भक्तिभावनाएं

sn vyas
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3 days ago
#जय श्री कृष्ण #भक्ति भावना श्लोक : नो किं समंजसमिहेत्यसमंजसं वा, वेदेति गूढसरणीं कलयामि किंचित्। एतेन सर्वफलनं भवतां न वा यद्, गोविन्दपादभजनादितरं न जाने।। अर्थात् :- वेद में क्या विधि है क्या निषेध है—यह जान लेना अत्यन्त मुश्किल है, जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा है—“शब्दब्रह्म सुदुर्बोधम्” इत्यादि “प्राण, इन्द्रिय तथा मनोमय होने के कारण, शब्दब्रह्मस्वरूप वेद, अत्यन्त दुर्बोध है” आदि । इसलिए मैं विधि-निषेध को छोड़कर वेदार्थ-सार का विचार करते हुए यही जान पाया हूँ कि गोविन्द के श्रीचरणों का सेवन करने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी श्रेय नहीं है। समस्त श्रुतियों (वेदों) का तात्पर्य इसी विचार में सम्मिलित है। श्लोक : निन्दापरा बन्धुवरा बुधानां, तत्वेन जानन्तु त एव धीराः। जातं मलं दैववशाद्यतस्ते, स्वेनापकर्षन्ति रसेन्द्रियेण॥ अर्थात् :- जो वेदार्थ-सार का विचार नहीं करते और मात्र निन्दा-स्तुति में प्रवृत्त रहते हैं, धीर-पुरुष, निन्दकों की इस प्रवृत्ति से विचलित न होकर, तात्त्विक दृष्टि से उनको अपने श्रेष्ठ बन्धु की ही भाँति प्रेम करते हैं, क्योंकि कर्म-विपाक से यदि कभी कोई पाप-कर्म इस देह से बन जाता है तो उसे ये निन्दक लोग अपनी जिह्वा से धो डालते हैं, तथा धीरपुरुष इनके द्वारा आत्म-दर्शन करने में समर्थ होते हैं। भो ! निन्दका ! भो ! बहुतर्कवादाः, शृण्वन्त्वसूयारसिकास्तवेदम्। शूरा भवन्तः स्वरणे वयं तु, स्वे कृष्ण-भावे किमु कातराः स्मः॥ अर्थात् :- हे निन्दको ! तार्किको ! और ईर्ष्यालु जनो ! आप सब भली भाँति सुन लें कि जिस प्रकार आप लोग निन्दा, तर्क और असूया करने में शूर हैं, उसी प्रकार हम भी अपने श्रीश्यामसुन्दर के भाव में दृढ़ हैं, कायर नहीं। श्लोक : मां दम्भिनो दम्भयुतं वदन्तु, प्रमत्तचित्ता धनिनश्च मत्तम्। प्रलोभिनः कर्मरताश्च लुब्धं, यथाकथञ्चिद्गतिरस्तु कृष्णः॥ अर्थात् :- दम्भी लोग मुझे भले ही दम्भी बतलावें, अस्थिर मन वाले धनी लोग मुझे भले ही मत्त कहें, अथवा कर्मरत लोभी जन भले ही मुझे लुब्धक समझें। इन सब लोक-धारणाओं से मुझे कुछ लेना-देना नहीं, मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि जिस किसी प्रकार से भी श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। श्लोक : चेदर्थहानिर्मम नापरस्य हा किं विवादं जनता विधत्ते। स्वधर्ममुद्दूष्य हरि भजतो, धर्मस्य हानिर्ज्वलतात् स धर्मः।। अर्थात् :- वर्ण और आश्रम-धर्मों को महत्त्व न देकर हरि-भजन करते हुए यदि धन-कुटुम्ब का विनाश होता है तो यह मेरे अपने सोचने की बात है, और लोगों का इस विषय में विवाद करना व्यर्थ है। कहा जाता है कि हरि-भजन से वर्णाश्रम-धर्मों की हानि होती है, तो मैं कहूंगा कि भजन ही सर्वोपरि धर्म है, भजन-विरोधी तथा-कथित ऐसे धर्म का भस्म हो जाना ही अच्छा है। ।। जय श्रीकृष्ण ।। .
