख से भगवान के भजन निकल रहे थे और उनका मन पूरी तरह विट्ठल में डूब गया। उधर घर का काम पूरा करना भी आवश्यक था। कथा के अनुसार, जनाबाई की ऐसी निष्कपट भक्ति देखकर भगवान विट्ठल स्वयं उनके पास प्रकट हुए। जनाबाई को जैसे ही आभास हुआ कि उनके आराध्य स्वयं उनके सामने हैं, वे भाव-विभोर हो गईं। भगवान ने उनके हाथ से चक्की का काम अपने हाथ में ले लिया और प्रेमपूर्वक अनाज पीसने लगे। जिस भगवान की पूजा बड़े-बड़े मंदिरों में होती है, वही भगवान अपने भक्त के घर में उसके दैनिक काम में सहायता कर रहे थे। यह दृश्य भक्ति की सबसे सुंदर भावना को प्रकट करता है— जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ भगवान और भक्त के बीच कोई दूरी नहीं रहती। भगवान बने जनाबाई के सहायक.. जनाबाई से जुड़ी भक्तिकथाओं में यह भी वर्णन मिलता है कि भगवान विट्ठल उनके अनेक घरेलू कामों में सहायता करते थे। कभी वे उनके साथ अनाज पीसते, कभी सफाई में सहायता करते और कभी उनके कठिन परिश्रम को कम करने के लिए उनके साथ खड़े रहते। जनाबाई के लिए यह किसी चमत्कार से अधिक प्रेम का अनुभव था। वे भगवान को दूर आकाश में खोजने के बजाय अपने दैनिक जीवन के छोटे-छोटे कार्यों में अनुभव करती थीं। उनकी दृष्टि में— झाड़ू लगाना भी भगवान की सेवा था, पानी भरना भी भगवान की सेवा थी, अनाज पीसना भी भगवान की सेवा थी, और भगवान का नाम लेना उनके जीवन की सांस थी। जनाबाई की भक्ति की परीक्षा.. भक्तिकथाओं में जनाबाई के जीवन से जुड़ी कई ऐसी घटनाएँ मिलती हैं जिनमें उनकी भक्ति और भगवान के प्रति अटूट विश्वास की परीक्षा होती है। समाज में उनकी स्थिति साधारण थी। वे एक सेविका के रूप में जीवन बिताती थीं। लेकिन उनके भीतर की भक्ति इतनी महान थी कि उनके लिए सांसारिक सम्मान का कोई महत्व नहीं था। उनका विश्वास था कि भगवान व्यक्ति की बाहरी स्थिति नहीं देखते। भगवान केवल हृदय देखते हैं। इसीलिए एक साधारण दासी के घर भी भगवान स्वयं सहायता करने आ सकते हैं। संत नामदेव और जनाबाई.. संत नामदेव की भक्ति परंपरा का जनाबाई के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। नामदेव स्वयं भगवान विट्ठल के महान भक्त माने जाते हैं। उनके घर में रहते हुए जनाबाई ने भक्ति, नाम-स्मरण और संत-संग का अनुभव किया। उन्होंने अपने अनुभवों और भावनाओं को अभंगों के माध्यम से व्यक्त किया। उनके पदों में भगवान के प्रति प्रेम, समर्पण और आत्मीयता दिखाई देती है। जनाबाई के लिए भगवान किसी दूर बैठे राजा की तरह नहीं थे। वे उनके अपने थे। कभी वे उन्हें माता की तरह पुकारतीं, कभी स्वामी की तरह, कभी मित्र की तरह और कभी ऐसे साथी की तरह जो उनके रोजमर्रा के जीवन में उनके साथ खड़ा हो। इस कथा का सबसे बड़ा संदेश.. संत जनाबाई और भगवान विट्ठल की कथा हमें यह सिखाती है कि भगवान को पाने के लिए केवल बड़े-बड़े अनुष्ठान आवश्यक नहीं हैं। यदि मन में सच्ची श्रद्धा, प्रेम और समर्पण हो, तो साधारण जीवन भी भक्ति का मार्ग बन सकता है। जनाबाई ने कोई राजमहल नहीं देखा। उन्होंने अपना जीवन कठिन परिश्रम में बिताया। लेकिन उनके हृदय में भगवान के लिए इतना प्रेम था कि वही भगवान उनके जीवन के साथी बन गए—ऐसा भक्तिकथाओं में वर्णित है। भक्ति में धन नहीं, हृदय चाहिए। पूजा में दिखावा नहीं, प्रेम चाहिए। भगवान को पाने के लिए संसार छोड़ना नहीं, अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करना चाहिए। जनाबाई और विट्ठल की चक्की.. आज भी जब संत जनाबाई और भगवान विट्ठल की चक्की वाली कथा याद की जाती है, तो यह दृश्य मन को भावुक कर देता है— एक ओर साधारण वस्त्रों में भक्त जनाबाई, दूसरी ओर स्वयं भगवान विट्ठल, और दोनों मिलकर चक्की चला रहे हैं। यह केवल अनाज पीसने की कथा नहीं है। यह उस प्रेम का प्रतीक है जिसमें भगवान अपने भक्त के प्रेम के सामने स्वयं को भी समर्पित कर देते हैं। कहा जाता है— “भगवान भक्त के भाव के भूखे हैं।” जनाबाई की भक्ति ने इस भावना को जीवंत कर दिया। राधे राधे । जय श्री विट्ठल । पांडुरंग भगवान की जय । संत जनाबाई महारानी की जय ‌। ...
sn vyas
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3 days ago
#जय श्री कृष्ण #भक्ति भावना श्लोक : नो किं समंजसमिहेत्यसमंजसं वा, वेदेति गूढसरणीं कलयामि किंचित्। एतेन सर्वफलनं भवतां न वा यद्, गोविन्दपादभजनादितरं न जाने।। अर्थात् :- वेद में क्या विधि है क्या निषेध है—यह जान लेना अत्यन्त मुश्किल है, जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा है—“शब्दब्रह्म सुदुर्बोधम्” इत्यादि “प्राण, इन्द्रिय तथा मनोमय होने के कारण, शब्दब्रह्मस्वरूप वेद, अत्यन्त दुर्बोध है” आदि । इसलिए मैं विधि-निषेध को छोड़कर वेदार्थ-सार का विचार करते हुए यही जान पाया हूँ कि गोविन्द के श्रीचरणों का सेवन करने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी श्रेय नहीं है। समस्त श्रुतियों (वेदों) का तात्पर्य इसी विचार में सम्मिलित है। श्लोक : निन्दापरा बन्धुवरा बुधानां, तत्वेन जानन्तु त एव धीराः। जातं मलं दैववशाद्यतस्ते, स्वेनापकर्षन्ति रसेन्द्रियेण॥ अर्थात् :- जो वेदार्थ-सार का विचार नहीं करते और मात्र निन्दा-स्तुति में प्रवृत्त रहते हैं, धीर-पुरुष, निन्दकों की इस प्रवृत्ति से विचलित न होकर, तात्त्विक दृष्टि से उनको अपने श्रेष्ठ बन्धु की ही भाँति प्रेम करते हैं, क्योंकि कर्म-विपाक से यदि कभी कोई पाप-कर्म इस देह से बन जाता है तो उसे ये निन्दक लोग अपनी जिह्वा से धो डालते हैं, तथा धीरपुरुष इनके द्वारा आत्म-दर्शन करने में समर्थ होते हैं। भो ! निन्दका ! भो ! बहुतर्कवादाः, शृण्वन्त्वसूयारसिकास्तवेदम्। शूरा भवन्तः स्वरणे वयं तु, स्वे कृष्ण-भावे किमु कातराः स्मः॥ अर्थात् :- हे निन्दको ! तार्किको ! और ईर्ष्यालु जनो ! आप सब भली भाँति सुन लें कि जिस प्रकार आप लोग निन्दा, तर्क और असूया करने में शूर हैं, उसी प्रकार हम भी अपने श्रीश्यामसुन्दर के भाव में दृढ़ हैं, कायर नहीं। श्लोक : मां दम्भिनो दम्भयुतं वदन्तु, प्रमत्तचित्ता धनिनश्च मत्तम्। प्रलोभिनः कर्मरताश्च लुब्धं, यथाकथञ्चिद्गतिरस्तु कृष्णः॥ अर्थात् :- दम्भी लोग मुझे भले ही दम्भी बतलावें, अस्थिर मन वाले धनी लोग मुझे भले ही मत्त कहें, अथवा कर्मरत लोभी जन भले ही मुझे लुब्धक समझें। इन सब लोक-धारणाओं से मुझे कुछ लेना-देना नहीं, मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि जिस किसी प्रकार से भी श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। श्लोक : चेदर्थहानिर्मम नापरस्य हा किं विवादं जनता विधत्ते। स्वधर्ममुद्दूष्य हरि भजतो, धर्मस्य हानिर्ज्वलतात् स धर्मः।। अर्थात् :- वर्ण और आश्रम-धर्मों को महत्त्व न देकर हरि-भजन करते हुए यदि धन-कुटुम्ब का विनाश होता है तो यह मेरे अपने सोचने की बात है, और लोगों का इस विषय में विवाद करना व्यर्थ है। कहा जाता है कि हरि-भजन से वर्णाश्रम-धर्मों की हानि होती है, तो मैं कहूंगा कि भजन ही सर्वोपरि धर्म है, भजन-विरोधी तथा-कथित ऐसे धर्म का भस्म हो जाना ही अच्छा है। ।। जय श्रीकृष्ण ।। .