sn vyas
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4 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति भावना सूर्यवंश में 'सत्यव्रत' नाम के एक अत्यंत प्रतापी और पराक्रमी राजा हुए। वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण धर्मपूर्वक करते थे, परंतु उनके भीतर अपने सौंदर्य, बल और सत्ता का एक सूक्ष्म अहंकार पनप रहा था ​एक दिन राजसभा में बैठे-बैठे उनके मन में एक अनूठा और अभिमानी विचार आया: ​संसार में जितने भी पुण्य आत्मा हैं, वे मृत्यु के बाद अपना यह शरीर छोड़कर केवल आत्मा रूप में स्वर्ग जाते हैं। परंतु मैं इतना महान और शक्तिशाली राजा हूँ कि मुझे अपने इस पंचभौतिक मानव देह (सशरीर) के साथ ही स्वर्ग जाना चाहिए, ताकि देवता भी मेरे इस हाड़-मांस के शरीर का आदर करें! सत्यव्रत अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और प्रणाम करके बोले:हे ब्रह्मर्षि! आप अपनी तपस्या के बल से एक ऐसा यज्ञ कराइए, जिसके प्रभाव से मैं अपने इसी जीवित शरीर के साथ स्वर्गलोक चला जाऊँ। महर्षि वशिष्ठ ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और राजा से शांत स्वर में कहा: हे राजन्! यह विचार धर्म, प्रकृति और विधि के विधान के विरुद्ध है। यह नश्वर शरीर पृथ्वी के पंचतत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है। इसे स्वर्ग में ले जाना असंभव और अधर्म है। अपनी इस व्यर्थ हठ को त्याग दो और निष्काम भाव से प्रजा-पालन करो। परंतु राजा सत्यव्रत पर हठ का भूत सवार था। उन्होंने वशिष्ठ जी की बात मानने के बजाय कहा कि यदि आप यह यज्ञ नहीं कराएंगे, तो मैं किसी अन्य ऋषि के पास चला जाऊँगा वशिष्ठ जी के इंकार करने पर राजा सत्यव्रत उनके १०० पुत्रों के पास गए। वशिष्ठ-पुत्रों ने जब देखा कि राजा उनके गुरु और पिता के निर्णय की अवहेलना कर रहा है, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने राजा को शाप दे दिया: "रे अभिमानी नृप! गुरु की आज्ञा का अनादर करने के कारण तू अत्यंत नीच और कुरूप 'चांडाल' बन जा! शाप मिलते ही राजा सत्यव्रत का दिव्य रूप, राजसी वस्त्र और आभूषण नष्ट हो गए। उनका शरीर काला, बाल बिखरे हुए, और वस्त्र जीर्ण-शीर्ण हो गए। वे एक भयानक व कुरूप चांडाल के रूप में बदल गए। इस रूप में अयोध्या की प्रजा ने भी उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। दुखी और अपमानित होकर सत्यव्रत वन-वन भटकने लगे। अंत में वे महर्षि विश्वामित्र के आश्रम पहुँचे। विश्वामित्र जी उस समय महर्षि वशिष्ठ से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए प्रयासरत थे। चांडाल रूपी राजा सत्यव्रत ने विश्वामित्र के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई। विश्वामित्र जी ने सोचा कि यदि वे वशिष्ठ के मना किए गए कार्य को अपनी तपस्या से पूरा कर दें, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी श्रेष्ठता सिद्ध हो जाएगी। विश्वामित्र जी ने प्रतिज्ञा की: हे राजन्! तुम वशिष्ठ के शाप से चांडाल बने हो, परंतु मैं अपने उग्र तपोबल से तुम्हें इसी शरीर के साथ देवराज इंद्र के सामने स्वर्ग में बिठाकर रहूँगा! विश्वामित्र जी ने एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया और सभी ऋषियों को निमंत्रण भेजा। परंतु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने इस अस्वाभाविक यज्ञ में आने से मना कर दिया। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय विश्वामित्र ने देवताओं को अपना हविर्भाग (आहुति) लेने के लिए आवाह्न किया, परंतु धर्म-विरुद्ध कार्य होने के कारण कोई भी देवता यज्ञ-स्थल पर प्रकट नहीं हुआ। इससे विश्वामित्र जी का क्रोध प्रचंड हो उठा। उन्होंने अपने हाथ में जल लिया और अपनी वर्षों की तपस्या का पुण्य राजा सत्यव्रत को अर्पित करते हुए कहा: हे राजन्! देवताओं के न आने पर भी मेरी तपस्या का फल देखो। मैं तुम्हें अपनी साधना के बल से आकाश में ऊपर स्वर्ग की ओर उछालता हूँ महान तपोबल के प्रभाव से राजा सत्यव्रत का चांडाल शरीर धरती छोड़कर तेज़ी से आकाश की ओर उड़ने लगा। राजा सत्यव्रत उड़ते हुए सीधे स्वर्ग लोक के द्वार पर पहुँच गए। जब देवताओं के राजा इन्द्र ने एक चांडाल रूपी मनुष्य को सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करते देखा, तो वे क्रोधित हो गए। इंद्र ने देवताओं के साथ मिलकर राजा को रोका और कहा: हे नीच! तू गुरु के शाप से पतित हुआ है और प्रकृति के नियम को तोड़कर सशरीर यहाँ आया है। तेरा स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है! इंद्र ने एक शक्तिशाली प्रहार करके राजा सत्यव्रत को स्वर्ग से नीचे फेंक दिया। राजा सत्यव्रत सिर के बल (उलटे) आकाश से धरती की ओर तेज़ी से गिरने लगे। भयभीत होकर वे आर्तनाद करने लगे—हे विश्वामित्र! हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिए, मैं नीचे गिर रहा हूँ! विश्वामित्र जी ने जब राजा की यह दुर्दशा देखी, तो उन्होंने अपने कमंडलु के जल से संकल्प लिया और गड़गड़ाती वाणी में कहा: "तिष्ठ! तिष्ठ!" (वहीं ठहर जाओ!) विश्वामित्र के तपोबल की शक्ति नीचे से ऊपर ढकेल रही थी और इंद्र का बल ऊपर से नीचे फेंक रहा था। परिणाम यह हुआ कि राजा सत्यव्रत न तो ऊपर स्वर्ग जा सके और न ही नीचे धरती पर गिर पाए। वे आकाश और पृथ्वी के बीचों-बीच अधर में (उलटे लटके हुए) अटक गए! स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—इन तीनों लोकों से अलग तीन संकटापन्न स्थितियों में फँसने के कारण उनका नाम 'त्रिशंकु' पड़ा। जब इंद्र ने त्रिशंकु को स्वीकार नहीं किया, तो विश्वामित्र जी ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान माना। उन्होंने अपने क्रोध और तपोबल से अधर में लटके त्रिशंकु के चारों ओर एक नया स्वर्ग, नए सप्तर्षि और नए नक्षत्र-मंडल (दूसरा ब्रह्मांड) बनाना शुरू कर दिया! विश्वामित्र जी ने कहा: यदि इंद्र मेरे राजा को अपने स्वर्ग में नहीं रहने देगा, तो मैं अपने तपोबल से एक दूसरा इंद्र और नया देवलोक बनाकर इस राजा को वहाँ का स्वामी बनाऊँगा सृष्टि के इस नए समानांतर विधान को देखकर ब्रह्मा जी और सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने अत्यंत मधुर वाणी में विश्वामित्र जी से कहा: "हे ब्रह्मर्षि! शांत हो जाइए। आपका तपोबल अगाध है, परंतु सनातन प्रकृति और धर्म की मर्यादा को नष्ट मत कीजिए। नश्वर शरीर कभी मुख्य देवलोक में नहीं रह सकता। विश्वामित्र जी द्वारा रचे गए ये नए नक्षत्र और तारे 'त्रिशंकु मंडल' के नाम से जाने जाएँगे राजा त्रिशंकु इसी अधर में बने नए लोक (त्रिशंकु लोक) में सशरीर निवास करेंगे, परंतु वे मुख्य स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे।वे उलटे लटके रहेंगे और उनके मुँह से जो लार टपकेगी, वही पृथ्वी पर 'कर्मनाशा नदी' के रूप में बहेगी (मान्यता है कि इस नदी के जल को छूने से संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं)। अधर में उलटे लटके रहने के बाद राजा सत्यव्रत (त्रिशंकु) की आँखें खुलीं। उनका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने स्वीकार किया मेरे कुलगुरु वशिष्ठ जी का ज्ञान ही सत्य था। मैंने व्यर्थ के अहंकार और देह-सक्ति में पड़कर अपना लोक और परलोक दोनों बिगाड़ लिया। !! जय श्री कृष्णा!!