sn vyas
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4 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति भावना सूर्यवंश में 'सत्यव्रत' नाम के एक अत्यंत प्रतापी और पराक्रमी राजा हुए। वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण धर्मपूर्वक करते थे, परंतु उनके भीतर अपने सौंदर्य, बल और सत्ता का एक सूक्ष्म अहंकार पनप रहा था ​एक दिन राजसभा में बैठे-बैठे उनके मन में एक अनूठा और अभिमानी विचार आया: ​संसार में जितने भी पुण्य आत्मा हैं, वे मृत्यु के बाद अपना यह शरीर छोड़कर केवल आत्मा रूप में स्वर्ग जाते हैं। परंतु मैं इतना महान और शक्तिशाली राजा हूँ कि मुझे अपने इस पंचभौतिक मानव देह (सशरीर) के साथ ही स्वर्ग जाना चाहिए, ताकि देवता भी मेरे इस हाड़-मांस के शरीर का आदर करें! सत्यव्रत अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और प्रणाम करके बोले:हे ब्रह्मर्षि! आप अपनी तपस्या के बल से एक ऐसा यज्ञ कराइए, जिसके प्रभाव से मैं अपने इसी जीवित शरीर के साथ स्वर्गलोक चला जाऊँ। महर्षि वशिष्ठ ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और राजा से शांत स्वर में कहा: हे राजन्! यह विचार धर्म, प्रकृति और विधि के विधान के विरुद्ध है। यह नश्वर शरीर पृथ्वी के पंचतत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है। इसे स्वर्ग में ले जाना असंभव और अधर्म है। अपनी इस व्यर्थ हठ को त्याग दो और निष्काम भाव से प्रजा-पालन करो। परंतु राजा सत्यव्रत पर हठ का भूत सवार था। उन्होंने वशिष्ठ जी की बात मानने के बजाय कहा कि यदि आप यह यज्ञ नहीं कराएंगे, तो मैं किसी अन्य ऋषि के पास चला जाऊँगा वशिष्ठ जी के इंकार करने पर राजा सत्यव्रत उनके १०० पुत्रों के पास गए। वशिष्ठ-पुत्रों ने जब देखा कि राजा उनके गुरु और पिता के निर्णय की अवहेलना कर रहा है, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने राजा को शाप दे दिया: "रे अभिमानी नृप! गुरु की आज्ञा का अनादर करने के कारण तू अत्यंत नीच और कुरूप 'चांडाल' बन जा! शाप मिलते ही राजा सत्यव्रत का दिव्य रूप, राजसी वस्त्र और आभूषण नष्ट हो गए। उनका शरीर काला, बाल बिखरे हुए, और वस्त्र जीर्ण-शीर्ण हो गए। वे एक भयानक व कुरूप चांडाल के रूप में बदल गए। इस रूप में अयोध्या की प्रजा ने भी उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। दुखी और अपमानित होकर सत्यव्रत वन-वन भटकने लगे। अंत में वे महर्षि विश्वामित्र के आश्रम पहुँचे। विश्वामित्र जी उस समय महर्षि वशिष्ठ से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए प्रयासरत थे। चांडाल रूपी राजा सत्यव्रत ने विश्वामित्र के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई। विश्वामित्र जी ने सोचा कि यदि वे वशिष्ठ के मना किए गए कार्य को अपनी तपस्या से पूरा कर दें, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी श्रेष्ठता सिद्ध हो जाएगी। विश्वामित्र जी ने प्रतिज्ञा की: हे राजन्! तुम वशिष्ठ के शाप से चांडाल बने हो, परंतु मैं अपने उग्र तपोबल से तुम्हें इसी शरीर के साथ देवराज इंद्र के सामने स्वर्ग में बिठाकर रहूँगा! विश्वामित्र जी ने एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया और सभी ऋषियों को निमंत्रण भेजा। परंतु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने इस अस्वाभाविक यज्ञ में आने से मना कर दिया। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय विश्वामित्र ने देवताओं को अपना हविर्भाग (आहुति) लेने के लिए आवाह्न किया, परंतु धर्म-विरुद्ध कार्य होने के कारण कोई भी देवता यज्ञ-स्थल पर प्रकट नहीं हुआ। इससे विश्वामित्र जी का क्रोध प्रचंड हो उठा। उन्होंने अपने हाथ में जल लिया और अपनी वर्षों की तपस्या का पुण्य राजा सत्यव्रत को अर्पित करते हुए कहा: हे राजन्! देवताओं के न आने पर भी मेरी तपस्या का फल देखो। मैं तुम्हें अपनी साधना के बल से आकाश में ऊपर स्वर्ग की ओर उछालता हूँ महान तपोबल के प्रभाव से राजा सत्यव्रत का चांडाल शरीर धरती छोड़कर तेज़ी से आकाश की ओर उड़ने लगा। राजा सत्यव्रत उड़ते हुए सीधे स्वर्ग लोक के द्वार पर पहुँच गए। जब देवताओं के राजा इन्द्र ने एक चांडाल रूपी मनुष्य को सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करते देखा, तो वे क्रोधित हो गए। इंद्र ने देवताओं के साथ मिलकर राजा को रोका और कहा: हे नीच! तू गुरु के शाप से पतित हुआ है और प्रकृति के नियम को तोड़कर सशरीर यहाँ आया है। तेरा स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है! इंद्र ने एक शक्तिशाली प्रहार करके राजा सत्यव्रत को स्वर्ग से नीचे फेंक दिया। राजा सत्यव्रत सिर के बल (उलटे) आकाश से धरती की ओर तेज़ी से गिरने लगे। भयभीत होकर वे आर्तनाद करने लगे—हे विश्वामित्र! हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिए, मैं नीचे गिर रहा हूँ! विश्वामित्र जी ने जब राजा की यह दुर्दशा देखी, तो उन्होंने अपने कमंडलु के जल से संकल्प लिया और गड़गड़ाती वाणी में कहा: "तिष्ठ! तिष्ठ!" (वहीं ठहर जाओ!) विश्वामित्र के तपोबल की शक्ति नीचे से ऊपर ढकेल रही थी और इंद्र का बल ऊपर से नीचे फेंक रहा था। परिणाम यह हुआ कि राजा सत्यव्रत न तो ऊपर स्वर्ग जा सके और न ही नीचे धरती पर गिर पाए। वे आकाश और पृथ्वी के बीचों-बीच अधर में (उलटे लटके हुए) अटक गए! स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—इन तीनों लोकों से अलग तीन संकटापन्न स्थितियों में फँसने के कारण उनका नाम 'त्रिशंकु' पड़ा। जब इंद्र ने त्रिशंकु को स्वीकार नहीं किया, तो विश्वामित्र जी ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान माना। उन्होंने अपने क्रोध और तपोबल से अधर में लटके त्रिशंकु के चारों ओर एक नया स्वर्ग, नए सप्तर्षि और नए नक्षत्र-मंडल (दूसरा ब्रह्मांड) बनाना शुरू कर दिया! विश्वामित्र जी ने कहा: यदि इंद्र मेरे राजा को अपने स्वर्ग में नहीं रहने देगा, तो मैं अपने तपोबल से एक दूसरा इंद्र और नया देवलोक बनाकर इस राजा को वहाँ का स्वामी बनाऊँगा सृष्टि के इस नए समानांतर विधान को देखकर ब्रह्मा जी और सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने अत्यंत मधुर वाणी में विश्वामित्र जी से कहा: "हे ब्रह्मर्षि! शांत हो जाइए। आपका तपोबल अगाध है, परंतु सनातन प्रकृति और धर्म की मर्यादा को नष्ट मत कीजिए। नश्वर शरीर कभी मुख्य देवलोक में नहीं रह सकता। विश्वामित्र जी द्वारा रचे गए ये नए नक्षत्र और तारे 'त्रिशंकु मंडल' के नाम से जाने जाएँगे राजा त्रिशंकु इसी अधर में बने नए लोक (त्रिशंकु लोक) में सशरीर निवास करेंगे, परंतु वे मुख्य स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे।वे उलटे लटके रहेंगे और उनके मुँह से जो लार टपकेगी, वही पृथ्वी पर 'कर्मनाशा नदी' के रूप में बहेगी (मान्यता है कि इस नदी के जल को छूने से संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं)। अधर में उलटे लटके रहने के बाद राजा सत्यव्रत (त्रिशंकु) की आँखें खुलीं। उनका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने स्वीकार किया मेरे कुलगुरु वशिष्ठ जी का ज्ञान ही सत्य था। मैंने व्यर्थ के अहंकार और देह-सक्ति में पड़कर अपना लोक और परलोक दोनों बिगाड़ लिया। !! जय श्री कृष्णा!!