Skynote Spiritual
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11 days ago
🕉️ SHRI RAM JAY RAM JAY JAY RAM is a powerful and sacred mantra that fills the heart with devotion, inner peace, confidence, and divine positivity. Sung by Ashwani Sahdev, this soulful Ram Naam chanting invites every devotee to connect with the eternal grace of Lord Shri Ram through continuous meditation and remembrance. Whether you are praying, meditating, studying, working, or simply seeking peace of mind, this divine mantra creates a calming spiritual atmosphere and inspires faith, strength, and positivity. 🌸 About the Divine Story of Shri Ram Lord Shri Ram, the seventh incarnation of Lord Vishnu, was born in Ayodhya to establish dharma and righteousness. From his exile (Vanvas), the devotion of Mata Sita and Lakshman, Hanuman Ji's unwavering bhakti, the battle against Ravana, and the establishment of the ideal Ram Rajya, the Ramayana continues to inspire millions across the world with timeless values of truth, courage, devotion, and compassion. 🕯️ Sacred Chant श्री राम जय राम जय जय राम। जय जय राम।। श्री राम जय राम जय जय राम। जय जय राम।। श्री राम जय राम जय जय राम। जय जय राम।। श्री राम जय राम जय जय राम। जय जय राम।। 🌼 Credits 🎤 Singer / Chant: Ashwani Sahdev 📝 Lyrics: Traditional Sacred Mantra 🎼 Music Composed & Arranged by: Ashwani Sahdev 🎧 Recording, Mixing & Mastering: SkyNote 🎬 Produced By: Ashwani Sahdev Music 🔗 Connect With SkyNote Spiritual ▶️ YouTube: https://www.youtube.com/@SkyNoteSpiritual #भक्ति भावनाएं 🙏 If this divine chanting brings peace to your heart, please Like, Share, Comment, and Subscribe to SkyNote Spiritual for more bhajans, mantras, devotional songs, and spiritual music. 🔒 Copyright Notice © 2025 Ashwani Sahdev Music. All Rights Reserved. This audio, composition, arrangement, and production are protected by copyright law. Unauthorized re-uploading, sampling, commercial use, or redistribution is strictly prohibited and may result in copyright claims. #ShriRam #ShriRamJayRam #MeditationMusic #PeacefulChant #AshwaniSahdev #SkyNoteSpiritual
Skynote Spiritual
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21 days ago
🔱 Har Har Mahadev! Bol Bam! 🙏 Sawan ki pavitra bhakti aur Mahadev ki divya kripa ka anubhav kijiye is soulful presentation ke saath. Kanwar Yatra ki aastha aur Shiv bhakti ko mehsoos karein. ❤️🕉️ 🎥 Watch Full Video: https://youtu.be/-EodZcKDxyk 🎵 Credits: 🎤 Singer, Lyrics & Composer: Ashwani Sahdev 🎼 Music Producer: MokshR 🎚️ Mixing & Mastering: Clear 9 ▶️ YouTube: SkyNote Spiritual #भक्ति भावनाएं #devotional #🕉 शिव भजन🙏 #harharmahadevॐ🙏 #bolbam #sawan #kanwaryatra #mahadev❤️